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EU का कार्बन बॉर्डर टैक्स और भारत: BRICS देशों ने क्यों खोला मोर्चा, क्या है 'ग्रीन प्रोटेक्शनिज्म'?

यूरोपीय संघ का Carbon Border Adjustment Mechanism यानी CBAM 2026 से लागू हो चुका है. स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट समेत कार्बन-गहन उत्पादों पर इसका असर भारतीय एक्सपोर्टर्स की लागत और प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है. BRICS देश इसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर एकतरफा और अनुचित बोझ मानते हैं.

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BRICS मिलकर यूरोप का मुकाबला कैसे कर सकता है? (फोटो-AI)

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  • यूरोपीय संघ ने 1 जनवरी 2026 से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लागू किया है, जो छह प्रमुख उद्योगों के आयात पर embedded कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाने का नियम है।
  • CBAM की पृष्ठभूमि में यह चिंता है कि यूरोप में पर्यावरणीय नियमों का पालन कर उत्पादन करने वाली कंपनियां कम नियमों वाले देशों से आयातित माल से आर्थिक नुकसान उठाएंगी।
  • भारत ने घरेलू कार्बन प्राइसिंग सिस्टम मजबूत कर यूरोपीय बाजार में अपने उद्योगों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का प्रयास शुरू किया है, जबकि BRICS देशों ने CBAM जैसे उपायों को एकतरफा और संरक्षणवादी बताया है।

दुनिया में अब किसी देश से दूसरे देश तक सामान भेजने की कीमत सिर्फ कच्चे माल, बिजली, मजदूरी और ट्रांसपोर्ट से तय नहीं होगी. सामान बनाने में कितना कार्बन निकला, इसका हिसाब भी कारोबारी गणित का हिस्सा बनता जा रहा है. इसी बदलाव के बीच यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (Carbon Border Adjustment Mechanism) यानी CBAM भारत समेत कई विकासशील देशों के लिए बड़ी चिंता बन गया है.

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हालिया BRICS पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर यूरोपीय संघ के कदम की आलोचना की गई. BRICS देशों ने ऐसे एकतरफा पर्यावरणीय व्यापार उपायों पर आपत्ति जताई और इन्हें संरक्षणवाद की दिशा में ले जाने वाला कदम बताया. भारत की आपत्ति का आधार भी यही है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के नाम पर विकसित देशों के बनाए नियमों का आर्थिक बोझ विकासशील देशों के उद्योगों पर नहीं डाला जाना चाहिए.

मगर कहानी का दूसरा पहलू भी है. EU का कहना है कि CBAM का मकसद विदेशी सामान पर मनमाना टैक्स लगाना नहीं, बल्कि यूरोप और बाहर बनने वाले कार्बन-गहन उत्पादों के बीच कार्बन लागत में समानता लाना है. यूरोपीय आयोग के मुताबिक CBAM का उद्देश्य 'carbon leakage' को रोकना है, यानी ऐसा न हो कि कंपनियां कम पर्यावरणीय लागत वाले देशों में उत्पादन ले जाएं और फिर वही सामान यूरोपीय बाजार में बेचें.

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CBAM आखिर है क्या?

इसे इस तरह भी समझ सकते हैं. यूरोप में कोई स्टील कंपनी उत्पादन करती है तो उसे यूरोपीय Emissions Trading System यानी ETS के तहत कार्बन की कीमत चुकानी पड़ती है. अब अगर वही स्टील किसी ऐसे देश से यूरोप पहुंचता है जहां कार्बन की कीमत कम है या कोई समान व्यवस्था नहीं है, तो यूरोपीय कंपनी को नुकसान हो सकता है.

CBAM इसी अंतर को कम करने की कोशिश है. 1 जनवरी 2026 से CBAM का definitive regime लागू हो चुका है. शुरुआती तौर पर इसमें छह प्रमुख सेक्टर शामिल हैं: 

  • लोहा और स्टील
  • एल्युमीनियम
  • सीमेंट
  • उर्वरक
  • बिजली
  • हाइड्रोजन

यूरोपीय संघ में इन उत्पादों के आयात से जुड़ी एम्बेडेड उत्सर्जन की गणना की जाती है और आयातकों को उसके अनुरूप CBAM सर्टिफिकेट्स की व्यवस्था करनी होती है.

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मतलब ये कि भारतीय कंपनी यूरोप में स्टील भेजती है तो सिर्फ ये देखना काफी नहीं कि माल की कीमत कितनी है. ये भी मायने रखेगा कि उसे बनाने में कितना कार्बन उत्सर्जन हुआ और भारत में उस कार्बन के लिए पहले से कोई कीमत चुकाई गई है या नहीं.

यूरोपीय नियमों में अगर उत्पादक देश में प्रभावी कार्बन कीमत पहले से चुकाई गई है तो उसका समायोजन CBAM के तहत किया जा सकता है. इसलिए भारत के लिए अपना घरेलू कार्बन प्राइसिंग और ‘उत्सर्जन मापन’ (emissions measurement) सिस्टम मजबूत करना बेहद अहम हो जाता है.

भारत को सबसे ज्यादा चिंता स्टील की क्यों है?

भारत दुनिया के बड़े स्टील उत्पादकों में है और उसका स्टील उद्योग अभी भी काफी हद तक कोयला आधारित ऊर्जा और पारंपरिक उत्पादन तकनीकों पर निर्भर है. इसलिए भारतीय स्टील की कार्बन तीव्रता यूरोपीय कंपनियों के मुकाबले ज्यादा हो सकती है.

भारत सरकार के स्टील मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2023-24 में भारत ने EU को 4.03 मिलियन टन तैयार स्टील निर्यात किया था, जिसकी कीमत करीब 29,534 करोड़ रुपये थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यूरोपीय बाजार भारतीय स्टील उद्योग के लिए कोई मामूली बाजार नहीं है.

एक अन्य ‘एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ इंडिया’ (Export-Import Bank of India) की 2026 की संयुक्त स्टडी में बताया गया है कि यूरोपियन यूनियन को भारत से होने वाले स्टील और एल्युमिनियम निर्यात की कुल वैल्यू FY2024 के करीब 7.7 अरब डॉलर (लगभग 73.70 हजार करोड़ रुपये) से घटकर FY2025 में लगभग 5.8 अरब डॉलर (करीब 55.51 हजार करोड़ रुपये ) रह गई. हालांकि इस गिरावट को सिर्फ CBAM के खाते में डालना सही नहीं होगा, क्योंकि वैश्विक मांग, व्यापार नीति, कीमत और दूसरे बाजारों की स्थिति भी निर्यात को प्रभावित करती है.

यही वजह है कि CBAM भारतीय कंपनियों के लिए दोहरा दबाव बनाता है. पहला, यूरोपीय बाजार में माल की वास्तविक लागत बढ़ सकती है. दूसरा, उत्सर्जन (emissions) का डेटा जुटाने, वेरिफिकेशन कराने और रिपोर्टिंग की लागत भी बढ़ सकती है.

फिर 'ग्रीन प्रोटेक्शनिज्म' क्या है?

यहीं से असली बहस शुरू होती है. 'ग्रीन प्रोटेक्शनिज्म' का मतलब मौटे तौरपर ऐसे व्यापारिक नियमों से है जो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर घरेलू उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से फायदा पहुंचा सकते हैं.

भारत और कई विकासशील देशों का तर्क है कि यूरोप ने औद्योगिक विकास के दौरान लंबे समय तक fossil fuels का इस्तेमाल किया और अब जब विकासशील देश तेजी से औद्योगिकरण (industrialisation) की ओर बढ़ रहे हैं, तब उन पर महंगी ग्रीन कम्लायंस की शर्तें लगाना विकास के अधिकार को सीमित कर सकता है.

इसीलिए भारत लगातार 'साझा लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताएं' (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities) यानी CBDR-RC के सिद्धांत पर जोर देता रहा है. इसका सीधा मतलब है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी सभी की है, लेकिन सभी देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी, क्षमता और विकास की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं. BRICS की पिछली घोषणाओं में भी unilateral carbon border measures को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है.

लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है. CBAM को सिर्फ 'टैक्स' कह देना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता. EU इसे पर्यावरण नीति और कार्बन लीकेज रोकने की व्यवस्था के तौर पर पेश करता है. इसलिए बहस का असली सवाल ये है कि पर्यावरणीय लक्ष्य हासिल करने का तरीका कितना निष्पक्ष है.

भारत क्या कर रहा है?

भारत के पास अब अपना ‘कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम’ (Carbon Credit Trading Scheme) यानी CCTS है. सरकार ने इसे ‘ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन’ (greenhouse gas emissions) को कम करने, हटाने या रोकने के लिए कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट के जरिए आर्थिक मूल्य देने की व्यवस्था के रूप में अधिसूचित किया है. सरकार ने उर्जा की ज्यादा खपत करने वाले क्षेत्र (energy-intensive sectors) के लिए ‘ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य’ (greenhouse gas emission intensity targets) और मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग तथा वेरिफिकेशन का फ्रेमवर्क भी विकसित किया है.

यानी भारत का जवाब सिर्फ कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं है. घरेलू कार्बन मार्केट को मजबूत करना, उद्योगों की उत्सर्जन की तीव्रता कम करना और निर्यातकों को विश्वसनीय उत्सर्जन डेटा (emissions data) उपलब्ध कराना भी रणनीति का हिस्सा है.

भारत और EU के बीच CBAM पर तकनीकी बातचीत पहले से चलती रही है. EU ने भारतीय उद्योग के डीकार्बोनाइजेशन (decarbonisation) प्रयासों में सहयोग की बात भी कही है. दोनों पक्षों ने CBAM से जुड़े कम्पलायंस से जुड़ी चुनौतियों, खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों की मुश्किलों पर चर्चा की है.

BRICS मिलकर यूरोप का मुकाबला कैसे कर सकता है?

BRICS के पास कोई ऐसा एकल 'anti-CBAM tax' या तत्काल जवाबी टैक्स व्यवस्था नहीं है, जिससे ये कहा जा सके कि यूरोप पर सीधा वैसा ही शुल्क लगाया जाएगा. असली मुकाबला ज्यादा व्यापक है.

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पहला मोर्चा WTO और बहुपक्षीय व्यापार नियम (multilateral trade rules) का है. दूसरा, विकासशील देशों के लिए क्लाइमेट फाइनेंस और तकनीकी ट्रांसफर की मांग को मजबूत करना है. तीसरा, BRICS देशों के अपने कार्बन बाजार और मेजरमेंट सिस्टम के बीच सहयोग बढ़ाना है. 2024 की BRICS प्रक्रिया में कार्बन मार्केट पाटनरशिप को भी आगे बढ़ाने की बात सामने आई थी.

भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही है कि एक तरफ यूरोप से निष्पक्ष नियमों की मांग जारी रहे और दूसरी तरफ भारतीय उद्योग खुद को लो-कार्बन मैन्युफेक्चरिंग के लिए तैयार करें.

क्योंकि आने वाले समय में सवाल सिर्फ ये नहीं होगा कि 'यूरोप टैक्स लगा रहा है या नहीं'. सवाल ये होगा कि दुनिया के कितने बड़े बाजार अपने यहां आने वाले सामान की कीमत में उसके कार्बन फुटप्रिंट को शामिल करते हैं.

और अगर जवाब है कि संख्या लगातार बढ़ रही है, तो भारत के लिए CBAM सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं, बल्कि भविष्य के ग्लोबल ट्रेड की नेट-प्रैक्टिस है.

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