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फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की नई फिल्म ‘खुदा हाफिज़’ सरप्राइज़िंग तरीके से खुद को लियाम नीशन की ‘टेकेन’ और टाइगर श्रॉफ की ‘बागी 3’ के बीच जो बड़ी सी खाई बचती है, उसमें फिट कर लेती है. क्योंकि इन तीनों फिल्मों का बेसिक प्लॉट कमोबेश एक सा ही है. नायक के परिवार का एक अहम सदस्य घर से दूर संदेहास्पद स्थिति में गायब हो जाता है. पूरी फिल्म उन्हें ढूंढने में निकलती है. ‘टेकेन’ जहां इमोशन और एक्शन दोनों का स्तर काफी ऊपर तक ले जाती है, वहीं ‘बागी 3’ महज़ एक्शन तक सिमट कर रह जाती है. इमोशन और एक्शन दोनों को बैलेंस करने का काम ‘खुदा हाफिज़’ करती है. हालांकि ये करके ये कोई महान फिल्म नहीं बन जाती. मगर ट्रेलर से जो वादा किया था, उसे पूरा करती है.

2007 में लखनऊ में समीर और नर्गिस की अरेंज़्ड इंटर-रिलीज़न शादी होती है. सबकुछ अच्छा चल रहा था कि 2008 की आर्थिक मंदी वाले दौर में दोनों की नौकरी चली जाती है. नौकरी की तलाश इन्हें नोमान नाम के एक फिक्शनल खाड़ी देश में लेकर जाती है. नर्गिस का विज़ा पहले अप्रूव हो जाता है इसलिए वो समीर से पहले नोमान चली जाती है. वहां पहुंचकर वो समीर को फोन कर बताती है कि ये वो नौकरी नहीं है, जिसके लिए वो यहां आई थी. इसके बाद समीर को अपनी पत्नी की कोई खोज-खबर नहीं मिलती. जिस एजेंट ने ये नौकरी दिलवाई थी, उसे डरा-धमकाकर समीर नर्गिस को ढूंढने नोमान चला जाता है. वो उसे ढूंढ पाता है कि नहीं यही इस फिल्म की कहानी है.

नोमान में नौकरी पाने की कवायद में लगे समीर और नर्गिस.
नोमान में नौकरी पाने की कवायद में लगे समीर और नर्गिस.

विद्युत जामवाल ने फिल्म में समीर का रोल किया है. शायद ये उनके करियर का सबसे इमोशनली चार्ज्ड कैरेक्टर था. लेकिन प्रेम और बिछड़न के ग़म के बीच भी उनके भीतर का एक्शन हीरो जाग जाता है. मगर इस बार आप सिर्फ उन्हें देखकर एंजॉय नहीं करते, उनकी वाली फीलिंग भी समझते और शेयर करते हैं. नर्गिस का किरदार निभाया है शिवालीका ओबेरॉय ने. वो कहने को तो फिल्म की लीडिंग लेडी हैं मगर शुरुआती 10-15 मिनट के बाद वो गायब हो जाती हैं. लेकिन जितनी देर भी दिखाई देती हैं आउट ऑफ प्लेस नहीं लगती. अन्नू कपूर ने नर्गिस को ढूंढने में समीर की मदद करने वाले टैक्सी ड्राइवर उस्मान का रोल किया है. शिव पंडित और आहाना कुमरा नोमान की इंटरनेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के दो सीनियर पुलिसवालों के रोल में हैं.

टैक्सीवाले उस्मान से अपनी पत्नी को ढूंढने में मदद करने की गुज़ारिश करता समीर.
टैक्सीवाले उस्मान से अपनी पत्नी को ढूंढने में मदद करने की गुज़ारिश करता समीर.

समीर और नर्गिस बड़े प्यारे परिवार से आते हैं. दो अलग मजहबों के होने के बावजूद समीर के माता-पिता ने लव मैरिज की थी. अब समीर की शादी वो अपने पसंद की लड़की से करवा रहे हैं, जिसका धर्म उनके लिए मायने नहीं रखता. बड़े शहरों में ये चीज़ आम बात हो सकती है लेकिन इस कहानी की पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश है. मगर इस चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की बजाय बड़े साधारण तरीके से कहानी में गूंथा गया है. किसी भी चीज़ को ओवर द टॉप न रखना भी इस फिल्म की एक खासियत है.

अपनी शादी के मौके पर नर्गिस, जिसका रोल शिवालीका ओबेरॉय ने किया है.
अपनी शादी के मौके पर नर्गिस, जिसका रोल शिवालीका ओबेरॉय ने किया है.

फिल्म के अपने मोमेंट्स हैं. लेकिन ये लव स्टोरी वाले हिस्से में नज़र नहीं आते. कुछ एक शानदार एक्शन सीक्वेंस हैं. जैसे वो हिस्सा, जब नोमान में समीर, नर्गिस से पहली बार मिलता है. खून-खराबे से भरपूर ये सीन देखने में नया लगता है. खून-खराबा नहीं. उस सीन की सेटिंग, जहां वो घट रहा है. एक संकरा सा गलियारा, जहां अपना हीरो चारों ओर से घिरा हुआ है. सबसे कमाल बात ये कि वो उन सबको मारकर हीरोइन के साथ भाग नहीं रहा. पिट रहा है. इसी मारकाट के बीच एक भावनात्कम क्षण भी आता है, जो फिल्म को इमोशनल डेप्थ देता है.

अपना एक्शन हीरो समीर यानी विद्युत जामवाल.
अपना एक्शन हीरो समीर यानी विद्युत जामवाल.

फिल्मकारों का सिनेमैटिक लिबर्टी लेना आम बात है. लेकिन उसकी मात्रा बहुत मायने रखती है. ‘खुदा हाफिज़’ के डायरेक्टर फारुख कबीर यहां थोड़े अंक बटोरते हैं. वो अपनी फिल्म को असलियत से दूर खिसकने नहीं देते. वो मौके बिलकुल हैं फिल्म हैं, जब आपको लगता कि यार ये तो कुछ भी हो रहा है. जैसे नोमान नाम के अरब देश में हर दूसरा शख्स हिंदी बोल रहा है. लेकिन वो हिंदी अरबी लहज़े में बोली जा रही है. भले वो सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा हो. एक और इंट्रेस्टिंग चीज़ है- फिल्म का बैकग्रांउड स्कोर. खासकर नोमान वाले हिस्सों में. वो आपको फील देता है कि आप एक ऐसी फिल्म देख रहे हैं, जो इंडिया में नहीं घट रही. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अमर मोहिले ने किया है.

नोमान की स्पेशल पुलिस टीम के सीनियर ऑफिसर अबू मलिक के रोल में शिव पंडित.
नोमान की स्पेशल पुलिस टीम के सीनियर ऑफिसर अबू मलिक के रोल में शिव पंडित.

‘खुदा हाफिज़’ कोई मस्ट वॉच पिक्चर नहीं है लेकिन वो कुछ ऐसा बताती-दिखाती नहीं है, जिससे आपका कोई नुकसान हो. फिल्म का क्लाइमैक्स भी आप हां-ना करते हुए प्रेडिक्ट कर ही लेते हैं. लेकिन इससे क्लाइमैक्स तक पहुंचने का मज़ा किरकिरा नहीं होता. विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म, जिसे आप बिना किसी प्रेशर देख सकते हैं.

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