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एक किमी EV चलाने का खर्च सिर्फ एक रुपया? खरीदने से पहले सच जान लीजिए

EV चलाने में छिपा हुआ खर्च (Hidden costs of owning an EV) चार्जिंग के तरीके से लेकर चक्कों के जल्दी घिसने और बैटरी के डीग्रेड होने में छिपा हुआ है. ईवी कोई सस्ती नहीं है. ऊपर से रेंज खत्म होने वाली धुकधुकी भी है. बस पेट्रोल का पैसा नहीं देना पड़ता तो मन का भरम बना रहता है.

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EV चलाने के कई खर्चे पहले-पहल नजर नहीं आते (तस्वीर: एआई)

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  • भारत में इलेक्ट्रिक वाहन (EV) चलाने का रनिंग कॉस्ट प्रमुख रूप से चार्जिंग की जगह और बैटरी क्षमता पर निर्भर करता है, जिसके लिए प्रति किलोमीटर लगभग 1 से 1.5 रुपये खर्च आता है।
  • ईवी के छिपे हुए खर्चों में बैटरी के तेजी से खराब होना, टायरों का जल्दी घिसना और हाईवे पर DC चार्जर की उच्च कीमतें शामिल हैं, जो कुल चलाने की लागत बढ़ाती हैं।
  • इन खर्चों के कारण EV की संचलन लागत पेट्रोल वाहनों के करीब पहुंचती है और भविष्य में कीमतों और टेक्नोलॉजी में सुधार की उम्मीद के साथ ही ये स्थितियां बदल सकती हैं।

EV खरीदते समय हमें जो रनिंग कॉस्ट बताई जाती है, उसका मीटर तकरीबन 1 से डेढ़ (1.5) रुपये किलोमीटर होता है. रनिंग कॉस्ट माने गाड़ी को हर किलोमीटर चलाने का खर्च. पेट्रोल गाड़ियों में इसे 5 या उससे ऊपर भी माना जाता है. पेट्रोल गाड़ियों में तो जले तेल और चले किलोमीटर से हिसाब लगाया जाता है. जैसे 100 किलोमीटर में अगर 20 लीटर तेल जल गया तो 5 रुपये प्रति किलोमीटर हुआ. ईवी में चार्जिंग की कॉस्ट बोले तो बिजली की खपत से इसका गणित तय होता है. 

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लेकिन क्या वाकई ईवी चलाने का खर्च 1 या डेढ़ रुपये आता (Hidden costs of owning an EV) है? एकदम नहीं, क्योंकि इलेक्ट्रिक व्हीकल में एक्सेलेरेटर दबाने का खर्च इससे कहीं ज्यादा है. ईवी के कई खर्चे ऐसे हैं जो पहले-पहल तो करंट नहीं मारते, लेकिन पेट्रोल गाड़ियों के मुकाबले बहुत जल्दी झटका देते हैं.

ईवी का छिपा हुआ खर्च

छिपा हुआ खर्च चार्जिंग के तरीके से लेकर चक्कों के जल्दी घिसने और बैटरी के डीग्रेड होने में छिपा हुआ है. ये बताएंगे, लेकिन पहले जरा 1 से डेढ़ रुपये वाला फंडा समझ लेते हैं. भारत में इलेक्ट्रिक कार (EV) चलाने का रनिंग कॉस्ट मुख्य रूप से चार्जिंग की जगह (घर या पब्लिक फ़ास्ट चार्जर) पर निर्भर करता है. सबसे आसान तरीका बैटरी की क्षमता और रियल-वर्ल्ड रेंज के आधार पर निकाला जा सकता है. फार्मूला लगता है प्रति KM खर्च = फुल चार्ज करने का कुल खर्च/ वास्तविक रेंज.

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ये भी देखें: क्या है सही माइलेज चेक करने का तरीका?

मान लीजिए आपके पास एक 40 kWh बैटरी वाली EV है तो इसको गाड़ी के साथ आए AC चार्जर से फुल चार्ज करने पर 40 यूनिट बिजली लगेगी. घर की बिजली दर 6-7-8 रुपये प्रति यूनिट पकड़ लीजिए. AC चार्जर में गर्मी पैदा होती है जिसे चार्जिंग लॉस कहते हैं. और एक चार्जिंग साइकिल में ये 10 से 12 फीसदी तक हो सकती है. तो 40 यूनिट में 4 यूनिट और जोड़ लिया तो टोटल 44 यूनिट हुआ.

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EV को गाड़ी के साथ आए  AC चार्जर से चार्ज करना सस्ता पड़ता है  

अब 44 यूनिट का खर्च 8 रुपये के हिसाब से 352 रुपये आएगा. मान लेते हैं आपकी ईवी रियल लाइफ में 280 किलोमीटर चलेगी. अरे वही जो आप समझ रहे. जिस गाड़ी को आपको 350 किलोमीटर रेंज बोलकर सेल किया गया है वो सड़क पर 280 से ऊपर नहीं जाने वाली. शोरूम से निकलते ही लगभग 30 फीसदी उड़ा दीजिए. शोरूम वाली रेंज को Indian Driving Cycle (IDC) कहते हैं. माने सब कंट्रोल में रखकर गाड़ी का माइलेज या रेंज निकालना. 80 से ऊपर नहीं चलाना और प्लेन रोड में चलाना इसका एक तरीका है. तो अपन 280 किलोमीटर पर रुक लेते हैं.

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खर्च बना 1.25 रुपये प्रति किलोमीटर = 352/ 282. जो एक या डेढ़ रुपये प्रति किलोमीटर भी हो सकता है.

DC का डंक

अब ये खर्च तो तब आएगा जब आप AC वाले चार्जर से हल्लु-हल्लु चार्ज करेंगे. अब जो आप निकल लिए घूमने और आपने पकड़ा हाइवे तो दो बातें होंगी. पहली ये कि हाइवे पर ईवी की रेंज और कम हो जाती है. इधर आपने स्पीड पकड़ी उधर रेंज 282 की जगह 200 भी हो सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि जब ईवी में ब्रेक बहुत कम लगता है तो उसमें रीजनरेटिव एनर्जी नहीं बनती. माने गाड़ी की बैटरी से बैटरी चार्ज नहीं होती जो शहर में ब्रेक लगने पर होता है. दूसरी, बाहर का बड़ा वाला DC चार्जर कम से कम 3.00 से 4.50 प्रति किलोमीटर लेगा. जितना तगड़ा चार्जर उतना ज्यादा चार्ज. माने हाइवे की घूमी-घूमी तो पेट्रोल बराबर पड़ने वाली है.

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इलेक्ट्रिक गाड़ियों को डीसी चार्जर से चार करने में 3 से 4.5 रुपये प्रति यूनिट तक का खर्च आता है 
चक्के का चक्कर

इलेक्ट्रिक कारों के पहिए आम गाड़ी से ज्यादा जल्दी घिसते हैं. यूं तो जब गाड़ी को भगाया जाता है, ब्रेक लगाया जाता है, शार्प टर्न लिया जाता है, तो हर टायर घिसता है. हर रोटेशन पर टायर छोटे-छोटे पार्टिकल्स को छोड़ता रहता है. लेकिन ईवी में ये प्रोसेस थोड़ा ज्यादा होता है. Michelin की रिपोर्ट के हिसाब से इलेक्ट्रिक गाड़ियों में टायर इंटरनल कंबशन इंजन के मुकाबले 20% ज्यादा जल्दी घिसते हैं. माने अगर नॉर्मल गाड़ी का टायर 10 हजार किलोमीटर चलेगा तो ईवी का 8 हजार. रियल वर्ल्ड में जहां पेट्रोल कार के चक्के आसानी से 50 हजार किलोमीटर पार कर जाते हैं वहीं ईवी में मीटर 20 हजार पर भी घिस जाता है.

इसके पीछे वैसे तो टॉर्क, ड्राइविंग स्टाइल, मेंटेनेंस, रीजेनरेटिव ब्रेकिंग, लो-रोलिंग रेजिस्टेंस डिज़ाइन जैसे फैक्टर होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कांड वजन करता है. ईवी गाड़ियां, पेट्रोल के मुकाबले काफी वजनी होती हैं. 300 से 500 किलो का फर्क आमतौर पर होता ही है. उदाहरण के लिए  Toyota Fortuner का वजन 2,080 kg से 2,095 kg है तो Mahindra BE 6e का 2,115 Kg. Tata Nexon EV और पेट्रोल में भी 300 किलो का फर्क है.

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यही वजन चक्कों को जल्दी घिस देता है. पेट्रोल कारों में पावर धीरे-धीरे टायरों तक पहुंचती है, जबकि इलेक्ट्रिक मोटर एक्सीलेटर दबाते ही 100% टॉर्क तुरंत टायरों को ट्रांसफर कर देती है. इससे भी टायर जल्दी घिस जाते हैं. ये घिसना आपके पॉकेट पर सीधे असर डालता है. हर दो साल में 40 से 50 हजार रख लीजिए. 1 हजार किलोमीटर महीने के हिसाब से दो साल के 24 हजार किलोमीटर पर 50 हजार. माने 2 रुपये किलोमीटर तो कहीं नहीं गया.

डीसी के डंक को छोड़ भी दें तो 2 रुपये वाला ये खर्च और डेढ़ रुपये चार्जिंग वाला जोड़ा जाए तो मामला 3.5 रुपये प्रति किलोमीटर आएगा. अभी हमने पेट्रोल और ईवी में कीमत का अंतर तो जोड़ा ही नहीं. अगर ऑटोमेटिक मॉडल से तुलना करें, क्योंकि ईवी तो ऑटोमेटिक होती है, तो पेट्रोल के मुकाबले 2.5 लाख एक्स्ट्रा कहीं नहीं गए. पांच-सात साल में बैटरी रिपेयर करवाने या बदलवाने का खर्च और दुख तो हम जोड़ ही नहीं रहे. 

‘कार’ सार ये है कि ईवी कोई सस्ती नहीं है. ऊपर से रेंज खत्म होने वाली धुकधुकी भी है. बस पेट्रोल का पैसा नहीं देना पड़ता तो मन का भरम बना रहता है. हालांकि ईवी को फ्यूचर माना जा रहा तो उम्मीद है कि आने वाले सालों में कीमतों का अंतर भी घटेगा और टायर भी एडवांस होंगे.

तब तक हैप्पी 'सफरिंग'.

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