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मज़दूरों को बस से लाने को राज्य सरकारें क्यों राज़ी नहीं हैं?

पहले और दूसरे लॉकडाउन के दौरान सबसे बड़ी समस्या रही प्रवासी मज़दूरों की. जो दिहाड़ी मज़दूर अपने शहर, राज्य से बाहर कहीं रहकर काम करते हैं और लॉकडाउन की वजह से वहीं फंसे रह गए.

अब जब दूसरा लॉकडाउन ख़त्म होने वाला है, तो इन सबको वापस लाने का प्लान तैयार किया गया है. प्लान केंद्र की ओर से आया है. लेकिन कुछ राज्य इसके एक पॉइंट से सहमत नहीं हैं- मज़दूरों प्रवासियों को बस से लाने का फैसला.

गृह मंत्रालय की ओर से आए प्लान के मुताबिक, अलग-अलग राज्यों से बस के ज़रिये मज़दूरों को उनके घर भेजा जाना है. लेकिन सात राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने खुले तौर पर कह दिया है कि बस नहीं, ट्रेन के ज़रिये भेजा जाना चाहिए.

ये सात राज्य हैं- तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, बिहार.

राज्यों के तीन तर्क हैं..

1. प्रवासियों की संख्या. जो कि हज़ारों-लाखों में हैं. जैसे कि-

केरल में करीब साढ़े तीन लाख प्रवासी फंसे हुए हैं.

तेलंगाना में करीब 15 लाख.

तमिलनाडु में करीब चार लाख.

और दिल्ली में भी छह लाख से ज़्यादा.

अब सोशल डिस्टेंसिंग का ख़याल रखते हुए एक बस में 25-30 से ज़्यादा लोग तो जा नहीं सकते. ऐसे में कितनी बसें लगाई जाएं कि सब पहुंच जाएं? राज्यों का मानना है कि ट्रेन बेहतर होगी. एक बार में मोटा-मोटा एक हज़ार लोग तो जा ही सकते हैं.

2. लंबी-लंबी दूरी. केरल औऱ तेलंगाना से बड़ी संख्या में प्रवासी वो हैं, जिन्हें बिहार या झारखंड जाना है. यानी करीब ढाई हज़ार से तीन हज़ार किमी दूर. मुंबई के तमाम प्रवासियों को यूपी जाना है. इसी तरह पंजाब से कई यूपी और बिहार जाने वाले हैं. राज्यों का कहना है कि इतनी लंबी-लंबी यात्रा बस से काफी मुश्किल होगी. बेहतर होगा कि नॉन-स्टॉप ट्रेनों के ज़रिये इन्हें अपने-अपने राज्य भेजा जाए.

3. राज्यों के मुताबिक, बस से भेजना ज़्यादा महंगा भी पड़ेगा और इसके लिए ज़्यादा व्यवस्थाएं भी करनी पड़ेंगी. अगर किसी जगह पहुंचने में तीन दिन लग रहे हैं, तो बस में मौजूद लोगों के खाने-पीने की व्यवस्था कैसे होगी? ट्रेन में तो ये फायदा मिल जाता है कि किसी भी स्टेशन पर खाना मंगवाकर लोगों में बांटा जा सकता है. लेकिन बस के साथ ऐसा कर पाने के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ेगी.

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ये तस्वीर सूरत की है. प्रवासी मज़दूर व अन्य लोग घनी दोपहरी की धूप में बैठे अपनी बस का इंतज़ार कर रहे हैं. (फोटो- PTI)

राज्यों ने क्या-क्या जतन किए हैं?

केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन का कहना है –

“हमारे राज्य में 20 हज़ार कैंपों में लोग फंसे हैं. इतने लोगों को गर्मी के मौसम में हज़ारों किमी बस से भेजना काफी थका देने वाला काम होगा. बस से भेजने से वायरस इंफेक्शन का ख़तरा भी ज़्यादा ही है.”

राजस्थान के मुख्यमंत्री ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है कि बस से भेजना किसी भी लिहाज़ से प्रैक्टिकल कदम नहीं है.

पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह का भी कहना है कि –

“हमारे राज्य में अकेले लुधियाना में ही सात लाख से ज़्यादा प्रवासी हैं. पूरे राज्य के प्रवासियों में से 70% से ज़्यादा बिहार से हैं. इतने लोगों को दूसरे राज्य पहुंचाने का एक ही ज़रिया है- ट्रेन.”

क्या रूट के हिसाब से प्लान बनेगा?

बिहार के उप मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील मोदी ने भी बस की बजाय ट्रेन की वकालत कर दी है. इसके बाद से एक ख़बर ये भी आ रही है कि केंद्र दो तरह का प्लान तैयार करने पर विचार कर सकता है. छोटे रूट पर बस और लंबे रूट पर ट्रेनें.

प्रवासियों को उनके घर पहुंचाने के लिए पहली ट्रेन तो चल भी पड़ी है. तेलंगाना के लिंगमपल्ली से झारखंड के हटिया तक के लिए एक स्पेशल ट्रेन चलाई गई है. एक मई की सुबह ट्रेन लिंगमपल्ली से रवाना हुई, रात 11 बजे हटिया पहुंचेगी. इसमें 24 डिब्बे हैं.

रेलवे ने साफ कह दिया है कि अभी केवल एक स्पेशल ट्रेन चलाई गई है. आगे किसी ट्रेन को चलाने की प्लानिंग रेल मंत्रालय के निर्देशों और दोनों तरफ की सरकारों की अपील पर ही की जाएगी. (दोनों तरफ की सरकारें मतलब- जहां से ट्रेन चली वो राज्य, जहां ट्रेन रुकेगी वो राज्य.)

यानी फिलहाल बस तो ऑपरेशन है हीं. ट्रेन का विकल्प भी बंद नहीं है. मुमकिन है कि 3 मई को लॉकडाउन-2 खत्म होने के बाद प्रवासी मज़दूरों, छात्रों को वापस लाने के प्लान में और भी बातें जुड़ें.


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