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कासगंज: अकरम ने कहा, मेरी आंख फोड़ने वालों को अल्लाह माफ करे

आप सोशल मीडिया पर हैं? फेसबुक इस्तेमाल करते हैं? फिर तो पिछले तीन-चार दिनों में आपने वो वाली तस्वीर पक्का देखी होगी. एक कार. कार के अंदर ड्राइविंग सीट पर बैठा आदमी. बेहोश. एक आंख फूटी हुई. वहां से खून बहता हुआ. ये तस्वीर कासगंज दंगे का एक फ्रेम है. फोटो में जो शख्स दिख रहा है, उसका नाम अकरम हबीब है. 26 जनवरी को वहां जो हिंसा हुई, उसने अकरम का ये हश्र किया. बेबात. बिना किसी कसूर के. बहुत गुस्सा होना चाहिए था उनको! अपने साथ ऐसा करने वालों को कोसना चाहिए था! हम में से कोई उसकी जगह होता, तो ये ही करता न. मगर अकरम अलग हैं. उनके मन में किसी के लिए नफरत नहीं. पता है उन्होंने क्या कहा है? नवभारत टाइम्स अखबार के मुताबिक उन्होंने कहा:

जिन्होंने मेरी आंख फोड़ी, अल्लाह उन्हें माफ करे. मेरे मन में उनके लिए कोई मैल नहीं. मैं बहुत खुश हूं कि मैं अपनी बेटी का चेहरा देख सका. और कोई बात मेरे लिए मायने नहीं रखती. जिन्होंने मेरा ये हाल किया, मैं उन्हें कोई बददुआ नहीं देना चाहता. 

कासगंद दंगे के दौरान हुई हिंसा में एक शख्स मारा गया. नाम था- चंदन गुप्ता.
कासगंद दंगे के दौरान हुई हिंसा में एक शख्स मारा गया. नाम था- चंदन गुप्ता.

अनम. अकरम की पत्नी. प्रेगनेंट थीं. अकरम खुद लखीमपुर खीरी के हैं. कासगंज में अनम का मायका है. वो वहीं पर थीं. 27 जनवरी तारीख को अनम की डिलिवरी की तारीख थी. इसीलिए 26 जनवरी के दिन अकरम कासगंज आए. ताकि जब डिलिवरी हो, तो वो अपनी बीवी के साथ हों. बच्चे को देख सकें. मगर 26 तारीख को ही कासगंज में दंगा हो गया. हालात बिगड़ता देख अकरम और अनम ने उसी दिन अलीगढ़ जाने का फैसला किया. सोचा, रात के सुनसान में गांव के रास्ते चुपके से निकल जाएंगे. कार में निकले. मगर इससे पहले कि अस्पताल पहुंच पाते, भीड़ उन तक पहुंच गई.

अकरम की आपबीती सुनिए:

मैंने रास्ते में कुछ लोगों को देखा. रास्ता पूछने के लिए मैंने कार रोकी. उन्होंने मेरी दाढ़ी देखी. उन्हें लग गया कि मैं मुसलमान हूं. पत्थरों से, डंडे से उन्होंने मुझे खूब पीटा. बेरहमी से पीटा. मेरी बीवी चिल्लाती रही. रोती रही. मैंने उनके आगे हाथ जोड़े. गिड़गिड़ाया. फिर आखिरकार उन्होंने मुझे जिंदा छोड़ दिया. शायद उन्हें मेरी प्रेगनेंट बीवी पर दया आ गई. लगता है उनमें से कुछ के अंदर थोड़ी सी इंसानियत बची हुई थी.

अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में अकरम का इलाज हुआ. जब भीड़ ने उन्हें छोड़ा, तो वो बहुत बुरी हालत में थे. आंख से खून बह रहा था. ऐसी हालत में भी वो खुद कार चलाकर अस्पताल तक पहुंचे.
अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में अकरम का इलाज हुआ. जब भीड़ ने उन्हें छोड़ा, तो वो बहुत बुरी हालत में थे. आंख से खून बह रहा था. ऐसी हालत में भी वो खुद कार चलाकर अस्पताल तक पहुंचे.

जब भीड़ ने अकरम को छोड़ा, तब तक उनकी एक आंख फूट चुकी थी. बेतहाशा खून निकल रहा था. उस हालत में भी वो अपनी बीवी को कार में बिठाकर खुद गाड़ी चलाते हुए अस्पताल तक पहुंचे. अकरम पिता बने हैं. एक बेटी हुई है उनको. अब अपनी एक सलामत बची आंख से ही वो अपनी बच्ची को देख सकेंगे. इस बात पर खुश होना चाहिए या रोना चाहिए?

अगल-बगल घरों, दुकानों में आग लगी थी. गाड़ियां जल रही थीं. धुआं-धुआं हो रहा था. मुझे कुछ दिख नहीं पा रहा था. मैं कार की खिड़की से बाहर की ओर निकलकर रास्ता देख रहा था. और ड्राइव करता जा रहा था. मुझे बमुश्किल ही कुछ दिख रहा होगा. मेरे दिमाग पर बस एक ही बात हावी थी. कि किसी तरह अपनी बीवी को जिंदा बचा लूं. उसे अस्पताल पहुंचा दूं.

कासगंज में तनाव बना हुआ है. अफवाहों के कारण हालात और न बिगड़ें, इसलिए एहतियातन यहां इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं.
कासगंज में तनाव बना हुआ है. अफवाहों के कारण हालात और न बिगड़ें, इसलिए एहतियातन यहां इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं.

सोचिए. कभी हम अकरम सी हालत में हों, तो? कि एक दिन रोज की तरह घर से निकलें और फिर कभी न लौटें. इसलिए कि बाहर कोई दंगा छिड़ जाए और हम बेबात उसमें झुलस जाएं. मारे जाएं. बस इसलिए कि मारने वालों का मजहब मेरे धर्म से अलग हो. बिना किसी गलती के. बिना किसी गुनाह के. कितना बुरा होगा वो दिन!


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