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जब वह अपनी नाच मंडली लेकर असम गए तो वहां के सिनेमाघरों में ताला लटकने की नौबत आ गई थी

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यह लेख दी लल्लनटॉप के लिए मुन्ना के. पाण्डेय ने लिखा है. 1 मार्च 1982 को बिहार के सिवान में जन्मे डॉ. पाण्डेय के नाटक, रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य भी हैं. उनकी हिंदी प्रदेशों के लोकनाट्य रूपों और भोजपुरी साहित्य-संस्कृति में विशेष दिलचस्पी. वे वर्तमान में सत्यवती कॉलेज(दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिंदी-विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.


किसी ने उसे ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ तो किसी ने ‘तुलसीदास’ तो किसी ने ‘भोजपुरी का भारतेंदु’, ‘अकिंचन की खिचड़ी’ कहा तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी का ‘अनगढ़ हीरा’, ‘भरतमुनि की परंपरा का कलाकार’ कहकर जिसके सम्मान में शीश नवाया और बिहार के राज्यपाल श्री अनंतशयनम अयंगर ने उन्हें 1954 में ‘बिहार रत्न’ की उपाधि और ताम्र-पत्र से सम्मानित किए.

आज के कथाकार संजीव ने जिसकी जीवनी ‘सूत्रधार’ नाम से लिखी. आज उसी लोक के धाकड़ रंगकर्मी ‘भिखारी ठाकुर’ की बरसी है और उनके नाच का सौवां साल.

भिखारी ठाकुर न होते तो भोजपुरी का सांस्कृतिक दूत ढूंढना पड़ता. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह उनकी कविताई और जन सरोकारी रंगकर्म के लिए कहने को मजबूर हुए,‘ठनकता था गेंहुअन, तो नाच के किसी अंधेरे कोने से, धीरे धीरे उठती थी, एक लंबी और अकेली भिखारी ठाकुर की आवाज.’

इन पक्तियों के साथ रंग-समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने उन्हें ‘अधरतिया की आवाज़’ कहा.

वह जब पैदा हुआ तो किसी ने सोहर गाया होगा इसमें शक है. वह पैदा होते ही एक खास वर्ग की श्रेणी में आया था. उसकी श्रेणी भोजपुर अंचल की बड़ी कही जाने वाली जातियों की ‘टहलुअइ'(सेवा खातिर) का भाग्य लेकर और हाथों में उस्तरा-कैंची थामने के सिवा कुछ सोच भी नहीं सकती थी. इसलिए जब उसने ‘नाई बहार’ लिखा तो इस दर्द को कहा:

नाई के माई गिरावे लोर, बबुआ जइहन देश का ओर
जुरत नइखे छाता-जूता, कइसे चिठी नेवतिहन पूता
कच्चा सेर भर सतुआ नून, बेसी ना पइबs एको बून
एतने पइबs जइबs जरुर, ना त करब मारके चूर.
(नाई की अम्मा आंसूं गिरा रही है/ बबुआ अलग-अलग सुदूर इलाकों की ओर कमाने जाएगा/ उसे छाता और जूता तक नसीब नहीं/ कैसे मेरा बेटा चिट्ठी-पत्री न्योते पहुंचाएगा/ सेर भर कच्चा सत्तू-नमक के से अधिक बदले में कुछ पायेगा नहीं).

इन स्थितियों में जीते भिखारी ठाकुर को अपने समय की परिस्थितियों ने भी पलायन को मजबूर किया और उस समय के भोजपुरियों के लिए उम्मीदों के सबसे बड़े शहर कलकत्ता की ओर वह भी गया. लेकिन पूरब की ओर जाके उसने मेदिनीपुर का रामलीला, जात्रा, बाउल जैसे कलारूप देखें और तब उसे अपनी जमीन की सांस्कृतिक शून्यता का अहसास हुआ कि उसके यहां के लोक-कला रूपों को कोई नहीं जानता. वह लौटा आंखों में सपना लिए और इस माटी में प्रचलित लौंडा नाच को एक अर्थ दे दिया. फिर तो जो निकला वह पलायन की पीड़ा का ‘बिदेसिया’, स्त्री के कोख पर अधिकार का सवाल ‘गबरघिचोर’, बेमेल विवाह और सामंतशाही को उघाड़ता ‘बेटी बेचवा’ और वृद्धाश्रम के कांसेप्ट का ‘बूढशाला के बयान’ हो गया. राम के गीत भी उसने खूब गाये. अपने प्रदर्शनों के लिए उसने कहा ‘लेक्चर दिहि जय कहके रघुनाथा’ और उसकी लोकप्रियता का आलम यह कि जनता ने ‘रायबहादुर’ की उपाधि दे दी. मलिक जी के नाम से पहले ही मशहूर थे. उनकी दो कविताओं पर नजर डालते हैं:

(1) घर में रहे दूध पांच सेर, केहू जोरन दिहल एक धार.
का पंचाईत होखत बा, घीव साफे भईल हमार. (गबरघिचोर)

यह कविता स्त्री कोख पर स्त्री के अधिकार की बात एक स्त्री ही भरे पंचायत में करती है. इसका मजमून यूं है कि मेरे घर में पांच सेर दूध था, उसमें किसी ने आकर थोड़ा-सा जामन दाल दिया, इसमें पंचायत करने की क्या जरूरत है, इससे निकलने वाला घी सीधे सीधे मेरा हुआ. गबरघिचोर नामक उनका यह नाटक महज पति के न रहने या पलायन कर जाने की स्थिति में किसी और से बन गए संबंध की कथा नहीं है, बल्कि गर्भ/कोख पर स्त्री के बुनियादी अधिकार और सामाजिक जीवन में यौन-संबंधों की भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास भी है. ध्यान रहे ऐसा सवाल भिखारी ठाकुर ने तब उठाया जब ‘द सेकंड सेक्स’ छपा भी नहीं था.

(2) अब देखल जाय कि गाय वास्ते गौशाला खुल गइल
गरीब वास्ते धर्मशाला खुल गइल, गंवार वास्ते पाठशाला खुल गइल.
बड़ा अच्छा भइल. अब बूढ़ खातिर बूढ़शाला खुल जाइत, बहुत अच्छा रहल ह;
काहे कि बूढ़ के बड़ा तकलीफ बीतत बा.. बूढ़ के खइला के फिकिर ना रहे. (बूढ़शाला के बेयान)

यानी अब ध्यान दिया जाए कि गायों के लिए गौशालाएं खुल गई हैं, गरीबों के लिए धर्मशालाएं खुल गई हैं, गंवारों के लिए पाठशालाएं खुल गई हैं, बहुत अच्छा हुआ. अब बूढों के लिए वृद्धशालाएं खुल जातीं तो अच्छा रहता, क्योंकि बूढों को बहुत तकलीफ हो रही है…उन्हें खाने-पीने-जीने की चिंता न होती. भोजपुर अंचल की एक बड़ी आबादी जीवन की बेहतरी के लिए पलायन करती रही है लेकिन पीछे गांव के गांव युवाओं से खाली हो गए और पीछे उनके बूढ़े मां-बाप रह जाते थे जिनके लिए एकाकीपन वाला बुढ़ापा असह्य हो जाता था. स्थितियां अभी भी कोई ख़ास बदली कहां हैं.

यह पढ़ते हरगिज ना भूलिए कि उसने ना तो रंगकर्म की दीक्षा ली थी ना उसको स्कूली ज्ञान मिला था. पास ही के तबके अलग-अलग कारणों से मशहूर कवि, गायक और पूरबी के जनक ‘महेंद्र मिश्र’ का साथ मिल गया था. यह आदमी इतना अनूठा था कि उसके ऊपर तबके उर्वर भोजपुरी सिनेमा की कैसे न नजर पड़ती. उन्होंने बाकायदा ‘बिदेसिया’ नाम से एक फिल्म बनाई और भिखारी ठाकुर का एक दृश्य (अतिथि भूमिका) फिल्म में रखा भी लेकिन यह उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं था. पर बाद में इनके एक गाने ‘पिया गईले कलकतवा हे सजनी'(पिया गए कलकता हे सजनी) को प्रयोगधर्मी फिल्मकार सुधीर मिश्रा ने अपनी फिल्म ‘हजार ख्वाहिशें ऐसी’ में स्वानंद किरकिरे से गवाया मजाल जो गीत का टेस्ट और तेवर कम हो जाए.

आज दुनिया पद्मावती के लिए लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठी है लेकिन इस आदमी ने प्यारी सुन्दरी का जो विरह लिखा वह नागमती के वियोग के सामने जाकर हो गया. ऐसा है उसके बारहमासा का जादू. लेकिन उसके लोकप्रियता के बारे में पूछो तो हंसते हुए सहजता से कह गया –

‘झूठहूं राम नाम कहला से, भोजपुरी भाषा गहला से. असहीं नाम फैलते जाता, रेडियो से काशी-कलकत्ता.’(झूठ ही राम नाम कहने भर से/भोजपुरी भाषा बेहतर तरीके से अपनाने से/ऐसे ही प्रसिद्धि मिलती जा रही/ रेडियो से काशी से कलकत्ता तक)

और,

‘तनिको न आवे गावे बजावे, काहे दो लागल लोग के भावे, राम शब्द जय कहि के, सभा खुस करीं नाच में रहिके.’(मुझे ज़रा सा भी गाने-बजाने नहीं आता/पता नहीं लोगों को क्यों भाने लगा है/राम शब्द कि जय कहके/ सभा को खुश करता हूं, नाच में रहके)

हालांकि उसका रंगकर्म महज जनता को खुश करने के लिए नहीं था तभी तो उसने यह भी कहा:

‘नाच मंडली के धरि साथा, लेक्चर दिहीं जय कहिं रघुनाथा’(नाच मंडली का साथ लेके, मैं लोगों को, समाज को लेक्चर दे रहा हों जय रघुनाथ कहके).

वह लेक्चर दे रहा था कुरीतियों के खिलाफ खड़ा होने के लिए, औरतों की बेहतर स्थिति के लिए. उसकी परिस्थितियां ऐसी नहीं थी कि उसको अपने मनमर्जी का आसमान यह समाज यूं ही दे देता, जाति भी ‘नाई’ की, काम बाबुओं की टहलुअइ(सेवा/दाढ़ी, बाल बनाना, मालिश आदि करना, शादी-ब्याह. मौत के न्योते/खबर दूसरे तक पहुंचाना) और जो मिल जाए उसी में जीना-खाना. वह कलकत्ता तो इसलिए गया था कि उसके समय की यह मजबूरी थी कि पूरब जाके जूट मीलों में काम करके नगद पैसे कमाए.

इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती ने खूब लिखा है, इन जूट मीलों की दुनिया पर. तो भईया बड़जतियों की टहलुअइ उसे पैसे और सम्मान कहां दे सकती थी. उसकी तो ‘लालसा रहे जे बहरा जइती, छूरा चलाके दाम कमइती’ [लालसा थी कि बाहर (पूरब की ओर) जाता और उस्तरा (दाढ़ी-बाल-मूंछ बनाकर) पैसे कमाता] भावना यह थी.

भिखारी ठाकुर के 6 सुपरहिट गीत:

न वह कलकत्ता और पुरी की ओर जाता ना भिखारी ठाकुर राम कथा की श्रद्धा लेकर अपने समाज के लिए एक एक पीड़ा का बयान लेकर नाच के मंच पर उतरा और गले से वह पीड़ा ऐतिहासिक आवाज बनकर निकली. पर मां-बाप तो बेचारे उसी समाज के भीतर थे उनकी एक न चली ‘बरजत रहलन बाप मतारी. नाच में तू मत रहs भिखारी, चुपे भाग कर नाच में जाईं, बात बनाकर दाम कमाई’ [मां-बाप गुस्सा हो रहे थे कि नाच में तुम मत रहो भिखारी, लेकिन चुपचाप भागकर नाच(लौंडा नाच) में जाता और बात बनाके पैसे कमाता.]

वह अब उनका बेटा भर नहीं था, वह अब समाज का हो गया था, उन औरतों की आवाज़ था, जिनके पति परिवार के लिए सुदूर चले गए थे और पीछे उन औरतों की पीड़ा और आंखों का आंसूं पोंछता उनका ‘पिया गईले कलकतवा हे सजनी’ का स्वर. एक और बात, जब वह अपनी नाच मंडली लेकर असम गये तो वहां के सिनेमाघरों में ताला लटकने की नौबत आ गई थी. आज भोजपुरी के तमाम गायक भिखारी ठाकुर को गाकर अपने बेहतर होने का प्रमाण-पत्र मांगते हैं और बिहार और पूर्वांचल का ऐसा कोई रंगकर्मी नहीं जिसने भिखारी ठाकुर को न खेला हो न उनकी शैली ली हो. आखिर उनके लिए ‘नाच कांच हs, बात सांच हs'(नाच कच्चा है, बात सच्ची है) अधिक महत्त्व का है. जिसके नाम भर से भोजपुरी की तमाम अश्लीलता को ग्रहण लग जाता है और इस अंचल की बिवाइयों को मरहम. जाते जाते उसने घोषणा की थी:

अबहीं नाम भईल बा थोरा
जब यह छूट जाई तन मोरा
तेकरा बाद पचास बरिसा
तेकरा बाद बीस दस तीसा
तेकरा बाद नाम हो जईहन
पंडित कवि सज्जन जस गईहन’
(अभी तो थोड़ा नाम हुआ है/जब मेरा यह तन छूट जाएगा/ उसके पचास बरस बाद/उसके बीस और दस तीस बरस के बाद/उसके बाद नाम हो जाएगा/पंडित कवि और सज्जन मेरा यश गाएंगे.

रुकिए! वह जब इस दुनिया से गया वह दिन शनिवार का था और मरने से पहले इस रंगधुनी ने कह दिया था – ‘कहत भिखारी सनीचर के दिन, होई संउसे गांव के बटोर'(भिखारी कह रहे हैं कि शनिवार का दिन होगा, जब समूचा गांव जमा होगा एक जगह). आज भिखारी ठाकुर का हैप्पी वाला बड्डे है. इनके बिना भोजपुरी के जातीय संस्कृति का इतिहास अधूरा है.


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