सरकार भले ही अपने बफर स्टॉक से 35 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज बेच रही है. लेकिन देश के कई हिस्सों में लोग अभी भी लगभग 60-70 रुपये प्रति किलो का भुगतान कर रहे हैं. कुछ इलाकों में तो कीमतें इससे भी अधिक हो सकती हैं.
प्याज 70 रुपये में बिकने लगा, दाम इतने ज्यादा कैसे बढ़ गए?
प्याज को पहुंचाने के लिए कांदा एक्सप्रेस रेलवे सेवा और 30 से अधिक ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन भाव तब भी कम नहीं हो पा रहा है. वजह जान लीजिए.

इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट में उपभोक्ता मामलों के विभाग के हवाले से बताया गया है कि 16 सितंबर को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 53.84 रुपये प्रति किलोग्राम रहा. एक साल पहले के 27.71 रुपये से लगभग 94% ज्यादा है. इस दौरान प्याज का औसत थोक मूल्य 45.65 रुपये प्रति किलोग्राम था.
सरकार कांदा एक्सप्रेस और 30 ट्रकों से मंगा रही प्याजसरकार ने 24 अगस्त से अपने प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड से प्याज जारी करना शुरू कर दिया है. वह एनसीसीएफ, एनएएफईडी, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन का इस्तेमाल करके प्याज को 35 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रही है. रेलगाड़ियों और ट्रकों का इस्तेमाल उत्पादक क्षेत्रों से प्रमुख उपभोग केंद्रों तक सप्लाई पहुंचाने के लिए किया जा रहा है.
सरकार का कहना है कि इस पहल का असर कुछ बाजारों में पहले से ही दिखने लगा है. इसलिए बफर स्टॉक प्याज 19 शहरों तक बढ़ा दिया है. प्याज को पहुंचाने के लिए कांदा एक्सप्रेस रेलवे सेवा और 30 से अधिक ट्रकों का इस्तेमाल कर रही है. लेकिन फिर भी भाव कम नहीं हो पा रहा है.
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नई फसल आने से पहले सप्लाई में दिक्कतसरकार का कहना है कि ऐसा संक्रमण काल की वजह से हो रहा है. संक्रमण काल वह पीरियड होता है जब नई फसल आने वाली होती है और पुराना स्टॉक खत्म होने वाला होता है. स्टॉक में रबी की फसल वाला प्याज अगली फसल आने से पहले धीरे-धीरे कम हो जाता है. इससे सप्लाई में अस्थायी कमी आ जाती है.
सरकार के अपने दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि कीमतों को किफायती बनाए रखने के लिए सितंबर से दिसंबर तक यानी कम उत्पादन वाले मौसम के दौरान, अतिरिक्त प्याज जारी किया जाता है.
इस साल, कुछ प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में खरीफ की बुवाई में देरी के कारण यह प्रक्रिया जटिल हो गई है. जुलाई में सरकार ने कहा कि नासिक क्षेत्र में खरीफ की बुवाई लगभग 15 दिन देरी से चल रही है, जबकि कर्नाटक के चित्रदुर्ग-चल्लाकेरे क्षेत्र में बुवाई सामान्य स्तर से लगभग 60% ही होने का अनुमान है.
मौसम ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है. सरकार ने पहले ही मानसून में देरी के प्रभावों को लेकर चिंता जताई थी. सरकार ने कहा था कि कुछ व्यापारियों द्वारा सट्टेबाजी के तौर पर की जा रही खरीदारी भी प्याज की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है.
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उत्पादन पिछले साल के बराबर रहने का अनुमानहालांकि, सरकार का कहना है कि भारत में प्याज की कोई कमी नहीं है. वित्त वर्ष 2025-26 के लिए उसका उत्पादन अनुमान 307.37 लाख टन है, जो पिछले वर्ष के 307.67 लाख टन के लगभग बराबर है. जुलाई में स्थिति का आकलन करते समय सरकार ने यह भी कहा था कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में प्याज का भंडार पर्याप्त है.
इसने 2026-27 के बफर के लिए 2 लाख टन रबी प्याज की खरीद का लक्ष्य तय किया था और लगभग 1.21 लाख टन की खरीद कर ली थी. इस बफर का उद्देश्य कम मांग वाले महीनों के दौरान आपूर्ति सुनिश्चित करना और मौसमी कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि को रोकना है.
सरकारी दुकानों पर 35 रुपये बिक रहा प्याजसरकार के हस्तक्षेप के बाद सरकारी दुकान से प्याज खरीदने वाले परिवारों को 35 रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्याज मिल रहा है. हालांकि, खुले बाजार से प्याज खरीदने वाले परिवारों को लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है.
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