भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC को देश के सबसे भरोसेमंद संस्थानों में से एक माना जाता है. जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी लोग एलआईसी को याद रखते हैं. लेकिन मुंबई की रहने वाली जयश्री गंभीर का अनुभव एलआईसी के साथ अच्छा नहीं रहा. पहले दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनके बेटे नितिन की मौत हो गई. बाद में एलआईसी ने उनका 60 लाख रुपये का क्लेम रिजेक्ट कर दिया. जयश्री को Maharashtra State Consumer Disputes Redressal Commission का दरवाजा (lic rejects life insurance claims) खटखटाना पड़ा. लेकिन राहत National Consumer Disputes Redressal Commission से मिली.
LIC ने रिजेक्ट किया 60 लाख का क्लेम, एक वजह से कोर्ट ने ब्याज सहित पैसा दिलाया
राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम ने 13 साल चले केस के बाद एलआईसी को 60 लाख रुपये का क्लेम का भुगतान करने का आदेश (lic rejects life insurance claims) दिया है. मानसिक परेशानी के लिए एक लाख रुपये का हर्जाना और मुकदमे के खर्च के लिए 50 हजार रुपये देने होंगे. एलआईसी को क्लेम की रकम पर 12 साल की अवधि के लिए 9 फीसदी का ब्याज भरना होगा. जानिये पूरा मामला.


राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम ने 13 साल चले केस के बाद एलआईसी को 60 लाख रुपये का क्लेम का भुगतान करने का आदेश दिया है. मानसिक परेशानी के लिए एक लाख रुपये का हर्जाना और मुकदमे के खर्च के लिए 50 हजार रुपये देने होंगे. एलआईसी को क्लेम की रकम पर 12 साल की अवधि के लिए 9 फीसदी का ब्याज भरना होगा.
रिस्क कवरेज की तारीख की उलझनमुंबई निवासी नितिन सुरेश गंभीर ने जून 2010 में एलआईसी के पास जीवन बीमा की 5 पॉलिसियों के लिए प्रोपोजल जमा किया. एलआईसी ने अपने पैनल के डॉक्टर से उनकी मेडिकल जांच करवाकर पांचो पॉलिसी जारी कर दीं. इनमें से 10, 15 और 15 लाख रुपये के बीमा की तीन पॉलिसियां 26 अगस्त 2010 को जारी की गईं. बची 10-10 लाख की दो पॉलिसियों के लिए उनके परिवार ने 7 सितंबर 2010 को पहला प्रीमियम भरा. हालांकि एलआईसी का कहना है कि उन्हें पहला प्रीमियम 13 सितंबर को मिला इसलिए उसी दिन से रिस्क कवरेज की शुरुआत हुई.
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एलआईसी ने क्लेम रिजेक्ट कर दियाइसी बीच नितिन को 11 सितंबर 2010 को पी डी हिंदुजा नेशनल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. वहां पता चला कि उन्हें दो महीने से डायबिटीज है, इसलिए पैर का घाव ठीक नहीं हो रहा है. उनका इलाज हो गया और अस्पताल से 13 सितंबर 2010 को छुट्टी मिल गई. अस्पताल से छुट्टी मिलने के करीब तीन साल बाद, 11 जून 2013 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से नितिन की मौत हो गई. इसके बाद नितिन की मां जयश्री गंभीर ने पांचो पॉलिसियों का क्लेम किया गया. LIC ने सभी क्लेम को रिजेक्ट कर दिया. कंपनी का कहना था कि उसने प्रोपोजल फॉर्म में इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि उसे बीमा करवाने के पहले से डायबिटीज थी.
राज्य उपभोक्ता फोरम का फैसलाक्लेम रिजेक्ट होने के बाद नितिन की मां जयश्री सुरेश गंभीर ने Maharashtra State Consumer Disputes Redressal Commission का दरवाजा खटखटाया. वहां कोर्ट ने कहा कि एलआईसी को तीन पॉलिसियों के लिए पहला प्रीमियम 26 अगस्त 2010 को ही मिल गया था और उसी दिन से रिस्क कवरेज शुरू हो गया. जबकि नितिन अस्पताल में भर्ती 13 सितंबर को हुए थे. इसलिए शुरुआती तीन पॉलिसी का क्लेम यानी 40 लाख रुपये दिए जाएं. राज्य कोर्ट ने बाद के दो क्लेम को रिजेक्ट कर दिया.
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राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम का फैसलाराज्य उपभोक्ता फोरम के फैसले से एलआईसी और जयश्री सुरेश गंभीर खुश नहीं थे, लिहाजा उन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम जाने का फैसला किया. पीठासीन सदस्य डॉ. इंद्रजीत सिंह और सदस्य शशि नंदकोयलकर की पीठ ने मामले की जांच की. कोर्ट का कहना था कि एलआईसी कोई ऐसा कागज पेश नहीं कर पाई जिससे पता चले कि नितिन को प्रोपोजल फॉर्म भरने से पहले डायबिटीज थी. साथ ही पैर के घाव का दिल के दौरे से कोई संबंध नहीं है.
फोरम ने कहा कि बाद की दो पॉलिसियों में फर्स्ट प्रीमियम रिसिप्ट भले ही 13 सितंबर 2010 लिखा हो, लेकिन उसमें यह साफ तौर पर नहीं लिखा गया है कि उसी दिन उसे प्रीमियम राशि मिली है. कोर्ट ने एलआईसी को आदेश दिया कि वह पांचों पॉलिसियों के क्लेम की रकम मतलब 60 लाख रुपये का भुगतान करे.
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