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टी-शर्ट और कमीज पर पड़ने वाली है महंगाई की मार! सूती धागों की कीमतों में 60 फीसदी उछाल

भारत में सूती धागे की कीमत शुरुआती 2026 के करीब 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट है. करीब 60 फीसदी की इस तेजी के पीछे cotton supply, कम arrivals, traders के पास stock, बढ़ती export demand और global textile supply chain जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं.

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भारत में Cotton Yarn ₹250 से ₹400 किलो (फोटो- ANI)

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  • इस साल सूती धागे की कीमत करीब 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जिसके कारण परिधान निर्यात संवर्धन परिषद ने निर्यात को रेगुलेट करने की मांग की है।
  • मौजूदा कीमत वृद्धि की वजह से जमीन पर उपलब्ध सूती धागे की कमी, गिन्नरों के पास सीमित स्टॉक और ट्रेडर्स द्वारा स्टॉकपाइलिंग एवं सट्टेबाजी के कारण सप्लाई-साइड कन्स्ट्रेंट्स हैं।
  • महंगी कॉटन यार्न से उत्पादन लागत बढ़ने की संभावना है, जिसके चलते गारमेंट निर्यातकों ने सरकार से निर्यात नियंत्रण के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया है ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा प्रभावित न हो।

सोचिए, आप बाजार में एक कॉटन टी-शर्ट खरीदने जाते हैं और उसकी कीमत पहले से कुछ ज्यादा मिलती है. सवाल उठता है कि आखिर कपड़े के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? इसका एक जवाब उस धागे में छिपा है, जिससे कपड़ा बनता है. Cotton yarn यानी सूती धागे की कीमत इस साल करीब 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई है. यानी शुरुआती 2026 के मुकाबले करीब 60 फीसदी की बढ़ोतरी.

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ये आंकड़े ‘परिधान निर्यात संवर्धन परिषद’ (Apparel Export Promotion Council) यानी AEPC के हवाले से सामने आए हैं. 29 अगस्त को AEPC ने कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल से सूती धागों के निर्यात को रेगुलेट करने के लिए कदम उठाने की मांग की. वजह ये बताई गई कि महंगे yarn की वजह से भारतीय गारमेंट एक्सपोर्टर्स की लागत बढ़ रही है और इंटरनेशनल मार्केट में उनकी प्रतिस्पर्धा (competitiveness) प्रभावित हो रही है.

पहले समझिए, cotton yarn होता क्या है?

Cotton yarn को आसान भाषा में सूती धागा समझिए. खेत से निकलने वाली कपास सीधे टी-शर्ट या शर्ट नहीं बन जाती. पहले कपास की सफाई और ओटाई (ginning) होती है, जिसमें कॉटन फाइबर को बीज से अलग किया जाता है. इसके बाद फाइबर को कताई मिलों (spinning mills) में भेजा जाता है. वहां फाइबर को साफ, सीधा और तैयार करके उन्हें स्पिन किया जाता है और इसी प्रक्रिया से yarn यानी धागा बनता है.

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इसके बाद धागे से बुनाई (knitting) के जरिए फाइबर तैयार होता है. फिर फैब्रिक की प्रॉसेसिंग, डाइंग, फिनिशिंग और गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग होती है. आखिर में यही मैटेरियल टी-शर्ट, शर्ट, जींस, तौलिया, चादर और दूसरे टैक्सटाइल प्रोडक्ट में बदलता है. टेक्सटाइल मंत्रालय के दस्तावेजों में टैक्सटाइल वैल्यू चेन को कच्चे माल से ओटाई, धुनाई, बुनाई, प्रॉसेसिंग और गारमेंट मेकिंग तक इसी तरह दिखाया गया है.

यानी सूती धागे इस पूरी कहानी का बीच का हिस्सा है. अगर यहां लागत बढ़ती है, तो उसका असर आगे फैब्रिक और गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग तक पहुंच सकता है.

कीमत अचानक क्यों बढ़ रही है?

AEPC के मुताबिक मौजूदा तेजी के पीछे supply-side constraints यानी उपलब्धता से जुड़ी दिक्कतें हैं. कपास साफ करने वालों (Ginners) के पास कॉटन का स्टॉक सीमित है और आवक भी कम हुए हैं. इसके चलते टैक्सटाइल को ‘कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ (Cotton Corporation of India) यानी CCI की नीलामी पर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है.

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AEPC ने ये भी कहा है कि कॉटन का एक बड़ा हिस्सा किसानों से ट्रेडर्स के पास चला गया है, जिससे भंडारण (stockpiling) और सट्टेबाजी (speculative activity) की स्थिति बनी है. हालांकि ये उद्योग संगठन का आकलन है, इसलिए इसे बाजार में साबित हो चुका एकमात्र कारण नहीं माना जाना चाहिए.

सरकारी आंकड़े भी कपास की आपूर्ति पर दबाव की तस्वीर दिखाते हैं. टेक्सटाइल मंत्रालय के मुताबिक 2020-21 में भारत का कॉटन उत्पाद 352.48 लाख गांठ (bales) था. जबकि 2025-26 में प्रोविजनल प्रोडक्शन 290.91 लाख bales रहा. इसी सरकारी जवाब में बताया गया कि हाल की अवधि में इंटरनेशन कॉटन मूल्य करीब 19 फीसदी और घरेलू S-6 कॉटन की कीमत करीब 18 फीसदी बढ़ी है.

किसान को फायदा हो रहा है या नहीं?

सुनने में लगेगा कि अगर कॉटन महंगा हुआ है तो किसान को तो फायदा होगा. लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है. कॉटन की कीमत बढ़ने से किसान को बेहतर मुनाफा मिल सकता है. लेकिन पूरी कीमत बढ़ोतरी सीधे किसान की जेब में नहीं जाती. कॉटन खेत से निकलने के बाद ओटाई, ट्रेडिंग, कताई, बुनाई और मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई चरणों से गुजरता है.

AEPC ने अपने पत्र में कच्चे कपास की कीमत करीब 275 रुपये प्रति किलो और कपास को धागे में बदलने के बाद करीब 325 रुपये प्रति किलो का मूल्य बताया है. इसके मुकाबले वैल्यू एडीशन के बाद तैयार गारमेंट की लागत करीब 800 रुपये से 1,200 रुपये प्रति किलो तक बताया गया है.

यही वजह है कि गारमेंट एक्सपोर्ट्स सरकार से कह रहे हैं कि भारत को सिर्फ कॉटन या धागे बेचने के बजाय ज्यादा वैल्यू एडेड फिनिश्ड गारमेंट के निर्यात पर जोर देना चाहिए.

Spinning mills और गारमेंट मार्केट की परेशानी क्या है?

यहां असली पेंच है. धागा महंगा खरीदना पड़े तो ओटाई और गारमेंट वेल्यू चेन की लागत बढ़ती है. अगर मैन्युफैक्टरर पूरा बढ़ा हुआ खर्च ग्राहक पर डालता है तो उसका प्रोडक्ट महंगा हो सकता है. लेकिन एक्सपोर्ट मार्केट में मामला अलग है. विदेशी खरीदार हमेशा बढ़ी हुई कीमत स्वीकार कर लें, ये जरूरी नहीं.

इसलिए निर्यातक के सामने दो रास्ते होते हैं. कीमत बढ़ाए तो अंतरराष्ट्रीय खरीदार किसी दूसरे देश से सोर्सिंग कर सकता है. कीमत न बढ़ाए तो उत्पादक का मुनाफा दब सकता है.

AEPC ने इसी प्रतिस्पर्धा को लेकर सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. परिषद ने खास तौर पर 20-S काउंट और उससे ऊपर के कॉटन धागों के निर्यात को रेगुलेट करने पर विचार करने को कहा है.

फिर चीन का इसमें क्या कनेक्शन है?

अब कहानी भारत से निकलकर ग्लोबल टेक्सटाइल सप्लाई चेन तक पहुंचती है. AEPC ने कहा है कि अमेरिका की 'उइगर ज़बरन मज़दूरी रोकथाम अधिनियम' (Uyghur Forced Labor Prevention Act_ यानी UFLPA के तहत चीनी कॉटन के इस्तेमाल पर लगी पाबंदियों और सप्लाई-चेन ट्रेसेबिलिटी पर बढ़ते जोर के बीच बांग्लादेश और वियतनाम जैसे परिधान बनाने वाले देशों में भारतीय कॉटन और कॉटन धागों की मांग बढ़ी है.

मतलब अगर किसी गारमेंट बनाने वाले देश को चीनी कॉटन से जुड़ी सप्लाई चेन के बजाय दूसरे स्रोतों से कॉटन या धागा चाहिए, तो भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण सप्लायर बन सकता है. इससे भारतीय धागे की ओवरसीज डिमांड बढ़ सकती है. लेकिन घरेलू सप्लाई सीमित हो तो यही बढ़ी हुई एक्सपोर्ट डिमांड भारत के अंदर कीमत पर दबाव डाल सकती है.

यानी ग्लोबल डिमांड का एक फैसला आपकी लोकल टेक्सटाइल मार्केट तक पहुंच सकता है.

क्या सरकार कॉटन धागों का निर्यात रोक सकती है?

अभी सबसे जरूरी बात ये है कि सरकार ने कॉटन धागों के निर्यात पर रोक लगाने का फैसला नहीं किया है. 29 अगस्त की खबर में AEPC ने सरकार से जरूरी उपाय करनेे और खास तौर पर कुछ श्रेणियों के धागों के निर्यात को नियंत्रित करने का अनुरोध किया है.

इसलिए अभी ये कहना सही नहीं होगा कि कॉटन धागों का एक्सपोर्ट बंद होने वाला है. सरकार के सामने एक मुश्किल संतुलन है. एक तरफ एक्सपोर्टर्स को सस्ता और पर्याप्त कच्चा माल चाहिए, दूसरी तरफ कपास किसानों और धागा निर्यातकों के हित भी हैं.

भारत ने FY 2025-26 में टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में कुल 2.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की. कपड़ा मंत्रालय के मुताबिक कुल कपड़ा निर्यात  3,09,859.3 करोड़ रुपये से बढ़कर 3,16,334.9 करोड़ रुपये हुए. रेडी मेड गारमेंट के निर्यात 1,35,427.6 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,39,349.6 करोड़ रुपये हुए. कॉटन धागों, फैब्रिक, made-ups और हैंडलूम उत्पादों का संयुक्त निर्यात 1,02,399.7 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल के 1,02,002.8 करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा था.

तो क्या आपकी टी-शर्ट, बनियान और चादर महंगी होगी?

संभावना है कि कॉटन धागों की महंगाई से कपड़ों की लागत पर दबाव पड़े, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि धागा 60 फीसदी महंगा हुआ तो टी-शर्ट भी 60 फीसदी महंगी हो जाएगी.

किसी गारमेंट की फाइनल रिटेल कीमत में धागों के अलावा फैब्रिक प्रॉसेस, रंगाई, सिलाई, मजदूरी, ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, ब्रांड मार्जिन, रीटेलर मार्जिन और टैक्स जैसे कई खर्च शामिल होते हैं. इसलिए धागों की कीमत में 60 फीसदी उछाल रिटेल गारमेंट की कीमत में उसी अनुपात की बढ़ोतरी नहीं करता.

लेकिन अगर धागों की ऊंची कीमत लंबे समय तक बनी रहती है, तो फैब्रिक और गारमेंट उत्पादन की लागत बढ़ सकती है. इसका कुछ बोझ खुद उत्पादक सकते हैं और कुछ हिस्सा धीरे-धीरे होलसेल या खुदरा कीमतों तक पहुंच सकता है.

इसलिए फिलहाल सही निष्कर्ष ये है कि आपकी अगली टी-शर्ट तुरंत 60 फीसदी महंगी होने वाली है, ऐसा कोई आधार नहीं है. लेकिन कॉटन धागों की कीमत में इतनी बड़ी तेजी लंबे समय तक रहती है तो कपास से बने प्रोडक्ट की कीमत पर ऊपर की तरफ दबाव जरूर बन सकता है.

असली सवाल टी-शर्ट का नहीं, पूरी textile chain का है

कॉटन धागों की 250 रुपये से करीब 400 रुपये प्रति किलो तक की रिपोर्टेड जंप सिर्फ एक कमो़डिटी की प्राइस स्टोरी नहीं है. इसके पीछे कॉटन उत्पादन, घरेलू सप्लाई, ट्रेडर्स इनवेंटरी, स्पिंनिंग मिल, एक्सपोर्ट, बांग्लादेश और वियतनाम की डिमांड, यूएस-चीन व्यापार प्रतिबंध और भारत की गारमेंट एक्सपोर्ट नीति सब जुड़े हुए हैं.

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और यहां भारत के सामने बड़ा सवाल भी यही है. अगर भारतीय कॉटन और धागों की ग्लोबल डिमांड बढ़ रही है तो निर्यातकों के लिए ये मौका है. लेकिन अगर कच्चा माल इतना महंगा हो जाए कि भारत में ही कपड़े बनाना महंगा पड़ने लगे, तो वैल्यू एडेड गारमेंट एस्पोर्ट की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है.

यानी कॉटन का धागा सिर्फ टी-शर्ट को नहीं जोड़ता. ये किसान से लेकर स्पिनिंग मिल, एक्सपोर्ट्स, गारमेंट फैक्ट्री और आखिर में आपकी शॉपिंग बास्केट तक पूरी टेक्सटाइल इकोनॉमी को जोड़ता है.

वीडियो: टिप टॉप: कॉटन के कपड़ों को चमकाने और पीलापन हटाने का आसान तरीका

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