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ओलंपिक मैच से पहले कोच के महिला खिलाड़ी को थप्पड़ मारने वाले वीडियो पर राय बनाने से पहले ये पढ़ लें

टोक्यो में ओलंपिक खेल चल रहे हैं. अलग-अलग देशों के खिलाड़ी अलग-अलग खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं. जी जान से जुटे हुए हैं. इस बीच टोक्यो ओलंपिक्स का एक वीडियो बड़ी तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है. यह वीडियो जर्मनी की महिला जूडो एथलीट मार्टेना त्रेजदोस और उनके कोच क्लॉडीयु पूसा का है. दरअसल, मैच से पहले पूसा, मार्टेना को पकड़ते हैं, उन्हें जोर से हिलाते हैं और उनकी पीठ थपथपाते हैं. इसके बाद वे मार्टेना के दाएं और बाएं गाल पर हल्के-हल्के चांटे मारते हैं.

इस पूरे घटनाक्रम के बाद मार्टेना मुकाबले में उतरती हैं. उनका मुकाबला हंगरी की खिलाड़ी से होता है. हालांकि, तमाम प्रयासों के बाद भी मार्टेना मुकाबला जीत नहीं पातीं. इस बीच उनका और उनके कोच का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है. लोग 32 साल की मार्टेना के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए थप्पड़ मारने के लिए उनके कोच की आलोचना करते हैं. लेकिन मार्टेना अपने कोच के बचाव में उतर आती हैं.

 

 

 

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मार्टेना इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट करती हैं. इसके कैप्शन में वो लिखती हैं,

“काश मैं अपनी जीत को लेकर सुर्खियां बना पाती. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर काफी फोकस डाला जा रहा है. जबकि सच यह है कि यह बस एक प्रक्रिया है. मैंने खुद ही मैच से पहले इस प्रक्रिया की वकालत की थी.”

उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक और स्टोरी पोस्ट की. इसमें उन्होंने लिखा,

“दोस्तों, यह बस एक प्रक्रिया है जो मैं हर मैच से पहले करती हूं. मेरे कोच वैसा ही कर रहे थे, जैसा मैं चाहती थी. ऐसा होने पर मैं काफी एक्टिव महसूस करती हूं. इससे मुझे गेम के लिए तैयार होने पर मानसिक तौर पर भी मदद मिलती है. प्लीज, आप सब मेरे कोच पर दोष डालना बंद कीजिए.”

बहुत सामान्य है इस तरह की प्रैक्टिस

जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा कि थप्पड़ मारने के लिए लोग मार्टेना के कोच की आलोचना कर रहे हैं. वहीं मार्टेना ने इस प्रक्रिया को ना केवल सामान्य, बल्कि अपने लिए जरूरी भी बताया. ऐसे में हमने जानने की कोशिश कि क्या सच में यह प्रक्रिया समान्य है? हमने बात की जूडो खिलाड़ी गरिमा चौधरी से. मेरठ में पैदा हुईं गरिमा चौधरी ने साल 2012 के लंदन ओलंपिक्स में हिस्सा में लिया था. उन्होंने 2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी चुनौती पेश की थी. गरिमा चौधरी ने हमें बताया कि इस तरह की प्रैक्टिस बहुत सामान्य है. वे कहती हैं,

“इतने बड़े लेवल पर खेलने के दौरान खिलाड़ी पर बहुत दबाव होता है. ऐसे में कोच और खिलाड़ी के बीच एक समझ होती है. कोच को पता होता है कि उनका खिलाड़ी किस तरह से रिएक्ट करेगा और किस तरह से परफॉर्म कर सकता है. यह जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. उसमें जो कोच ने किया है, वो काफी नॉर्मल है. कोच ने खिलाड़ी को जगाने की कोशिश की है.”

जूडो खिलाड़ी गरिमा चौधरी ने साल 2012 के लंदन ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. (फोटो: विशेष इंतजाम)
जूडो खिलाड़ी गरिमा चौधरी ने साल 2012 के लंदन ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. (फोटो: विशेष इंतजाम)

गरिमा ने आगे बताया कि इस तरह की प्रैक्टिस से खिलाड़ी को गेम पर फोकस करने में भी मदद मिलती है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की प्रैक्टिस पूरी तरह से कोच और खिलाड़ी के बीच की समझ पर निर्भर करती है.

कुछ ऐसी ही बात हमें जसलीन सैनी ने भी बताई. जसलीन सैनी बहुत सी अंतरराष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. इस बार बेहद कम अंको से टोक्यो ओलंपिक्स के लिए क्वालिफाई करने से चूक गए. उन्होंने हमें बताया,

“इस तरह की प्रैक्टिस बहुत ही सामान्य है. मैच से पहले कई बार एथलीट का शरीर सुस्त होता है. ऐसे में बॉडी को एक्टिव करने के लिए इस तरह की प्रैक्टिस होती है. मैं खुद इस तरह की प्रैक्टिस में हिस्सा लेता हूं. ज्यादातर कोच करते हैं. लेकिन अगर कोच नहीं मौजूद है तो साथी खिलाड़ी से मदद लेता हूं. और यह प्रैक्टिस सिर्फ जूडो तक सीमित नहीं है. दूसरे खेलों में भी इस तरह की प्रैक्टिस बड़ी सामान्य है.”

भारत के जूडो खिलाड़ी जसलीन सैनी कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. (फोटो: विशेष इंतजाम )
भारत के जूडो खिलाड़ी जसलीन सैनी कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. (फोटो: विशेष इंतजाम )

साल 2008 के बीजिंग ओलंपिक में जूडो में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं और अब कोच के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहीं दिविया तिवारी ने मार्टेना त्रेजदोस और क्लॉडीयु पूसा का वायरल वीडियो देखा नहीं था. हालांकि, जब हमने उन्हें वीडियो भेजा, तो उन्होंने भी इस तरह की प्रैक्टिस को बहुत ही सामान्य बताया. पटियाला में खिलाड़ियों को जूडो सिखा रहीं दिविया ने बताया,

“होता यह है कि मैच से पहले खिलाड़ी के ऊपर एक तरह का दवाब होता है. ऐसे में इस तरह की प्रैक्टिस बॉडी को अलर्ट करने के लिए की जाती है. कई बार खिलाड़ी खुद भी करते हैं. अपने चेहरे और पैरों को थपथपा लिया. कई बार कोच खिलाड़ी की पीठ थपथपा देते हैं. मैं जब खिलाड़ी थी, तो खुद इस तरह की प्रैक्टिस में हिस्सा में लेती थी. हालांकि, एक कोच के तौर पर मैं अब ऐसा नहीं करती. मैं अलग तरीके से खिलाड़ियों को तैयार करती हूं. लेकिन खिलाड़ी इस तरह की प्रैक्टिस करते रहते हैं और यह बिल्कुल सामान्य है.”

दिव्या तिवारी साल 2008 की बीजिंग ओलंपियन है. अब पटियाला में खिलाड़ियों को जूडो की ट्रेनिंग देती हैं. (फोटो: विशेष इंतजाम)
दिविया तिवारी साल 2008 की बीजिंग ओलंपियन है. अब पटियाला में खिलाड़ियों को जूडो की ट्रेनिंग देती हैं. (फोटो: विशेष इंतजाम)

दूसरी तरफ टोक्यो ओलंपिक्स में वेट लिफ्टिंग में भारत को सिल्वर मेडल दिलाने वालीं मीरा बाई चानू के कोच विजय कहते हैं कि उन्हें इस तरह की प्रैक्टिस की जरूरत महसूस नहीं होती. उन्होंने बताया कि उन्होंने इस तरह से कभी भी अपने खिलाड़ियों को मैच के लिए तैयार नहीं किया. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि हो सकता है कि जूडो जैसे दूसरे खेलों में इस तरह की प्रैक्टिस की जरूरत पड़ती हो.


वीडियो- टोक्यो ओलंपिक से बाहर होने के पहले सात्विक और चिराग की जोड़ी ने गर्दा उड़ा दिया

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