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'तुम्हारी फुआ के चक्कर में पाकिस्तान छूट गया'

satya vyasसत्य व्यास लेखक हैं. बनारस और दिल्ली को जेबों में लिए फिरते हैं. कहते हैं बोकारो दिल में रहता है. अभी तक रह कलकत्ता में रहे थे. आदमी कम, नक्शा ज़्यादा है. इतना घूमे हैं कि नारद जी भी शरमा जायें. लिखते जबर हैं. फिल्मों और क्रिकेट का कीड़ा है. क्रिकेट हो या फ़िल्में, जो भी लिखते हैं उसे नॉस्टेल्जिया से छौंक के पेश करते हैं. आप लबराते फिरेंगे. फिलहाल चुनाव के माहौल में छात्र राजनीति और इशकबाजी के किस्से लिख रहे हैं. उन्हीं की बानगी दो किस्से आप भी पढ़िए.


#  कौन कमज़ात उन्हें नकाब से पहचानता है

मियां! ये जो पिछले दो हफ्ते से रोज ‘मदरसा ए रशिदिया मिस्बाहुल हक़’ के आगे खड़ा कर देते हो, इससे बेहतर जलालपुर मस्जिदिया के बाहर अगरबत्ती बेच लेते यार! संजय ने गीले रुमाल से मुंह बांधते हुए कहा,’मदरसा रशिदिया मिस्बाह उल उलूम’ काफ़िर. ‘मिस्बाह उल उलूम.’ और ये रुमाल मुंह से उतारो. बच्चा चोर लग रहे हो. रफ़ीक़ ने घड़ी देखते हुए कहा.

‘यहां मत खड़ा किया करो मियां. एक तो मदरसा ऊपर से लड़कियों का. मेरा वोट कट जायेगा बे!’ संजय ने बुझे मन से कहा. ‘हम दिलाएंगे तुमको वोट. चिंता न करो. पूरा बहेरी, जलालपुर, कासिम बाज़ार, दिमागी चट्टी, लोहा-पट्टी का वोट हमारे अंटी में है,’ रफ़ीक़ ने कहा.

‘तुम दिलाओगे वोट! साले, तुम लोग पढ़ते ही कितना हो! दसवीं में पच्चीस थे. बारहवीं आते-आते गौस मुहम्मद, गैरेज में लग गए और कौसर रज़ा कबाड़ में. अब बचे हो दो. तुम और हैदर अली का लौंडा. ऊ भी साला बाप के डरे कहीं और वोट डालेगा,’ संजय ने तर्जनी से पसीना पोंछा.

‘चुप करो चुप करो. आ गयी हमारी ‘अर्जुमंद आरा’. देखो हीत! चुप्पे चलना है पीछे-पीछे. चार कदम चल लेंगे तो दिन भर झेल लेंगे तुमको,’ रफ़ीक़ ने कुर्ते की कलफ़ ठीक करते हुए कहा.

‘इतने हजूम में पहचानते कैसे हो बे? नकाब के बाहर तो सब एक्के जैसी लगती हैं,’ संजय ने इधर-उधर देखते हुए पूछा.
‘कौन कमजात नक़ाब से पहचानता है. हम तो जूतियों पर नजर गड़ाते है! फिर कह रहे हैं एक दम्म चुप रहना. शक़ न होने पाये. न तो, ये बिसुनीपुर है. हम कट लेंगे, तुम कट जाओगे,’ रफ़ीक़ ने हिदायत दी.

रफ़ीक़ जब तक बातें पूरी करता, लड़कियों का एक जत्था हंसता खिलखिलाता दोनों के सामने से निकल गया. रफ़ीक और संजय एहतियातन पीछे पीछे हो लिए. एक गली के बाद जब लड़कियां कुछ कम हुईं तो संजय ने कहा-

‘मियां! तुम्हारा काम बना दें!’
‘तुम साले काम बढ़ा दोगे. कुछ न करना, वर्ना यहीं मुसलमानी कर देंगे,’ रफ़ीक़ ने दांत पीसते हुए धीरे से कहा. मगर तब तक पतंग कट चुकी थी. संजय आगे बढ़ गया था.

‘सुनिए!’ संजय ने आवाज दी.

दोनों लड़कियां रुक गयीं. संजय को समझ ही नहीं आया कि किससे मुख़ातिब हो. उसे तो जूतियों का भी पता नहीं था. फिर भी उसने बिना कुछ सोचे हुए कहा-

‘वो आपसे कुछ कहना चाहता है?’

‘और आप पगार पर रखे गए हैं, ऐसा लगता है,’ नक़ाब के पीछे से ही शोख़ आवाज आई. संजय कुछ समझ ही नहीं पाया.

‘उनसे कहिये यूं पीछा करना छोड़ें. सय्यदों की बदनामी होती है.’ नक़ाब के भीतर से यह आवाज रफ़ीक़ को सुनाकर ही आई और आवाज तेज क़दमों से आगे बढ़ गयी.

‘देखे मियां! 15 दिन से लगे थे. पंद्रह मिनट में मामला फिट कर दिए,’ संजय ने मौज ली.
‘तुम्हारे जैसे लोगों के लिए ही हमारे यहां कोड़ों की सजा रखी गयी होगी, हीत,’ रफ़ीक़ वहीं सिर पकड़ कर बैठ गया.

# तुम्हारी फुआ के चक्कर में पाकिस्तान छूट गया

‘जानते हो मियां! छात्र नेता के लिए सबसे मुश्किल काम क्या है?,’ संजय ने पान की पत्ती का कोना दांत से काटा.
‘आंख में विक्स लगा के भोट मांगना; जैसे लगे कि चचा मर गये हैं,’ रफ़ीक़ ने बेतकल्लुफ़ी से कहा.

‘नहीं मियां! सबसे मुश्किल काम है उसी के सामने हाथ जोड़ना जिससे साला हम दिल जोड़ना चाहते हैं,’ संजय ने बुरा सा मुंह बनाया. पान की कसैली शायद दांतों के बीच कहीं फंस गई थी.

‘पइसा जोड़ लो पहिले! पम्पलेट छपवाने का पैसा है नहीं. अध्यक्षी लड़ेंगे.’ रफ़ीक़ ने ताना दिया.

मनहूस आदमी. मनहूस बात. पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए थे मियां? संजय ने चुहल की.

अब्बू असबाब बांध ही रहे थे कि तेरी फुआ दिख गयी. कहे कf अब तो निकाह पढ़वा के ही जायेंगे. बस उसी चक्कर में पाकिस्तान छूट गया. रफ़ीक़ ने दहला मारा.

भक्क् साले! संजय को हंसी आ ही गयी. पान की पीक ने रफ़ीक़ के कुर्ते पर भित्ति-चित्र बना दिया.

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