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पाकिस्तान के नए वज़ीर-ए-आज़म बनेंगे इमरान ख़ान

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तड़के सुबह 4 बजे का वक़्त. पाकिस्तान में चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. चीफ एलेक्शन कमिश्नर मोहम्मद रज़ा खान ने पाकिस्तान के लोगों को बधाई दी. चुनाव के काम में लगे लोगों को शुक्रिया कहा. जिन पुलिसवालों, सुरक्षाबल वालों ने ड्यूटी बजाई, उनका भी आभार जताया. लेकिन इतनी सुबह-सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का मकसद धन्यवाद ज्ञापन नहीं था. वजह थी, नतीजा आने में देरी. 25 जुलाई की शाम वोटिंग ख़त्म हुई थी. तकरीबन 50 से 55 फीसद लोगों ने मतदान किया. अब तक फाइनल रिजल्ट आ जाना चाहिए था. लेकिन आया नहीं. जो लोग चुनाव फिक्सिंग की बातें कर रहे थे, वो नतीजा आने में हो रही देर पर भी सवाल कर रहे हैं. उनके मुताबिक, ये भी इसलिए हो रहा है ताकि वोटों की गिनती मैनेज की जा सके. इस शक़ की एक और ठोस वजह है. कई पार्टियों का कहना है कि उनके पोलिंग एजेंट्स को गिनती की जगह से भगा दिया गया. सारी पार्टियां अपने पोलिंग एजेंट्स तैनात रखती हैं. वहां, जहां वोटों की गिनती हो रही होती है. ताकि ये तसल्ली की जा सके कि गिनती में कोई गड़बड़ तो नहीं हो रही. अगर उन्हें भगाया जा रहा है, तो यकीनन भारी गड़बड़ है. एक और किस्म की कथित धांधली रिपोर्ट हुई है. आरोप है कि कई पोलिंग बूथ्स पर वोटिंग की प्रक्रिया बहुत धीमी थी. इस तरह की धांधली खूब होती हैं. आपको पता है कि इस इलाके में ये पार्टी मजबूत है. वहां वोटिंग धीमी हो जाने से कतारें लंबी हो जाती हैं. इसकी वज़ह से कई लोग या तो बिना वोट डाले लौट जाते हैं या उनका नंबर ही नहीं आता. पाकिस्तान में ऐसा खूब होता रहा है. एक और किस्म की धांधली यहां कॉमन है. किसी खास पार्टी के स्ट्रॉन्गहोल्ड में ऐसे हालात बनाओ कि वोटिंग देर से शुरू हो. फिर चाहे तकनीकी खामी बता दो.

हिंदुस्तान में जैसे चुनाव बराबर त्योहार होता है, वैसा ही हाल पाकिस्तान का भी है.
हिंदुस्तान में जैसे चुनाव बराबर त्योहार होता है, वैसा ही हाल पाकिस्तान का भी है.

ऐसे आरोप लग क्यों रहे हैं?

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पहले ही संगीन आरोप लग रहे थे. ये नए आरोप उन्हीं इल्ज़ामों का एक्सटेंशन हैं. नतीजे आने में हो रही देर की वजह बताते हुए CEC बोले. कि इस दफ़ा नतीज़ों के लिए एक नई तकनीक इस्तेमाल की गई. रिजल्ट्स ट्रांसमिशन सिस्टम. इसकी वजह से ही रिजल्ट आने में देर हो रही है.

काउंटिंग भले पूरी न हुई हो, अंतिम नतीजा भले न आया हो, लेकिन एक अहम बात मालूम चल गई है. इमरान खान सच में ही पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. ये ऐसा ही है जैसे बाज़ार से लौकी आई, कटी, पकने के लिए चढ़ाई गई. कड़ाही से अब उसे थाली में ही तो आना है. कोई सप्राइजिंग फैक्टर नहीं. कोई धप्पा नहीं. अब तक जिन सीटों का मालूम है, उसके मुताबिक इमरान खान की पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़’ (शॉर्ट में PTI) नैशनल असेंबली की करीब 114 सीटों पर आगे चल रही है. नवाज़ शरीफ़ की पार्टी, जिसको इस बार उनके छोटे भाई शाहबाज शरीफ़ आगे ले जा रहे हैं, लगभग 64 सीटों पर आगे है. तीसरे नंबर पर है- PPP पार्लियामेंटेरियन. ये 42 सीटों पर आगे चल रही है.

इमरान की पार्टी और नवाज की पार्टी, दोनों में से कौन जीतेगा ये तय होगा पंजाब में. नैशनल असेंबली की सबसे ज्यादा सीटें वहीं से आती हैं. पंजाब, खासतौर पर सेंट्रल पंजाब नवाज के सपोर्ट का गढ़ रहा है. इमरान इसमें सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)
इमरान की पार्टी और नवाज की पार्टी, दोनों में से कौन जीतेगा ये तय होगा पंजाब में. नैशनल असेंबली की सबसे ज्यादा सीटें वहीं से आती हैं.

रुझान क्या कह रहे हैं?

केंद्र यानी नैशनल असेंबली के साथ प्रांतों के लिए भी चुनाव हुए थे. सबसे बड़े सूबे पंजाब में शरीफ़ की खानदानी पार्टी PML-N आगे है. करीब 129 सीटों पर. मगर इनके लिए परेशानी की बात ये है कि इमरान की PTI बिल्कुल पीछे है. 122 सीटों पर लीड है उनके पास. खैबर-पख्तूनख्वा में PTI 62 सीटों पर आगे है. दूसरे नंबर की मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल, यानी MMA, 12 सीटों पर लीड लेकर बहुत ही पीछे है. सिंध, यानी भुट्टो परिवार का गढ़. भुट्टो के साथ में ज़रदारी साइलेंट है. बिलावल भुट्टो को परेशान होना चाहिए. वो बस 75 सीटों पर आगे चल रही है. PTI ने यहां अच्छी सेंध लगाई है. 22 सीटों पर लीड है उसके पास. बलूचिस्तान में बलूचिस्तान आवामी पार्टी के पास 12 सीटों पर बढ़त है. बलूचिस्तान नैशनल पार्टी नौ सीटों पर आगे है.

इमरान खान चुनाव जीतते नजर आ रहे हैं.
इमरान खान चुनाव जीतते नजर आ रहे हैं.

ये आगे-पीछे जो बताया है, वो सारी सीटों का नहीं है. कई सीटें ऐसी हैं, जिनसे कोई खास खबर अभी तक बाहर नहीं आई. शाहबाज़ शरीफ ने फाइनल रिजल्ट आने के पहले ही नतीज़ा मानने से इनकार कर दिया. वो कह रहे हैं कि धांधली हुई है. बिलावल भुट्टो भी ऐसी ही बातें कर रहे हैं. शायद आप सोचें कि हारी हुई पार्टियां यूं ही अनाप-शनाप बकती हैं. बकती होंगी. ज़्यादातर बेमतलब ही बकती होंगी. 2013 के चुनाव बाद खुद इमरान खान भी यही कह रहे थे. बल्कि 126 दिन लंबे धरने पर भी बैठे थे. लेकिन इस बार का मामला अलग है. इस बार के ये आरोप अनर्गल नहीं हैं.

क्या इमरान का जीतना पहले से फिक्स था?

चुनाव के काफी पहले ही ये बातें थीं कि इमरान का जीतना तय है. क्योंकि सेना उन्हें जितवाना चाहती है. वो किसी ऐसे को लाना चाहती है, जो उनकी बात माने. आप कहेंगे कि सेना अगर ख़ुद ही सरकार बनना चाहती है, तो खुलकर क्यों नहीं कब्ज़ा कर लेती गद्दी पर. ये नई बात तो नहीं होगी. पाकिस्तान का तमाम इतिहास ऐसी ही बातों से भरा पड़ा है. दिक्कत ये है कि अब हालात बदल गए हैं. पाकिस्तान के ऊपर लोकतंत्र दिखने का दबाव है. जब पूर्व आर्मी चीफ राहिल शरीफ और नवाज़ शरीफ के बीच मतभेद की बात आ रही थी, तब ऐसा लग रहा था कि सेना नवाज़ को हटा देगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इमरान खान. फोटोःरोयटर्स
इमरान खान. फोटोःरोयटर्स

अमेरिका ने पाकिस्तान से साफ कहा था. कि दिखना तो यही चाहिए कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार ही मुल्क चला रही है. शायद इसी दबाव में एक और तख्तापलट नहीं हुआ वहां. नवाज़ गए, लेकिन अदालत के रास्ते. यानी अब सेना पर्दे के पीछे रहकर सरकार चलना चाहती है. नवाज़ उसका मोहरा बने रहने को तैयार नहीं थे. भारत और अफ़ग़ानिस्तान से रिश्ते जैसे अहम मुद्दों पर नवाज़ की राय सेना से एकदम अलग थी. वो दोस्ती के पक्ष में थे. रिश्ते सुधारने के हिमायती थे. कहते हैं जब सेना के लिए नवाज़ को संभालना मुश्किल हो गया, तो उसने नवाज़ को रास्ते से हटाने के लिए अदालत का सहारा लिया. न्यायपालिका पर दबाव बनाकर नवाज़ के केस में मनमुताबिक फैसला करवाया. इस्लामाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने खुलेआम ये बात कही. कहा कि आर्मी और ISI ने मीडिया और कोर्ट को मैनेज कर लिया है. अब उन जज साहब के खिलाफ ऐक्शन लिए जाने की खबरें आ रही हैं.

PTI ही PTI, कोई और आगे नहीं आई

चुनाव के पहले तमाम ऐसी खबरें आईं. कि PTI के अलावा और किसी पार्टी को मीडिया में स्पेस नहीं दिया जा रहा. उनको न अखबारों में जगह मिल रही है, न टीवी पर. कई उम्मीदवारों ने आरोप लगाए कि उन्हें तंग किया जा रहा है. कइयों ने कहा कि उनके ऊपर चुनाव से पीछे हटने का दबाव है. इन सब आरोपों के पीछे सेना का चेहरा था. अब वोटिंग और गिनती में गड़बड़ियों की शिकायतें हैं. शिकायतों पर चुनाव आयोग बहुत करेगा, तो एक ट्रिब्यूनल टाइप बना देगा. वो कानूनी रास्ता है. जब चुनाव आयोग पर ही पक्षपात करने का आरोप है, तो उसके बनाए ट्रिब्यूनल से क्यों उम्मीद होनी चाहिए. ये ऐसे मौके होते हैं, जहां एक आज़ाद और निष्पक्ष न्यायपालिका काम आती है. मगर पाकिस्तान में ये रास्ता भी नहीं. क्योंकि वहां अदालतों पर भी गंभीर आरोप हैं. इमरान खान प्रधानमंत्री बन जाएंगे. अच्छे या बुरे, ये अलग बात है. मतलब बाद की बात है. मगर फिलहाल तो उनके और सेना के सामने ये साबित करने की चुनौती है कि आखिरकार चुना वही गया, जिसे जनता से चुना था.

pakistan flag jpg

इन आरोपों और आज़ादी-धांधली की धुकधुकी के बीच मायूसी स्वाभाविक है. धांधली न भी हुई हो, तो भी. क्योंकि लोकतंत्र पर ऐसे अंगुली उठना ही अपने-आप में एक मुकम्मल हार है. फिलहाल तो इस चुनाव का टेकअवे यही चंद बातें हैं-

– पाकिस्तान में पहली बार आतंकवादी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे. माथा तो इसी बात पर पीटा जाना चाहिए कि उनको ये करने की अनुमति ही क्यों दी गई. सिल्वरलाइनिंग ये है कि पाकिस्तान की जनता ने उनको ठेंगा दिखा दिया.

– कई कबीलाई और कट्टरपंथी इलाकों में पहली बार औरतें वोट डालने पहुंची. पोलिंग बूथ्स पर भी औरतों की लंबी कतारें दिखीं. तकरीबन 2,000 महिलाओं ने चुनाव भी लड़ा. इनमें खैबर पख्तूनख्वा की एक ऐसी महिला प्रत्याशी भी थी, जो मोटरसाइकल पर बैठकर चुनाव प्रचार कर रही थी. ऐसा नहीं कि देखनेवालों की भंवें न उठती हों. उठती थीं, लेकिन उस महिला उम्मीदवार का अंदाज़ ऐसा था, मानो दुनिया मेरे ठेंगे से.

– पाकिस्तान की जनता को भले ही सेना का राज मिला हो, मगर इतने सारे लोगों का वोट डालने पहुंचना सबूत है कि जनता लोकतंत्र चाहती है. वो चुनना चाहती है.


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