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जिनका गाना गाकर रानू मंडल की तकदीर बदल गई, वो खुद किस बदहाली में हैं?

रानू मंडल एक महीने पहले तक रेलवे स्टेशन पर गाना गाती थीं. जो पैसे मिलते थे, उससे पेट पालती थीं. फिर किसी ने उनका गाना ‘एक प्यार का नगमा है…’ रिकॉर्ड करके फेसबुक पर अपलोड कर दिया. वीडियो वायरल हुआ, तो रानू मंडल फेमस हो गईं. अब वो फिल्मों के लिए गाना गा रही हैं.

इसी बीच ये खबर आई कि ‘एक प्यार का नगमा है…’ गाना जिसने लिखा, वो लेखक खुद गुमनामी की ज़िंदगी जी रहा है. लेखक का नाम है संतोष आनंद. उनका गाना गाकर रानू तो स्टार बन गईं, लेकिन संतोष कहां है ये कोई नहीं जानता था. गुमनामी वाली खबरें आईं, तो संतोष तक भी ये बात पहुंची. फिर वो खुद सामने आए और इन खबरों का खंडन किया.

संतोष ने फेसबुक पर एक वीडियो अपलोड किया. बताया कि वो एकदम ठीक हैं और अच्छी ज़िंदगी जी रहे हैं. उन्होंने कहा,

‘पूरे भारत को बहुत-बहुत प्रणाम. दो दिन से जो आप लोगों ने मेरे लिए चिंता जताई है, तो मुझे लगा कि मेरे लिए बहुत बड़ा प्यार है आपका. मैंने हमेशा प्यार ही किया है और प्यार ही दिया है. कोई बढ़ता है, तो मुझे बहुत खुशी होती है. इन दिनों जिस-जिस कार्यक्रम में मैं गया, मुझे दो घंटे से पहले उठने नहीं दिया गया. एक मेरा लिखा हुआ गीत है, ‘एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है. ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है.’ मैं पहला शब्द पढ़ता हूं, ‘एक प्यार का नगमा है’ और पूरी जनता खड़ी हो जाती है. मुझे पूरा गीत सुना देती है. मैं सुनने लगता हूं, जनता वक्त हो जाती है. गीतकार हो जाती है. मुझे इससे बड़ा और क्या सौभाग्य मिलेगा. मैं देख रहा हूं, आज इतना प्यार करते हैं, इतने गीत हैं दुनिया में, बढ़िया लिखे हुए. लेकिन इस गीत का ये है कि इसके शुरू से लेकर आखिर तक जितने अंतरे हैं, छंद है, सब याद है लोगों को. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक. आज छोटे-छोटे बच्चे भी इसे सुनाते हैं, मैं खुश होता हूं. मेरे लिए तो यही बहुत बड़ा पुरुस्कार है. कोई मेरा गीत, लिखे हुए गीत को, गाता है. ज़िंदगी में आगे बढ़ता है. मेरे लिए इससे बड़ा क्या पुरुस्कार होगा. क्या भारतरत्न. क्या पद्म भूषण. मेरे लिए तो सबसे बड़ी बात ये है कि मेरे गीत से लोगों को प्रेरणा मिल रही है. मैं आप लोगों का फिर से बहुत-बहुत-बहुत धन्यवाद कहता हूं.’

संतोष आनंद आखिर कहां और किस हाल में हैं?

साल 1970 से लेकर 1995 तक फिल्मों के लिए कई बेहतरीन गाने लिखने वाले संतोष इस वक्त दिल्ली में हैं. वो सुखदेव विहार कॉलोनी के डीडीए फ्लैट्स में रहते हैं. फिल्मी दुनिया से दूर हैं. किसी ज़माने में हरदम एक्टिव रहने वाले संतोष अब ठीक से चल भी नहीं पाते. वो बहुत कोशिश करने पर, वॉकर के सहारे कुछ कदम चल पाते हैं. व्यक्तिगत तौर पर भी बड़ा नुकसान झेल चुके हैं. साल 2014 में उनके बहू-बेटे ने कथित तौर पर सुसाइड कर लिया था. इस घटना के घाव आज भी संतोष के दिल में मौजूद हैं.

कवि सम्मेलन में हिस्सा लेते संतोष आनंद. फोटो- फेसबुक
कवि सम्मेलन में हिस्सा लेते संतोष आनंद. फोटो- फेसबुक

संतोष का जन्म उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद में हुआ था. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई की, फिर दिल्ली में लाइब्रेरियन के तौर पर काम शुरू कर दिया. दिल्ली में होने वाले कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेते थे. कविताएं लिखते थे. पहली बार फिल्म के लिए गाने लिखने का ऑफर मिला 1970 में. ‘पूरब और पश्चिम’ फिल्म के लिए ‘पुरवा सुहानी आई रे’ गाना लिखा. उसके बाद तो कई फिल्मों के ऑफर आने लगे. साल 1995 तक फिल्मी दुनिया में एक्टिव रहे. 1974 में ‘रोटी कपड़ा और मकान’ फिल्म के ‘मैं ना भूलूंगा…’ गाने और 1983 में ‘प्रेम रोग’ फिल्म के ‘मोहब्बत है क्या चीज़’ गाने के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला. 2016 में यश भारती अवॉर्ड भी मिला.

संतोष अब 79 साल के हो चुके हैं. लेकिन फिर भी कविताएं लिखते हैं. कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं. ठीक से चल नहीं सकते, लेकिन कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेने के लिए हिम्मत करके सफर करते हैं. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक संतोष कहते हैं,

‘बेटे की मौत के बाद सारे रंग चले गए. वैसे तो 1995 से ही फिल्मों से दूर हूं. लेकिन बेटे की मौत के बाद खुद को घर में कैद कर लिया. कुछ दोस्तों के कहने पर दोबारा कविताएं लिखना शुरू किया. लेकिन अब इनमें पहले जैसा रंग नहीं है. घर खर्च चलाने के लिए कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेता हूं.’

संतोष आनंद कहां हैं, किस हाल में हैं, ये कोई नहीं जानता था. लेकिन रानू मंडल के फेमस होने के बाद कम से कम लोगों ने उनकी सुध तो ली. किसी ज़माने में बेहतरीन गाने लिखने वाला ये लेखक आज कदम-कदम चलने के लिए दिक्कतें उठा रहा है.


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