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जानिए श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और LTTE में क्या कनेक्शन है?

भारत का सुदूर दक्षिणी हिस्सा हिन्द महासागर से घिरा है. उसी समंदर के बीचोंबीच हमारा एक पड़ोसी बसता है. पड़ोसी भी ऐसा जिससे सदियों का नाता रहा हो. उसके घर में बर्तन भी गिरे तो खनक हम तक पहुंचती है. इस पड़ोसी का नाम है श्रीलंका. यहां 16 नवंबर, 2019 को जनता ने नया राष्ट्रपति चुनने के लिए मतदान किया था. रविवार, 17 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए. गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका के नए राष्ट्रपति का चुनाव जीत चुके हैं. वो मैत्रीपाल सिरिसेना की जगह लेंगे.

कौन हैं गोटाबाया राजपक्षे ?

महिंदा राजपक्षे का नाम सुना है! 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रह चुके हैं. गोटाबाया उन्हीं के छोटे भाई हैं. आर्मी अफसर थे. लिबरेशनल टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम(LTTE) का खात्मा करने में गोटाबाया का अहम हाथ है. वो उस वक्त देश के रक्षा प्रमुख थे. 2009 में पूरे श्रीलंका में आर्मी ने ऑपरेशन चलाकर 26 साल पुराने तमिल विवाद को समाप्त किया था. LTTE वही आतंकी संगठन है जिसने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची थी.

Gotabaya Rajpaksha Sri Lanka
महिंदा राजपक्षे के भाई हैं. ईस्टर बम धमाके के बाद चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. (फोटो साभार : ट्विटर)

गोटाबाया की जीत से कई लोग हैरान भी हैं. गोटाबाया पर ह्यूमन राइट्स के हनन के आरोप लगते रहे हैं. उनपर 2007 और 2009 के ऑपरेशन के दौरान मानवाधिकारों को कुचलने के आरोप भी लगे थे.

गोटाबाया राजपक्षे की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बधाई दी है. उन्होंने लिखा,

राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले गोटाबाया राजपक्षे को बधाई. दोनों देशों और यहां के नागरिकों की शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए हम साथ मिलकर काम करेंगे.

इस ट्वीट के जवाब में गोटाबाया ने भी पीएम मोदी और भारत के लोगों का शुक्रिया कहा. ट्वीट किया,

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के लोगों को शुक्रिया कहना चाहूंगा. दोनों देश साझा इतिहास और विश्वास की डोर से जुड़े हैं. इस दोस्ती को और मजबूत बनाने के लिए हम मिलकर काम करेंगे. जल्द ही आपसे मिलूंगा.

क्या कहते हैं नतीजे?

श्रीलंका में राष्ट्रपति के पास अधिकतर शक्तियां होती हैं. प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है. श्रीलंका में राष्ट्रपति का टर्म पांच साल के लिए होता है. राष्ट्रपति को टर्म के बीच में पद से हटाया जा सकता है. लेकिन उसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी चाहिए.

ये चुनावी टक्कर मुख्य तौर पर दो नेताओं के बीच की थी. गोटाबाया राजपक्षे और सजित प्रेमदासा. इस वक्त श्रीलंका के राष्ट्रपति का पद मैत्रीपाल सिरिसेना के पास है. उन्होंने ये चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. सिरिसेना राजपक्षे को सपोर्ट कर रहे थे. गोटाबाया इस चुनाव में श्रीलंका पोडुजना पेरुमना पार्टी के कैंडिडेट थे.

सजित प्रेमदासा को हार का सामना करना पड़ा है. गोटाबाया को इस चुनाव में 52.25 प्रतिशत वोट मिले, जबकि प्रेमदासा 41.99 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे. सजित प्रेमदासा श्रीलंका के दिवंगत राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के बेटे हैं. वो यूनाइटेड नेशनल पार्टी के टिकट पर ये चुनाव लड़ रहे थे. प्रेमदासा ने अपनी हार स्वीकार कर ली है.

इस नतीजे के मायने क्या हैं?

इस देश का क्षेत्रफल 65 हजार वर्ग किलोमीटर है. उत्तर प्रदेश का जितना एरिया है, उसमें तीन श्रीलंका आराम से समा जाएंगे. आबादी 2.2 करोड़ के लगभग है. श्रीलंका में सबसे बड़ी आबादी सिंहली बौद्धों की है. लगभग 70 पर्सेंट. 12.6 प्रतिशत लोग तमिल हिंदू हैं. 10 प्रतिशत ईसाई और 8 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है. 21 अप्रैल 2019 को श्रीलंका में ईस्टर मनाया जा रहा था. उस दिन श्रीलंका में तीन चर्च और तीन बड़े होटलों में बम धमाके हुए. 269 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग बुरी तरह से घायल हुए. इस धमाके के बाद श्रीलंका में मुसलमानों के प्रति माहौल बनने लगा था. धर्मगुरुओं ने मांग की थी कि मंत्रिमंडल में शामिल मुसलमानों को उनके पद से हटाया जाए. कई मुस्लिम मंत्रियों ने अपने पद से अस्थायी तौर पर इस्तीफा दिया था.

Gotabaya R Sri Lanka
गोटाबाया ने सजित प्रेमदासा को शिकस्त दी है. (फोटो साभार : ट्विटर)

ईस्टर हमले के बाद चुनाव लड़ने का ऐलान

इस घटना के फौरन बाद ही गोटाबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. जानकारों का मानना है कि गोटाबाया के राष्ट्रपति बनने के बाद श्रीलंका में अल्पसंख्यकों का अधिकार खतरे में होगा. श्रीलंका के राजनीतिक गलियारे में राजपक्षे परिवार का दबदबा है. महिंदा राजपक्षे के एक भाई चमल राजपक्षे 2010 से 2015 तक श्रीलंका की संसद के स्पीकर थे.

राजपक्षे परिवार को चीन का करीबी माना जाता है. भारत के लिए ये चिंता का विषय है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है कि महिंदा राजपक्षे के प्रेसिडेंट रहने के दौरान चीन की पनडुब्बियां भारत के दक्षिणी समुद्री बॉर्डर की निगहबानी करती थी. इसे भारत की सुरक्षा पर एक खतरे की तरह देखा जाता है.

श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. महिंदा राजपक्षे ने अपने कार्यकाल के दौरान चीन से खूब सारा कर्ज लिया था. कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है. श्रीलंका ये कर्ज चुकाने की हालत में नहीं है. इस वजह से उसे चीन को हमबनटोटा बंदरगाह को लीज पर देना पड़ा. 99 साल के लिए. साथ में बंदरगाह के आसपास की 15 हजार एकड़ की जमीन भी.

इस पड़ोसी देश में सरकार बदलने से भारत पर क्या फर्क पड़ता है, ये तो आने वाला समय ही बताएगा!


वीडियो : अर्थात: मोदी सरकार का RCEP में शामिल न होने का फैसला क्या चीन पर चोट है?

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