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क्या सिकुड़ता जा रहा है लाल गलियारा?

अबूझमाड़ का शाब्दिक मतलब होता है ‘न समझी जा सकने वाली घाटियां’. छत्तीसगढ़ के नारायणपुर इलाके का घना जंगल जिसका एक सिरा महाराष्ट्र और दूसरा आंध्र प्रदेश में धंसा हुआ है. 5000 वर्ग किलोमीटर तक जहां ना कोई सड़क है. ना ही सरकार. यहां नक्सली अपनी सरकार चलाते हैं. अपने स्कूल चलाते हैं. यहां तक कि फसलचक्र भी निर्धारित करते हैं. लेकिन नक्सलियों की असल राजधानी है सुकमा. छत्तीसगढ़ का वो जिला जो ओडिशा और तेलंगाना के संधिस्थल पर खड़ा है.

नक्सलियों पर भारी पड़ रहे हैं हमारे जवान 

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हालांकि सुकमा हमले के बाद एक बार फिर से आतंरिक सुरक्षा पर गरमा-गरम बहस छिड़ गई है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि लाल गलियारा लगातार सिकुड़ता जा रहा है. कम से कम आंकड़े तो इसी बात की गवाही देते हैं. सन 2010 में नक्सली हिंसा में शहीद होने वाले जवानों की संख्या 1180 थी. इसमें दंतेवाडा की कुख्यात मुठभेड़ भी शामिल है, जिसमें 76 जवानों ने अपनी जान गंवाई थी. यह आंकड़ा पिछले साल महज 161 पर सिमट गया. 2016 ऐसा साल था जब हमने पिछले 15 साल में सबसे कम जवान खोए थे. इसी साल सुरक्षा बलों ने कम से कम 134 माओवादी मार गिराए. 250 हथियार जब्त किए. माओवादियों के खिलाफ यह ऐतिहासिक कामयाबी आखिर मिली कैसे?

कौन हैं माओवादियों का सबसे बड़ा दुश्मन 

ये इसी साल के मार्च की 11वीं तारीख की बात है. सुबह के सवा 9 बज रहे थे. उत्तर प्रदेश के चुनाव के शुरुआती रुझान आना शुरू हो गए थे. ठीक इसी समय सुकमा के पास इंजरम और भेज्जी के बीच कोत्ताचेरू इलाके में 100 जवान रोड निर्माण की सुरक्षा के लिए और सौ जवान निर्माण स्थल के लिए रवाना हुए. उसी समय उनकी गाड़ी पर आईईडी से हमला हुआ. इसके बाद गोलीबारी हुई और 12 जवान शहीद हो गए. 24 अप्रैल के हमले में भी जवान दोरनापाल और जगरगुंडा के बीच बन रही 56 किलोमीटर रोड की सुरक्षा के लिए निकले थे.

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आखिर वो कौनसा दुश्मन है जिससे नक्सली सबसे ज्यादा खौफजदा हैं. जवाब है सड़क. सड़कें न सिर्फ आवाजाही को आसान बना कर उस क्षेत्र में विकास के द्वार खोलती हैं बल्कि वो सुरक्षा बलों की पहुंच को भी मजबूत बनाती हैं. यही वजह है कि सड़कें और उनकी देखरेख में लगे जवान नक्सलियों के निशाने का केंद्र बने हुए हैं. 31 जनवरी 2016 तक के डेटा बताते हैं कि सड़क और परिवहन मंत्रालय ने 34 गंभीर रूप से नक्सल प्रभावित जिलों में 3,904 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया है. अभी 5,422 किलोमीटर सड़क और बनाई जानी प्रस्तावित है.

पुलिस का खुफिया हथियार 

27 साल जीतूराम सवलम किसी समय छत्तीसगढ़ पुलिस के लिए ईनामी अपराधी हुआ करते थे. वो एक हार्डकोर नक्सली थे जिन्होंने सुरक्षा बालों के खिलाफ कई हमलों में भाग लिया था. वो अपनी पत्नी पोज्जे के साथ कैंप से दूर निकल गए. यहां उन्होंने अपने कपड़े बदले. राइफल को अलविदा कहा और तथाकथित क्रांति की तरफ पीठ घुमा कर शहर की तरफ बढ़ चले. जंगल के रास्ते निहत्थे चल रहे जोड़े के लिए जान के जोखिम पर किया जाने वाला सफ़र था. यहां आ कर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. उन्हें पुलिस में भर्ती कर लिया गया.

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गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल 1442 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया. यह आंकड़ा 2015 के 397 के आंकडे से लगभग तीन गुना ज्यादा है. ये पूर्व नक्सली सुरक्षाबलों के लिए अहम जानकारियों की खदान हैं. इससे उन्हें निर्णायक सफलता मिली है. नक्सल ऑपरेशन और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो के महानिदेशक दुर्गेश माधव अवस्थी कहते हैं

“हम लगातार ख़ुफ़िया सूचना को आधार बना कर ऑपरेशन को अंजाम दे रहे हैं.पिछले 18 महीने में हमने हर सप्ताह दो-तीन माओवादी कैम्पों को अपना निशाना बनाया है. जबकि उनकी तरफ से हमारे किसी भी कैंप पर कोई हमला नहीं हुआ है.”

नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी है 

तो क्या सचमुच लाल गलियारा सिकुड़ रहा है? कम से कम तथ्य तो यही कहते हैं. 17 मार्च को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में जानकारी दी कि नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 106 से घट कर 68 रह गई है. इसमें से 35 जिले गंभीर रूप से प्रभावित हैं. जबकि 2004 के आंकडे बताते हैं कि नेपाल सीमा से लेकर केरल तक 9 राज्यों में देश का 27 फीसदी इलाका और 39 फीसदी जनसंख्या किसी ना किसी तरह से माओवाद की जद में थी. इस हिसाब से देखा जाए तो माओवाद अपनी ऐतिहासिक गिरावट पर है. हालांकि इंस्टिट्यूट फॉर कंफ्लिक्ट मैनेजमेंट के एक्जीक्यूटिव डाइरेक्टर अजय साहनी का बयान किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पढ़ा जाना लाजमी हो जाता है. वो कहते हैं,

“अभी से जीत की घोषणा कर देना थोड़ी जल्दबाजी होगी और हम थोड़ा नरम भी हो गए हैं. माओवादियों के पास बड़े ऑपरेशन करने और बड़े नुक्सान पहुंचाने का माद्दा है. उन्होंने ये बार-बार ऐसा कर के भी दिखाया है.”


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