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JNU छात्र की मौत पर विरोध लाज़मी है, लेकिन तथ्यों पर तो हो!

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में मुथुकृष्णन जीवनंथम नाम के एक छात्र ने सोमवार को खुदकुशी कर ली. नाम मुथुकृष्णन था, पर वो रजनीकांत की एक्टिंग करते थे, शायद इसीलिए रजनी कृष कहलाते थे. अपना फेसबुक अकाउंट भी उन्होंने इसी नाम से बनाया था.

मुथु सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़ की पढ़ाई कर रहे थे. सामने जिंदगी पड़ी थी, पर उन्होंने मौत चुनी. अपने लिए चुनी हुई मौत हमेशा ज्यादा दुखी करती है. लेकिन इस दुखद खबर के बीच एक ऐसी बात भी हो गई, बल्कि लगातार हो रही है, जिसके बारे में हमें थोड़ा रुककर सोचना चाहिए.

मुथुकृष्णन (फोटोःफेसबुक)
मुथुकृष्णन (फोटोःफेसबुक)

मुथुकृष्णन दलित समाज से आते हैं और दलितों के हिस्से संघर्ष ज्यादा आया है. लेकिन उनकी मौत का कारण स्पष्ट हुए बगैर उन्हें ‘रोहित वेमुला-2’ जैसे विशेषण दिए जाने लगे. उनकी खुदकुशी को तुरंत ‘सांस्थानिक हत्या’ कहा जाने लगा. बेहद जल्दबाजी में उनके पुराने फेसबुक पोस्ट्स के अतिरिक्त अर्थ निकाले गए.

जेएनयू छात्रसंघ की पूर्व उपाध्यक्ष शहला राशिद ने ये लिखाः

 

 शेहला राशिद के ट्विटर अकाउंट से
शेहला राशिद के ट्विटर अकाउंट से

शेहला राशिद के ट्विटर अकाउंट से

फिलहाल पुलिस का कहना है कि मुथुकृष्णन के पास कोई सुसाइड नोट मिला है और इशारा किसी निजी मामले की ओर है. पुलिस की बात पर भरोसा न किया जाए, लेकिन सांस्थानिक हत्या के कुछ इशारे मिलने का इंतजार तो कर लिया जाए. यूनिवर्सिटी में एक दलित छात्र की खुदकुशी बहुत दुखद है. इस पर माइलेज लेने वाली सियासत न हो. अगर आगे जांच में ऐसे इशारे मिलें कि मुथू की खुदकुशी की वजह सिस्टम से नाराजगी है तो जरूर इसके खिलाफ प्रदर्शन हो. औऱ पुरजोर प्रदर्शन हो. लेकिन प्रधानमंत्री के अंध-विरोध में ऐसी वजहें न खोजिए, जो तर्क और तथ्य को डस्टबिन में डाल देती हों. 

रोहित वेमुला किसी के नायक हैं या नहीं, ये निजी मामला हो सकता है. लेकिन उन्होंने अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा था कि दलित होने की वजह से उन्हें जीवन में बहुत भेदभाव झेलना पड़ा. लेकिन अब तक मुथुकृष्णन के मामले में ऐसा कुछ सामने नहीं आया है. अगर किसी को संदेह है तो संदेह की भाषा में लिखा जाए. लेकिन सोशल मीडिया पर निष्कर्षों की भाषा में लिखा जा रहा है. पॉलिटिकल माइलेज लेने का ये खेल दुख देने वाला है.

जेएनयू में छात्र संघ चुनाव लड़ने वाली बापसा का ये फेसबुक पोस्ट देखें:

बापसा के फेसबुक पेज सेः

दलितों को कमोबेश अपना सफर ज़ीरो से शुरू करना पड़ता है. उनका कोई बैकग्राऊंड नहीं होता. इसलिए उनके संघर्ष को हर मंच पर बराबर जगह मिलनी चाहिए. खासतौर पर उनके खिलाफ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ जमकर आवाज़ उठाई जानी चाहिए. लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि हमारे पूर्वाग्रह, हमारी पसंद ना पसंद तथ्यों पर हावी न हो जाएं.

‘सिस्टम’ से ऐतराज़ रखना हमारा हक है. लेकिन उस हक की आड़ में पहली फुरसत में सिस्टम को गरियाने से बचना चाहिए. मुथुकृष्णन के मामले में बेहतर यही होता कि पहले जांच का शुरुआती बिंदु, मौत की असल वजह तो सामने आने दी जाती.

इस मामले से जुड़े मौजूदा तथ्य हम यहां दे रहे हैंः

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुथुकृष्णन जेएनयू कैंपस में होली मनाने के बाद मुनिरका विहार में अपने एक दोस्त के यहां चले गए थे. वहां खाने के बाद दोपहर 1.30 के करीब आराम करने का कहकर एक कमरे में गए और उसे अंदर से बंद कर लिया. काफी देर तक दरवाज़ा न खुलने पर शाम पांच बजे पुलिस को खबर की गई. पुलिस जब दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुसी तो मुथुकृष्णन की लाश पंखे से लटकी हुई थी.

तमिलनाडु के सालेम के रहने वाले मुथुकृष्णन एक गरीब परिवार से थे. मुथुकृष्णन का परिवार सालेम में ही रहता है. उनके पिता ने बीबीसी से कहा कि उनका बेटा खुदकुशी नहीं कर सकता. जेएनयू आने से पहले मुथुकृष्णन ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी. रोहित वेमुला भी यहीं के छात्र थे. वे अपने ज़िले से जेएनयू में एडमिशन पाने वाले अकेले छात्र थे.

मुथुकृष्णन, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में. (फोटोःफेसबुक)
मुथुकृष्णन, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में. (फोटोःफेसबुक)

मुथुकृष्णन फेसबुक पर ‘रजनी कृष’ नाम से थे. बीबीसी के मुताबिक ये नाम उनके दोस्तों ने उन्हें दिया था क्योंकि वे रजनीकांत की मिमिक्री करते थे. मुथुकृष्णन फेसबुक पर ‘माना सीरीज़’ के नाम से एक दलित लड़के के संघर्ष की कहानी लिख रहे थे. इसकी आखिरी किश्त माना सीरीज़- 5 के अंत में उन्होंने एमफिल में दाखिले में होने वाले भेदभाव के बारे में लिखा है. 10 मार्च को लिखी इस पोस्ट में उन्होंने लिखा,

 ‘एमफिल/पीएचडी के एडमिशन में ‘इक्वैलिटी’ (बराबरी) नहीं है. बराबरी को नकारा जाता है. वाइ-वा में भेदभाव है. एडमिन ब्लॉक में प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है, ये समाज के कमज़ोर तबके से आने वाले छात्रों को शिक्षा से महरूम करता है. बराबरी का न मिलना हमें हर चीज़ से दूर करता है.’

इस सीरीज़ के अलावा मुथुकृष्णन अपने फेसबुक पोस्ट्स में लगातार यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ लिख रहे थे. इनके तहत एमफिल में दाखिले में पूरा वेटेज अब वाइवा को दिया जाना है. एक गाइड के अंडर पीएचडी करने वालों की संख्या भी कम की गई है. मुथुकृष्णन को अपने दाखिले में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. पिछले साल जेएनयू में दाखिला मिलने के बाद मुथुकृष्णन ने 26 जुलाई 2016 को एक फेसबुक पोस्ट लिखी. इस पोस्ट में अपने संघर्ष के बारे में लिखा है. वो लिखते हैं,

‘जेएनयू में एडमिशने के लिए ये मेरी चौथी कोशिश है. दो बार एमए का एंट्रेंस लिखा और दो बार एमफिल पीएचडी एंट्रेंस. दो बार इंटरव्यू में अंग्रेज़ी न आने की वजह से बाहर हुआ. लेकिन मैं लगा रहा. पेपर देने दिल्ली आता था तो छोटे-मोटे काम करता था, कि कुछ पैसे बचा सकूं. तमिलनाडू से यहां तक आने में ट्रेन में कुछ नहीं खाता था. हर बार जवाहरलाल नेहरू की मूर्ति के नीचे बैठ कर नेहरू से सवाल करता था प्लीज नेहरू जी, हमारा पूरा परिवार कांग्रेस को ही वोट करता है. आप मुझे पढ़ाना क्यों नहीं चाहते.’

इस पूरे संघर्ष पर मुथुकृष्णन पर एक किताब लिखना चाहते थे, जिसका नाम उन्होंने ‘अ जंकेट टू जेएनयू’ रखने का सोचा था. यूजीसी के नए नियम मुथुकृष्णन जैसे अंग्रेज़ी में कमज़ोर छात्रों की राह मुश्किल कर देंगे.

फेसबुक के अलावा मुथुकृष्णन ‘DALITerature’ नाम से एक ब्लॉग भी चलाते थे. इसमें उन्होंने दलित मुद्दों पर लेख लिखे हैं. रोहित वेमुला की मां पर लिखा उनका लेख ‘अ यूनिवर्सल मदर विदाउट अ नेशन’ अब चर्चा में आ गया है. इसमें उन्होंने रोहित की मां से अपनी मुलाकात के बारे में लिखा है.

इन घटनाओं से मुथुकृष्णन के राजनीतिक रुझान का पता चलता है. ये पता चलता है कि वो किस तरह का समाज चाहते थे. देश-समाज के मुद्दों पर वो किस पाले में खड़े थे.

इससे ये पता नहीं लगता कि उन्होंने खुदकुशी क्यों की.


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