चीनी और प्याज ही नहीं, महंगा चावल भी अब लोगों की जेब काटने लगा है. बासमती और गैर-बासमती दोनों किस्म के चावल की कीमतों में जोरदार तेजी देखने को मिल रही है. बिजनेस टुडे में छपी एक खबर में इकोनॉमिक टाइम्स के हवाले से बताया गया कि अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण चावल के दाम उछले हैं.
महंगाई की मार अब चावल तक पहुंची, 25% तक दाम बढ़े, ईरान युद्ध का असर या कुछ और?
सोना मसूरी चावल की कीमत पिछले साल 51-52 रुपये प्रति किलो थी, अब बढ़कर 63-64 रुपये प्रति किलो हो गई है. महंगाई की मार अब आम लोगों के खाने-पीने और रसोई तक पहुंच चुकी है. आने वाले दिनों में कीमतों में और तेजी दिख सकती है.

कई देशों ने चावल की खरीदार बढ़ाई है ताकि उनके देश में खाने-पीने की चीजों की किल्लत न हो. इस वजह से चावल की मांग बढ़ी है. वहीं, दक्षिण भारत में कम बारिश ने घरेलू बाजार पर दबाव और बढ़ा दिया है.
वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में बासमती चावल की कीमतों में पिछले साल की तुलना में 15-20% की वृद्धि हुई है. वहीं, गैर-बासमती चावल की कीमतों में 20-25% तक का इजाफा हुआ है. व्यापारियों और निर्यातकों का कहना है कि नई फसल अक्टूबर-नवंबर में आने तक कीमतें स्थिर रहने की संभावना है. इससे उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है.
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खाड़ी देश बड़ी तादाद में भारत से चावल खरीद रहे हैं
चावल निर्यात और मार्केटिंग कंपनी राइसविला समूह के सीईओ सूरज अग्रवाल ने बताया कि दुनियाभर में सभी देश अपनी खाद्य जरूरतों के मुताबिक स्टॉक कर रहे हैं. चावल ज्यादातर देशों में खाया जाता है. इस कारण बड़े पैमाने पर खरीद हो रही है. खाड़ी देश भारत से भारी मात्रा में चावल खरीद रहे हैं.” सऊदी अरब सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, जबकि पश्चिम एशिया से भी चावल के लिए पूछताछ लगातार बढ़ रही है. हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में भुगतान और शिपिंग संबंधी बाधाओं के कारण शिपमेंट धीमा हो गया है, जिससे खरीद में कमी आने के बजाय मांग का बैकलॉग बन गया है.
बढ़ती मांग के कारण बिरयानी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले बासमती चावल की कीमत वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में लगभग 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई. पिछले सल इसी अवधि में यह 85 रुपये प्रति किलोग्राम थी.
यह बढ़ोतरी बासमती के अलावा अन्य किस्मों के चावलों में भी देखने को मिल रही है. इससे घरेलू बजट पर दबाव बढ़ रहा है. सोना मसूरी चावल, जिसकी कीमत पिछले साल 51-52 रुपये प्रति किलो थी, अब बढ़कर 63-64 रुपये प्रति किलो हो गई है.
नई फसल आने में अभी देरीराइसविला समूह के सीईओ सूरज अग्रवाल ने कहा कि निकट भविष्य में कीमतों में कमी आने की संभावना नहीं है क्योंकि बाजार में मजबूत मांग और नए चावल की अभी सप्लाई उतनी नहीं हो पा रही है जितनी चाहिए. अग्रवाल ने कहा, "कीमतों में जल्द ही गिरावट आने की संभावना नहीं है. अमेरिका-ईरान युद्ध विराम को लेकर कोई समझौता अभी तक नहीं हुआ है. साथ ही खरीफ की फसल आने में अभी लगभग दो से तीन महीने बाकी हैं."
केआरबीएल लिमिटेड के थोक चावल निर्यात प्रमुख अक्षय गुप्ता ने बताया कि भारतीय बासमती चावल की मांग मजबूत बनी हुई है. भारत ने वित्त वर्ष 2026 में 154 देशों को रिकॉर्ड 65 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया.
अक्षय गुप्ता ने कहा, “2025 की फसल उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बिकी और अक्टूबर में आने वाली फसल के लिए बहुत कम स्टॉक बचा है. घरेलू कीमतें निर्यात से नहीं, बल्कि इसी कमी से तय हो रही हैं.” सरकारी खरीद और अनियमित बारिश के कारण भी घरेलू बाजार पर दबाव है.
चावल निर्यातक संघ के अध्यक्ष बी.वी. कृष्णा राव ने कहा कि सार्वजनिक वितरण के लिए सरकारी खरीद से कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. राव ने आगे बताया कि तेलंगाना में राज्य सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से गैर-बासमती चावल की आपूर्ति कर रही है. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कम बारिश ने भी कीमतों को स्थिर बनाए रखा है.
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आगे कैसा रहेगा भाव?खरीफ की नई फसल आने में अभी कई सप्ताह बाकी हैं, इसलिए व्यापारियों को उम्मीद है कि चावल की कीमतें निकट भविष्य में ऊंची बनी रहेंगी. चावल का भाव तभी गिर सकता है जब कीमतों में कोई भी महत्वपूर्ण गिरावट आए. जब तक नई फसल बाजार में नहीं आती और विदेशी खरीद में कमी नहीं आती है भारत में चावल के दाम काबू नहीं होंगे. इस तरह से उपभोक्ताओं को चावल की ऊंची कीमतों का बोझ झेलना पड़ सकता है.
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