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गुजरात पुलिस ने हिज्बुल आतंकी बता 11 साल जेल में रखा, अब जाकर कश्मीर लौटा NGO ऑफिसर

कंप्यूटर प्रोफेशनल बशीर अहमद बाबा 23 जून 2021 को अपने घर श्रीनगर लौटे, 11 साल बाद. वह गुजरात में एक कैंसर कैंप में हिस्सा लेने गए थे. लेकिन आतंकवाद फैलाने के आरोप में 11 साल गुजरात की जेल काट दिए. गुजरात पुलिस ने उनके ऊपर आतंकवाद विरोधी कानून UAPA का केस बनाया था. लेकिन कोर्ट में पुलिस इसे साबित नहीं कर पाई. कोर्ट ने 19 जून को बशीर अहमद बाबा को रिहा कर दिया. आइए बताते हैं, क्या है बशीर अहमद की कहानी जिन्हें बेगुनाही साबित करने में इतना लंबा समय लग गया.

कैंसर कैंप में गए, गिरफ्तार कर लिए गए

21 मार्च 2010. गुजरात एटीएस ने बशीर अहमद बाबा को आणंद के एक हॉस्टल से गिरफ्तार किया. उन पर आरोप लगाया गया कि वो 2002 के दंगों के चलते नाराज मुस्लिम युवकों को हिजबुल मुजाहिदीन में भर्ती कराने की तैयारी में थे. गुजरात में टेरर नेटवर्क खड़ा करने के लिए रेकी करने आए थे. पुलिस का दावा था कि बशीर हिजबुल के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन और अहमद शेरा के साथ फोन और ई-मेल के जरिए संपर्क में है. बाबा पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया. कोर्ट में 11 साल से यह मामला चल रहा था.

बशीर अहमद बाबा के वकीलों ने अदालत में कहा कि वो कैंसर मरीजों की देखभाल के लिए आयोजित 4 दिन के कैंप में शामिल होने गुजरात आए थे. कैंसर कैंप का अनुभव लेने के बाद घाटी में जाकर मरीजों को ‘किमाया फाउंडेशन’ के जरिए सेवाएं देना चाहते थे. बता दें कि बाबा गुजरात की बड़ी एनजीओ के प्रोजेक्ट हेड के तौर पर कश्मीर में काम करते थे. अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस को बाबा ने बताया कि वह यह सोचकर कश्मीर से निकले थे कि 15 दिन की ट्रेनिंग पूरी करके घर वापस आ जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कोर्ट ने कहा, पुलिस कुछ भी सिद्ध नहीं कर पाई

11 साल में गुजरात पुलिस कोर्ट में यूएपीए के तहत बाबा पर अपना कोई भी आरोप सिद्ध नहीं कर पाई. 87 पन्नों के फैसले में आणंद जिले के चौथे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एसए नकुम ने कहा,

“ये आरोप कि आरोपी गुजरात में रुका और आणंद में 13 मार्च को मिला, साबित नहीं हो पाया. उसे गुजरात में आतंकी नेटवर्क स्थापित करने के लिए आर्थिक मदद मिली है, यह भी साबित नहीं हुआ है. ना ही इस बात का कोई सबूत पेश किया गया कि वह टेरर मॉड्यूल स्थापित कर रहा था.”

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष स्पष्ट रूप से आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने में असफल रहा है. बाबा के वकील खालिद शेख ने बताया कि एटीएस ने यह तर्क दिया था कि बाबा ने कैंप के डॉक्टर के लैपटॉप का इस्तेमाल करके पाकिस्तान में हिजबुल के हैंडलर्स को ईमेल भेजे थे. एटीएस ने यह भी कहा था कि बाबा को खाना या नमाज के नाम पर कई बार कैंप से निकलते और संदिग्ध फोन लगाते देखा गया था. शेख ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार को बताया कि बाबा ने यह कैंप श्रीनगर के एक डॉक्टर की सिफारिश पर जॉइन किया था. उनकी 28 फरवरी 2010 की वापसी की टिकट बुक थी. तभी एटीएस ने उन्हें पकड़ लिया और टीवी पर हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी की तरह पेश कर दिया.

घर आकर खुशी भी और ग़म भी

11 साल बाद घर लौटने पर बाबा ने कहा कि उन्हें आजाद होने की खुशी तो है लेकिन दुख भी है. श्रीनगर वापस आने पर उनका स्वागत उनके भाई के दो बच्चों ने किया. उन बच्चों ने बाबा को कभी नहीं देखा था. 7 साल तक न्याय का दरवाजा खटखटाने के बाद 2017 में बशीर अहमद बाबा के पिता का निधन हो गया. जेल में रहने के दौरान बशीर अहमद बाबा ने पॉलिटिक्स और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए की डिग्री हासिल कीं. अपनी वापसी पर बाबा ने कहा-

 “मुझे वापस आकर बहुत खुशी हो रही है, साथ में दुख भी है. मुझे पता था कि मैं बेगुनाह हूं इसलिए मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी. मुझे पता था कि मैं किसी न किसी दिन जरूर बाइज्जत रिहा होऊंगा.”

बता दें कि ये फैसला ऐसे समय सामने आया जब देश में यूएपीए कानून को लेकर बहस चल रही है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी यूपी सरकार के यूएपीए कानून के इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए थे. हाल में दिल्ली दंगों के तीन आरोपियों को बेल देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने भी यूएपीए के बेजा इस्तेमाल पर चेतावनी दी थी.


वीडियो – क्या सरकारें UAPA जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल सिर्फ विरोध को दबाने के लिए कर रही हैं?

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