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भारत की अर्थव्यवस्था का 'हार्टबीट' अब दिखेगा लाइव, क्या है ये नया 'ISP' मीटर?

Index of Services Production: भारत सरकार जुलाई 2026 से 'इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन' (ISP) शुरू कर रही है. जानें ये नया इंडेक्स क्या है, आम आदमी के लिए इसके क्या मायने हैं, और कैसे ये देश की आर्थिक स्थिति को समझने में मदद करेगा.

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सर्विस सेक्टर के लिए नया सरकारी पैमाना (फोटो-AI)

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  • सरकार ने 2024-25 को आधार वर्ष मानकर 'इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन' (ISP) नामक नया मीटर शुरू करने का फैसला किया है, जो सेवा क्षेत्र के उत्पादन को मापेगा।
  • भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का योगदान आधे से अधिक है, लेकिन अभी तक इसे मापने के लिए कोई लाइव मीटर नहीं था, जिससे नीतियां बनाने में कठिनाई आती थी।
  • 7 से 14 जुलाई 2026 के बीच सरकार ISP के ट्रायल इंडेक्स को जारी करेगी और इसके बाद हर महीने की 29 तारीख को इस रिपोर्ट के आधार पर नीति निर्धारित की जाएगी।

हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसी खबर की जो सुनने में तो बहुत भारी-भरकम और किताबी लगती है. लेकिन इसका असर आपकी और हमारी जेब पर, हमारे रोजगार पर और देश की दिशा पर सीधा पड़ने वाला है. सरकार एक नया मीटर लगाने जा रही है, जिसका नाम है 'इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन' यानी ISP. अब तक हम फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान (IIP) को देखकर अंदाजा लगाते थे कि देश तरक्की कर रहा है या नहीं, लेकिन अब सेवा क्षेत्र (Services Sector) का असली हाल जानने के लिए एक नया इंडेक्स आ रहा है. 

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ये ISP आखिर है क्या?

सबसे पहले ये समझिए कि ये सर्विस सेक्टर है क्या.  आप जब बैंक जाते हैं, ट्रेन या फ्लाइट में सफर करते हैं, होटल में खाना खाते हैं, नेटफ्लिक्स देखते हैं या अपना फोन रिचार्ज करवाते हैं, ये सब सेवा क्षेत्र का हिस्सा है. भारत की कुल कमाई (GDP) में आधे से ज्यादा योगदान इसी सेक्टर का है, फिर भी हमारे पास इसे मापने का कोई 'लाइव' मीटर नहीं था. PIB के अनुसार सरकार ने अब 2024-25 को आधार वर्ष (Base Year) मानकर ISP जारी करने का फैसला किया है. सीधी सादी जुबान में कहें तो, अब सरकार हर महीने ये बता पाएगी कि देश में सेवाओं का उत्पादन बढ़ रहा है या घट रहा है. ठीक उसी तरह जैसे आप अपनी गाड़ी का स्पीडोमीटर देखते हैं, ये ISP देश की सर्विस इकोनॉमी का स्पीडोमीटर बनेगा.

ISP से आम आदमी का फायदा?

अब आपके मन में सवाल होगा कि इससे आम आदमी को क्या फायदा. देखिए, जब तक हमें ये नहीं पता होता कि सर्विस सेक्टर में क्या चल रहा है, सरकार सही नीतियां नहीं बना पाती. मान लीजिए कि रिटेल सेक्टर में गिरावट आ रही है, तो सरकार पहले से सतर्क होकर उसे ठीक करने के कदम उठा सकती है. ISP मिलने के बाद, नीति निर्माताओं (Policymakers) को एकदम सटीक डेटा मिलेगा. इससे न केवल आर्थिक भविष्यवाणी बेहतर होगी, बल्कि बिजनेस करने वालों को भी पता चलेगा कि बाजार में मांग किस तरफ जा रही है. अगर आप एक छोटा बिजनेस चलाते हैं, तो ये डेटा आपको ये समझने में मदद करेगा कि कब निवेश करना है और कब रुकना है.

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क्या पूरा सर्विस सेक्टर दायरे में होगा

अब आप पूछेंगे कि क्या ये सब सेवाओं को कवर करेगा. इसका जवाब है, फिलहाल पूरी तरह से नहीं. ISP मुख्य रूप से 'फॉर्मल सेक्टर' यानी जीएसटी (GST) के दायरे में आने वाले बिजनेस पर नजर रखेगा. इसमें रिटेल, ट्रांसपोर्ट, बैंकिंग, होटल, टेलीकॉम और रियल एस्टेट जैसे बड़े सेक्टर शामिल हैं. स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों को इसमें बाद में जोड़ा जाएगा क्योंकि उनका डेटा जुटाने का तरीका अलग है. गौर करने वाली बात ये है कि ये असंगठित या 'इनफॉर्मल' सेक्टर को कवर नहीं करेगा. तो अगर कोई छोटी सी दुकान है जो जीएसटी में रजिस्टर्ड नहीं है, तो वो शायद इस मीटर की रीडिंग में नहीं आएगी. लेकिन क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था अब तेजी से संगठित हो रही है, ये काफी हद तक सही तस्वीर पेश करेगा.

ISP का कैल्कुलेशन होगा कैसे?

इसका कैल्कुलेशन कैसे होगा? सरकार जीएसटी के डेटा का इस्तेमाल करेगी. जीएसटी में जो 'आउटवर्ड सप्लाई' होती है, यानी जो बिल कटते हैं, उसे ही उत्पादन का पैमाना माना जाएगा. चूंकि सर्विस सेक्टर में सामान स्टॉक करके नहीं रखा जाता, इसलिए जो बिका, वही उत्पादन है. इसे और बेहतर बनाने के लिए सरकार महंगाई के असर को हटाने के लिए 'डिफ्लेटर' का इस्तेमाल करेगी ताकि हमें 'असली ग्रोथ' (Real Output) दिख सके, न कि सिर्फ बढ़ी हुई कीमतें. सरकार 14 जुलाई 2026 से इसके ट्रायल इंडेक्स जारी करना शुरू करेगी, और उसके बाद हर महीने की 29 तारीख को ये रिपोर्ट आएगी.

इंडिया अपनी इकॉनमी को मापने के नए और आधुनिक दौर में प्रवेश कर रहा है. ये कदम हमें ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के करीब ले जाएगा. अब जब भी आप अखबार में पढ़ेंगे कि 'देश की सर्विस ग्रोथ इतनी रही', तो आप समझ जाएंगे कि ये डेटा कहां से आ रहा है और इसका मतलब क्या है. ये पारदर्शिता और डेटा-आधारित फैसले लेने की दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम है.

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