कानपुर के वैभव पांडेय पिछले 4-5 साल से नोएडा की एक निजी कंपनी में नौकरी करते हैं. फिलहाल वह किराये के फ्लैट में रहते हैं. हाल ही उन्होंने सोचा कि जब हर महीने घर के किराये में बड़ी रकम जा रही है, तो क्यों न इस पैसे से होम लोन की EMI भरी जाए. कुछ साल बाद कम से कम अपना घर तो हो जाएगा.
'50 लाख वाला फ्लैट कहां गया?' जानिए मेट्रो सिटी से गायब कैसे हो गए बजट वाले घर
मेट्रो सिटी ही नहीं अब छोटे शहरों में भी मिडिल क्लास के लिए कम बजट में घर खरीदना काफी मुश्किल होता जा रहा है. क्या घर और जमीन वाकई महंगे होते जा रहे हैं या फिर बिल्डर्स लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं? जानें वजह.

इसी सोच के साथ वैभव ने नोएडा में 50-60 लाख रुपये के बजट में दो बेडरूम वाले घर की तलाश शुरू की. लेकिन इस बजट में उन्हें टू बीएचके फ्लैट नहीं मिला. जो विकल्प मिले, उनकी कीमत करीब 80-90 लाख रुपये से शुरू हो रही थी. लेकिन, यह सिर्फ वैभव का दर्द नहीं है. रियल एस्टेट बाजार में 50-70 लाख रुपये के बजट में नए घरों के विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं. डेवलपर्स का रुझान प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में मिडिल क्लास खरीदारों के लिए अपनी पसंद और बजट के मुताबिक घर तलाशना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.
शहरों में अफॉर्डेबल घरों की भारी कमीरियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक के मुताबिक शहरी इलाकों में करीब 1 करोड़ अफॉर्डेबल घरों (किफायती घरों) की कमी है. सरकार के नियमों के हिसाब से 45 लाख रुपये तक कीमत वाला घर किफायती घरों की कैटेगरी में शामिल होता है. इसके तहत महानगरों में 60 वर्ग मीटर और गैर-महानगरों में 90 वर्ग मीटर तक वाले घरों को शामिल किया जाता है. हालांकि, ऐसे घरों की संख्या लगातार घढ़ती जा रही है.
इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों में लोगों को अफॉर्डेबल घर मुहैया कराने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (पीएमएवाई-यू) भी बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर पा रहा है. वर्ल्ड बैंक के अनुमानों के मुताबिक, भारत की शहरी आबादी साल 2014 से साल 2024 के बीच करीब 23% बढ़ी, जबकि वैश्विक औसत 8.4% रहा. आज 37% भारतीय शहरी क्षेत्रों में रहते हैं. शहरों के विस्तार के कारण साल 2030 तक यह शहरी आबादी का ये आंकड़ा बढ़कर 40% होने का अनुमान है. इसके वावजूद लोअर , मिडिल इनकम क्लास और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए अपने घर का सपना इस रफ्तार से पूरा नहीं हो रहा.
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क्यों 'गायब' हो रहे किफायती घर?रियल एस्टेट क्षेत्र सालाना 10% की दर से बढ़ रहा है. वहीं, किफायती घर डेवलपर्स की प्राथमिकता सूची से लगभग गायब हो चुके हैं. जानकार इसकी कई वजह गिनाते हैं. रियल एस्टेट डेवलपर बूट्स रियलटी के मैनेजिंग डायरेक्टर दीपक राय लल्लनटॉप से बताते हैं कि जमीन की बढ़ती लागत किफायती घरों को बनाने में सबसे बड़ा फैक्टर है. डेवलपर को जमीन बाजार भाव पर खरीदनी पड़ती है. जमीन की कीमतें जितनी बढ़नी चाहिए थीं, उससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं. यह एक बड़ी चुनौती है.
दूसरा बड़ा फैक्टर है कंस्ट्रक्शन की बढ़ती लागत. कोरोना महामारी के बाद रूस-यूक्रेन की लड़ाई शुरू हो गई और अब ईरान युद्ध के के चलते घरों की निर्माण लागत में 25-30% का इजाफा हुआ है. सीमेंट, स्टील और श्रम की लागत में वृद्धि हुई है. इसने डेवलपर्स के मुनाफे को कम कर दिया है. दीपक राय का कहना है कि डेवलपर्स को महंगी दरों पर कर्ज लेना पड़ता है और टैक्स भी बहुत ज्यादा हैं.
हीरानंदानी ग्रुप के चेयरमैन निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, “ पीएम आवास योजना मध्यम वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. किफायती आवास की कमी को प्राइवेट सेक्टर की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी से काफी हद तक पूरा किया जा सकता था. लेकिन शहरों में जमीन लगातार महंगे हो रहे हैं और जमीन कम होते जा रहे हैं. निर्माण लागत में भारी वृद्धि, कम मुनाफा और रेगुलेटरी बाधाओं के कारण प्राइवेट सेक्टर क्षेत्र की किफायती घरों को लेकर रुचि धीरे-धीरे कम हो गई है."
इन वजहों से भी बढ़ती है डेवलपर्स की लागतबूट्स रियलिटी के एमडी दीपक राय आगे बताते हैं कि किफायती घरों के निर्माण में एक और बड़ी बाधा रेगुलेटरी नियम-कायदे भी हैं. किसी प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू करने से पहले डेवलपर्स को जमीन के इस्तेमाल में बदलाव (Land Use Conversion), पर्यावरण मंजूरी समेत कई तरह की अनुमतियां लेनी पड़ती हैं. ये मंजूरियां अलग-अलग सरकारी विभागों से मिलती हैं.
कई बार इन प्रक्रियाओं में लंबा समय लग जाता है, जिससे प्रोजेक्ट शुरू होने में देरी होती है और डेवलपर्स की लागत बढ़ जाती है. आखिरकार इस बढ़ी हुई लागत का असर घरों की कीमतों पर भी पड़ता है.
दीपक राय इस समस्या का समाधान भी बताते हैं. वे कहते हैं, “अगर सरकार मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए कम कीमत पर जमीन उपलब्ध कराए, तो उनके लिए अपना घर बनाना काफी आसान हो सकता है.”
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एक करोड़ से महंगे घरों पर बढ़ा फोकसनाइट फ्रैंक के मुताबिक, भारत के आठ बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद में साल 2018 में किफायती घरों की हिस्सेदारी करीब 52% थी. साल 2026 तक यह घटकर सिर्फ 15% रह गई.
इसके उलट, 1 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी इसी अवधि में 14% से बढ़कर 62% से अधिक हो गई. इसका मतलब नए घरों की सप्लाई में किफायती मकानों की हिस्सेदारी लगातार कम हुई है, जबकि महंगे और लग्जरी घरों का दबदबा बढ़ा है.
वहीं, केयरएज रेटिंग्स के अनुसार साल 2026 की पहली तिमाही में लॉन्च किए गए नए घरों में से 9% घर 4 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत के थे. बूट्स रियलिटी के एमडी दीपक राय का कहना है कि प्राइवेट बिल्डर प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर 25-30% का लाभ कमाते हैं. किफायती आवास पर यह प्रॉफिट मात्र 10-12% होता है.
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