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क्या मेरे जैसे बूढ़ों को गोवा जाने का हक नहीं है?

दिल्ली सरकार ने एक बेहूदा फैसला लिया है. एक साल में 77,000 लोगों को मुफ्त में तीर्थयात्रा कराने का. अरविंद केजरीवाल पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन्होंने ये घटिया फैसला लिया हो. उनसे पहले ये कारनामा मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह कर चुके हैं. हज सब्सिडी को भी इसी में गिना जाएगा.

दिल्ली की योजना में 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों को ले जाया जाएगा. तीन दिन और दो रात की यात्रा होगी. फिलहाल पांच रूट तय किए गए हैं. मथुरा-वृंदावन, हरिद्वार-ऋषिकेश-नीलकंठ, पुष्कर-अजमेर, अमृतसर-बाघा-आनंदपुर साहिब, वैष्णो देवी-जम्मू शामिल हैं. इन सभी रूट पर एक-एक एसी बस चलेगी. यात्रियों के रहने का नाश्ते-खाने का खर्चा भी सरकार उठाएगी. हर यात्री का 2 लाख रुपए का बीमा भी होगा. हर विधानसभा सीट से हर साल 1100 लोगों को ले जाया जाएगा.

सबेरे-सबेरे इस जाड़े में ठंडे पानी से धोया जाए या गर्म पानी से, इन जैसे मुद्दों पर भी जनता की राय मांगने का दिखावा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने क्या अपने टैक्सपेयर्स से ये पूछने के बारे में सोचा कि उनके पैसे पर लोगों को फ्री में तीर्थयात्रा कराई जाए या नहीं.

पहली बात ये कि किसी भी सरकार को अपने नागरिकों के पैसे पर किसी को भी मुफ्त में किसी धार्मिक स्थल की यात्रा क्यों करानी चाहिए? क्या वो साफ हवा, साफ पानी, पोषक खाने, अच्छी पढ़ाई और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की तरह जीवन के लिए जरूरी है?

दूसरी बात ये कि अगर सरकार किसी नागरिक को मुफ्त में तीर्थस्थल की यात्रा कराना चाहती है, तो नास्तिकों ने कौन सा अपराध किया है? अगर किसी बूढ़े नास्तिक की श्रद्धा गोवा जाने में हो (जो कि शायद बहुत से बुजुर्गों की होती होगी और शायद मेरी भी हो) तो उन्हें मुफ्त में गोवा क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए?


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