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मानसून ज्यादा लेट हुआ तो गर्मी से ज्यादा महंगाई हालत बिगाड़ देगी, जानें कैसे

मौसम विभाग ने कहा है कि western disturbances ने मानसून की रफ्तार को धीमा कर दिया है. देश की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अच्छा मानसून खासा मायने रखता है. आज भी भारत में करीब 50 पर्सेंट खेती मानसून की बारिश के भरोसे होती है. देश की करीब आधी आबादी का गुजर बसर खेती से होता है.

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इस साल केरलम में मानसून तीन दिन की देरी से पहुंचा है (फोटो क्रेडिट: India Today)

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  • मौसम विभाग के दो अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि आने वाले दो हफ्तों में मध्य और उत्तरी भारत में औसत से कम मानसूनी बारिश होने की संभावना है।
  • पश्चिमी विक्षोभ, जो भूमध्य सागर से आता है, मौसमी प्रणाली में बाधा डालता है जिससे मानसून की गति धीमी हो रही है।
  • कम बारिश से फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है और जून के अंतिम सप्ताह में मानसून सामान्य गति पकड़ने की संभावना है।

झमाझम बारिश का इंतजार लंबा खिंच सकता है. मौसम विभाग ने बताया है कि मानसून की रफ्तार धीमी पड़ती दिख रही है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के साथ बातचीत में मौसम विभाग के दो अधिकारियों ने कहा कि अगले दो हफ्तों में भारत में औसत से कम बारिश होने की संभावना है, खासकर मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में.

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इन अधिकारियों का कहना है कि 'पश्चिमी विक्षोभ' (western disturbances) ने मानसून की रफ्तार को धीमा कर दिया है. पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर से आने वाला वेदर सिस्टम है. यह उत्तरी भारत में बारिश और बर्फबारी लाता है और कभी-कभी मानसून की रफ्तार में अड़ंगा डालता है.

अर्थव्यव्यस्था के लिए कितनी जरूरी है मानसूनी बारिश ?

देश में सालभर में होने वाली बारिश का 70 पर्सेंट हिस्सा मानसून सीजन के दौरान बरसता है. देश की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अच्छा मानसून खासा मायने रखता है. आज भी भारत में करीब 50 पर्सेंट खेती मानसून की बारिश के भरोसे होती है. देश की करीब आधी आबादी का गुजर बसर खेती से होता है. 

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मानसून सीजन की बारिश से जलाशयों में पानी भरता है जो पीने से लेकर सिंचाई और बिजली उत्पादन वगैरा में काम आता है. अच्छी बारिश किसानों की कमाई बढ़ाती है. फसलों की पैदावार अच्छी होने से महंगाई कम होती है जिसका देश के हर नागरिक पर असर पड़ता है. 

कम बारिश से खेती की पैदावार घट सकती है. पैदावार कम होने का सीधा मतलब है बाजार में अनाज की कमी. डिमांड के लिहाज से देखें तो ये ग्राहकों के लिए अच्छा नहीं है. मांग ज्यादा होने की वजह से अनाज और सब्जियों की कीमतें बढ़ेंगी. आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए ज्यादा बड़ा संकट होता है. महंगाई के चलते उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलेगा. कुपोषण का संकट खड़ा होगा, खासकर बच्चों के लिए.

मांग पूरी करने के लिए सरकार को मजबूरन निर्यात कम करना पड़ सकता है. इसका असर देश के खजाने पर पड़ेगा. आय कम होगी तो आम लोगों से जुड़ी योजनाएं प्रभावित होंगी.

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फसलों की बुआई में देरी संभव

मौसम विज्ञान विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रॉयटर्स से बातचीत में कहा है कि वेस्टर्न डिस्टरबेंस की वजह से मानसून के मध्य भारत तक पहुंचने में कुछ और दिन लग सकते हैं. मानसून अब तक केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के अधिकांश हिस्सों के साथ-साथ कर्नाटक और दक्षिणी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को कवर कर चुका है. इन इलाकों में अगले पखवाड़े भारी बारिश होने की उम्मीद है. 

इसी पखवाड़े में मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम बारिश की आशंका है. कम बारिश की वजह से इन इलाकों में धान, कपास, सोयाबीन और दालों जैसी गर्मी में बोई जाने वाली फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है. मौसम विभाग के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि मानसून के जून के आखिरी सप्ताह में रफ्तार पकड़ने की उम्मीद है. तब ज्यादातर राज्यों में पर्याप्त बारिश हो सकती है.

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केरलम में तीन दिन लेट आया मानसून 

जून से सितंबर के बीच चलने वाला मानसून आमतौर पर 1 जून के आसपास केरलम में दस्तक देता है. इसके बाद जुलाई के मध्य तक पूरे देश में मानसूनी बारिश होती है. हालांकि इस साल केरलम में मानसून तीन दिन की देरी के साथ 4 जून को पहुंचा था. 

मौसम विभाग के मुताबिक जून के पहले 10 दिनों में भारत में सामान्य से 26.5% कम बारिश हुई है. अल नीनो की वजह से इस साल सामान्य से 10 पर्सेंट कम बारिश रहने का अनुमान है.

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