Apple के बाद अब सैमसंग ने जोर का झटका जोर से ही दिया है. ऐप्पल ने कुछ दिनों पहले आईफोन 17 का दाम 82 हजार से सीधे एक लाख कर दिया था. अब बारी उसके 'मित्र' सैमसंग की है. साउथ कोरियन कंपनी ने अपनी फ्लैगशिप गैलक्सी S26 सीरीज के दाम 25 हजार तक बढ़ा दिए हैं. नई कीमत के बाद गैलक्सी S26 ultra का 12/256GB मॉडल 1,39,999 की जगह 1,54,999 रुपये में मिलेगा. S26+ का बेस मॉडल भी अब 1,19,999 की जगह 1,34,999 का हो गया है. S26 के 12/256GB वाले बेस मॉडल के लिए अब 1,02,999 रुपये खर्च करने होंगे.
Apple के बाद Samsung ने भी बढ़ाए फोन के दाम, गैलक्सी S26 ultra और महंगा हुआ
सैमसंग ने जैसे ही अपनी फ्लैगशिप सीरीज के डिवाइस की कीमतों को बढ़ाया तो Galaxy S26 अब आईफोन 17 से महंगा हो गया है. कीमत बढ़ने से पहले Galaxy S26 का दाम 87,999 रुपये था जो अब 1,02,999 रुपये हो गया है.

सैमसंग ने जैसे ही अपनी फ्लैगशिप सीरीज के डिवाइस की कीमतों को बढ़ाया तो Galaxy S26 अब आईफोन 17 से महंगा हो गया है. कीमत बढ़ने से पहले Galaxy S26 का दाम 87,999 रुपये था जो अब 1,02,999 रुपये हो गया है. कीमत बढ़ने के बाद आईफोन 17 का 256 वाला मॉडल 99900 रुपये का है. माने अब चाहे आप एंड्रॉयड का फ्लैगशिप फोन खरीदो या ऐप्पल का, कम से कम 1 लाख रुपये तो खर्च होंगे ही.

हालांकि स्मार्टफोन के दाम बढ़ना अब कोई नई बात नहीं है. पिछले आठ महीनों में तकरीबन हर कंपनी ने अपने डिवाइस के दाम 20 फीसदी तक बढ़ाए हैं. इस चक्कर में कुछ दिन पहले ऐसा भी हुआ जब एंड्रॉयड के हर फ्लैगशिप के मुकाबले आईफोन 17 सस्ता था. लेकिन लगता ऐप्पल ने हमारी स्टोरी पढ़ ली और फिर सीधे 18 हजार कीमत बढ़ा दी. वैसे अगर S26 अल्ट्रा की बात करें तो 25 हजार बढ़ने के बाद भी वो आईफोन 18 प्रो के बेस मॉडल से 10 हजार सस्ता है. आईफोन 18 प्रो का 256GB मॉडल भारत में 164900 रुपये का है. आईफोन 18 प्रो मैक्स का दाम तो भारत में 179900 रुपये से स्टार्ट हो रहा है.
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दाम बढ़ने का कारण क्या हैवैसे तो हम ये पिछले एक साल से बता रहे लेकिन शॉर्ट में फिर बता देते हैं. दरअसल AI ने स्मार्टफोन का बंटाढार कर दिया है. मार्केट में RAM इन्फ्लेशन आई हुई है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 512GB मेमोरी के दाम में पिछले कुछ महीनों में 65 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. अकेले सैमसंग ने मेमोरी चिप का दाम 60 फीसदी तक बढ़ा दिया है. जो आपको लगे कि प्रोडक्शन कम हुआ है तो ऐसा नहीं है. बल्कि खपत बढ़ गई है. रैम को सुरसा की तरह निगलने वाले का नाम है AI. रैम की डिमांड पिछले 18 महीनों में तीन गुना हो गई है.
दरअसल AI का पूरा गेम ही रैम बोले तो मेमोरी पर टिका हुआ है. रैम AI की असली ताकत है. हर AI मॉडल को सीखने और सिखाने के लिए मेमोरी की जरूरत होती है. फिर भले वो GPT हो या LLM (large language model). AI का एक-एक मॉडल करोड़ों में नहीं बल्कि अरबों में जानकारी सेव करके चलता है. जैसे कि टेक्स्ट और तस्वीरें. यही सब जानकारी रैम में सेव होती है ताकि जरूरत पड़ने पर CPU और GPU इसका इस्तेमाल कर सकें. जाहिर सी बात है डेटा कंपनियों को रैम की जरूरत पड़ रही है. 2030 तक इससे राहत भी नहीं मिलने वाली.
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