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कीमत वही, वजन भी वही... फिर भी आपके पसंदीदा साबुन-नूडल्स की क्वालिटी क्यों खराब हो गई?

Cheap Palm Oil utilisation: क्या आपके पसंदीदा नूडल्स का स्वाद बदल गया है या साबुन जल्दी गल रहा है? असल में FMCG कंपनियां मुनाफा बचाने के लिए असली माल की जगह सस्ता पाम ऑयल और केमिकल झोंक रही हैं.

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कीमत वही, वजन भी वही फिर क्वालिटी क्यों खराब? (फोटो-AI)

आपने गौर किया? आपके पसंदीदा नूडल्स का मसाला अब पहले जैसा चटपटा नहीं लगता. नहाने का जो साबुन सालों से इस्तेमाल कर रहे, वो अब बहुत जल्दी गल जाता है या उसकी खुशबू गायब हो गई. दुकान पर गए, पैकेट चेक किया. दाम बिल्कुल वही है. वजन भी पूरे 100 ग्राम है. फिर ये स्वाद और क्वालिटी अचानक कहां चली गई?

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अक्सर लोग सोचते हैं कि उनके टेस्ट बड्स बदल गए या उम्र के साथ पसंद बदल गई. पर असल में खेल आपकी जीभ का नहीं, बल्कि कंपनियों के बोर्डरूम का है. कंपनियां आपके साथ एक बहुत ही शातिर और खामोश गेम खेल रही हैं. इस गेम का नाम है- स्किम्पफ्लेशन (Skimpflation).

हर तरफ महंगाई का रोना है. कंपनियां सीधे दाम बढ़ाएंगी तो ग्राहक भाग जाएगा. इसलिए अब उन्होंने नया रास्ता चुना. आइए बिजनेस डेटा और आंकड़ों के चश्मे से समझते हैं कि कैसे एफएमसीजी (FMCG) कंपनियां महंगाई का पूरा बोझ आपकी जेब के बजाय आपकी सेहत और क्वालिटी पर डाल रही हैं.

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श्रिंकफ्लेशन से भी खतरनाक है 'स्किम्पफ्लेशन'

पहले एक पुराना शब्द समझिए जो आपने पहले सुना होगा- श्रिंकफ्लेशन (Shrinkflation). इसमें कंपनियां क्या करती थीं? 10 रुपये वाले बिस्किट के पैकेट का दाम नहीं बदलती थीं, बस अंदर बिस्किट की संख्या 12 से घटाकर 10 कर देती थीं. वजन कम कर दिया, दाम वही रखा. जनता चालाक है, वो वजन देखकर पकड़ लेती है.

जब जनता वजन पकड़ने लगी, तो कंपनियों ने उससे भी तगड़ी चाल चली. अब आया 'स्किम्पफ्लेशन'. इसमें पैकेट का दाम भी वही रहेगा, ऊपर छपा वजन भी बिल्कुल वही रहेगा. बदलेगी तो सिर्फ उसके अंदर इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (Raw Material) की क्वालिटी. यानी माल उतना ही मिलेगा, पर बिल्कुल घटिया या सस्ते इनग्रेडिएंट्स के साथ.

कैसे छुपाया जा रहा महंगाई का बोझ?

सीधा गणित है भाई. पिछले कुछ सालों में इंटरनेशनल मार्केट में पाम ऑयल, कोकोआ बीन्स और केमिकल की कीमतें आसमान छू रही हैं. बिस्किट बनाने वाली कंपनियों के लिए असली कोकोआ बटर मंगाना महंगा सौदा हो गया. अब अगर वो दाम बढ़ाती हैं, तो मिडिल क्लास पारले-जी या ओरियो खरीदना कम कर देगा.

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कंपनियों ने इसका तोड़ निकाला. चॉकलेट और साबुन में से असली कोकोआ बटर की मात्रा धीरे-धीरे कम की गई. उसकी जगह धड़ल्ले से सस्ता पाम ऑयल या हाइड्रोजेनेटेड वेजिटेबल फैट मिलाना शुरू कर दिया. नूडल्स के मसालों में से महंगे नेचुरल स्पाइसेज (सच्चे मसाले) कम करके आर्टिफिशियल फ्लेवर्स और एमएसजी (MSG) का लोड बढ़ा दिया गया. आपको वजन पूरा मिला, पर जो मिला वो सेहत के लिए स्लो पॉइजन जैसा है.

सरकारी कमेटियों की जांच में फूटा भंडाफोड़

यह खेल इतनी चालाकी से चल रहा था कि आम उपभोक्ता को कानोकान खबर नहीं थी. पर हाल ही में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की नींद टूटी है. डिब्बाबंद सामानों की इंग्रीडिएंट लिस्ट (सामग्री सूची) में पारदर्शिता लाने के लिए कुछ नई जांच कमेटियां बनाई गई हैं.

इन कमेटियों के शुरुआती इनपुट्स इन दिनों बिजनेस न्यूज की हेडलाइंस में तैर रहे हैं. जांच में सामने आया कि कई बड़े ब्रांड्स पैकेट के पीछे इतने बारीक अक्षरों में इनग्रेडिएंट्स लिखते हैं कि आम आदमी पढ़ ही न पाए. 'वेजिटेबल फैट' के नाम पर सबसे घटिया क्वालिटी का तेल इस्तेमाल हो रहा है. FSSAI अब फ्रंट-ऑफ-पैकेट लेबलिंग (FOPL) लागू करने की तैयारी में है, ताकि कंपनियों को मोटे अक्षरों में लिखना पड़े कि वो अंदर क्या कचरा भर रही हैं.

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आपकी सेहत और बटुए पर सीधा असर

इस पूरे खेल का सबसे डरावना पहलू है आपकी सेहत. जो साबुन पहले स्किन को मॉइश्चराइज करता था, वो अब उसे ड्राई कर रहा क्योंकि उसमें से नेचुरल ग्लिसरीन निकालकर केमिकल बढ़ा दिए गए. जो नूडल्स बच्चे बड़े चाव से खा रहे, वो सस्ते मैदे और घटिया पाम ऑयल के कॉम्बिनेशन से उनके लिवर पर असर डाल रहे हैं.

लब्बोलुआब ये है कि कंपनियां अपना प्रॉफिट मार्जिन (मुनाफा) बचाने के लिए आपकी सेहत से समझौता कर रही हैं. जब तक सरकार कड़े नियम बनाकर कंपनियों को सीधे सच लिखने पर मजबूर नहीं करती, तब तक स्मार्ट नागरिक बनना ही एकमात्र रास्ता है. अगली बार दुकान पर जाएं, तो सिर्फ दाम और वजन मत देखिए. पैकेट को पलटिए और पीछे छिपी उस बारीक सामग्री सूची को ध्यान से पढ़िए.

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