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इरफ़ान के लिए महाराष्ट्र के ये गांव वाले अपनी जगह का नाम क्यों बदल रहे हैं?

कुछ लोग होते हैं, जो दुनिया में आते हैं और एक दिन चुपचाप चले जाते हैं. वहीं कुछ लोग इस छोटी-सी ज़िंदगी में जाने कितनों का दिल छू जाते हैं. इरफ़ान चले गए हैं, लेकिन बहुत कुछ पीछे छोड़ गए हैं. फिल्में, किस्से-कहानियां, फोटो, इंटरव्यू, उनके विचार, यादें. अब महाराष्ट्र के एक गांव से उनसे जुड़ी हुई एक ख़ास खबर सामने आई है.

महाराष्ट्र के नासिक डिस्ट्रिक्ट में इगतपुरी नाम का एक हिल स्टेशन है. 10 साल पहले इरफ़ान ने यहां एक फार्महाउस खरीदा था. कभी-कभार वीकेंड पर यहां आते थे रिलैक्स करने के लिए. उनके फार्महाउस के आसपास कुछ आदिवासी गांव हैं – त्रिंगलवाड़ी, कुशेगांव, मोरले, परदेवी, पत्राच्‍या वाड़ा. यहां के लोगों के हालात अच्छे नहीं थे. स्कूलों में मौलिक सुविधाएं नहीं थीं. स्वास्थ्य सेवाएं भी दुरुस्त नहीं थीं.

इरफ़ान बने लोगों के लिए एक फ़रिश्ता

यहां के एक लोकल नेता और जिला परिषद के सदस्य गोरख बोडके उनसे मिले. उन्होंने इरफ़ान से एक एम्बुलेंस की गुज़ारिश की, ताकि एमरजेंसी में लोगों को नज़दीकी मेडिकल सेंटर ले जाया जा सके. इरफ़ान ने डेढ़ महीने के अंदर एक एम्बुलेंस डोनेट कर दी. उसके बाद वे इस इलाक़े के विकास में दिलचस्पी लेने लगे. वे जब यहां आते, तो गोरख उनसे एक लोकल ढाबे पर लंच के दौरान मिलते. फिर से कोई नई रिक्वेस्ट करते. इरफ़ान को याद करते हुए वे बताते हैं:

“वे बहुत से परिवारों के लिए एक फ़रिश्ता थे. जब भी किसी ने उनसे मदद मांगी, तो उन्होंने कभी किसी को ‘ना’ नहीं कहा.”

हर साल इरफ़ान गांव के स्कूलों में पढ़ रहे आदिवासी परिवारों के 1000 से ज़्यादा बच्चों के लिए सामान डोनेट करते. किताबें, नोटबुक, रेनकोट, स्वेटर. त्योहार पर उनके लिए मिठाई भेजते. उन्होंने बच्चों के लिए बारह कंप्यूटर भी मुहैया करवाए, ताकि यहां के बच्चे भी डिजिटल दुनिया का हिस्सा बन सकें. गोरख बताते हैं कि जब भी वहां के लोगों को जरूरत पड़ी, उन्होंने हमेशा इरफ़ान को साथ खड़े हुए पाया.

यहां का बच्चा-बच्चा उनकी फिल्मों का फैन है

आसपास के दर्जनभर गांवों में कई किलोमीटर तक कोई सिनेमाहॉल नहीं है. लेकिन यहां रह रहे हरेक परिवार ने इरफ़ान की फिल्में देखी हैं. यहां के बच्चे 10 साल पहले इरफ़ान से पहली बार यहां के खेतों में मिले. तब से ये लोग उनकी कोई भी फिल्म देखने से नहीं चूके हैं. इनमें से कई तो स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों में बैठकर 30 किलोमीटर दूर नासिक तक जाते हैं और वहां स्क्रीन पर इरफ़ान को देखते हैं. कुछ लोग उनकी फिल्मों को टीवी पर दिखाए जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं. उनके लिए इरफ़ान केवल एक फ़िल्मी हीरो नहीं हैं, बल्कि एक असली हीरो हैं, जिन्होंने यहां के स्कूलों को सपोर्ट कर उनकी ज़िंदगी को सुधारा है.

अपने हीरो को श्रद्धांजलि

इन गांवों के लोगों को जब इरफ़ान के देहांत के बारे में पता चला, तो यहां शोक की लहर फैल गई. उनकी याद में इन लोगों ने एक फैसला लिया है. जहां इरफ़ान का फार्महाउस है, उस लोकैलिटी का नाम बदल दिया है. गोरख कहते हैं:

“हम फॉर्मल रूप से इसका नाम हीरो-ची-वाड़ी रखने वाले हैं.”

इस मराठी नाम का मतलब है- हीरो का पड़ोस.


वीडियो देखें: जिमी शेरगिल ने इरफान को याद करते हुए भावुक कर दिया

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