अगर आप एक यूट्यूबर हैं या फिर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर तो ये खबर आपके लिए है. अगर आप भी दिल्ली में बैठकर अमेरिका की किसी कंपनी के लिए वीडियो एडिट करते हैं. जयपुर से किसी ब्रिटिश क्लाइंट के लिए डिजाइन बनाते हैं. किसी विदेशी ब्रांड के लिए इंस्टाग्राम कैंपेन करते हैं. या कोई ऐसा ऑनलाइन काम करते हैं जिसका पैसा विदेश से आता है. बोले तो कमाई डॉलर में होती (Earning in dollars) है तो 1 अक्टूबर से आया आरबीआई का नियम जान लीजिए, नहीं तो आपका अकाउंट फ्रीज हो सकता है.
यूट्यूब पर वीडियो बनाते हो या इंस्टा रील, नया नियम नहीं जाना तो अकाउंट फ्रीज हो सकता है
1 अक्टूबर से RBI के नए फॉरेन एक्सचेंज नियम लागू (Earning in dollars) हो गए हैं. इनमें सर्विस एक्सपोर्ट करने वालों को एक एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन फॉर्म, यानी EDF देना होगा. इसमें बताना होगा कि आपने कितनी वैल्यू की सर्विस विदेश में दी है. वैसे ये कोई यूट्यूबर टैक्स नहीं है. ये फॉरेन एक्सचेंज की रिपोर्टिंग का नियम है.

1 अक्टूबर से RBI के नए फॉरेन एक्सचेंज नियम लागू हो गए हैं. इनमें सर्विस एक्सपोर्ट करने वालों को एक एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन फॉर्म, यानी EDF देना होगा. इसमें बताना होगा कि आपने कितनी वैल्यू की सर्विस विदेश में दी है. वैसे ये कोई यूट्यूबर टैक्स नहीं है. ये फॉरेन एक्सचेंज की रिपोर्टिंग का नियम है.
क्या है सर्विस एक्सपोर्ट?मान लीजिए आप भारत में बैठे हैं, लेकिन आपने लंदन की कंपनी के लिए लोगो बनाया. आपने अपनी सर्विस विदेश में बेची. इसी तरह कोई भारतीय कंसल्टेंट विदेशी कंपनी को सलाह देता है. कोई कोडर अमेरिकी क्लाइंट के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है. कोई क्रिएटर विदेशी ब्रांड के लिए पेड वीडियो बनाता है. ऐसे मामलों में ये नया नियम लागू हो सकता है. Mint ने खास तौर पर फ्रीलांसर, कंटेंट क्रिएटर, यूट्यूबर, इन्फ्लुएंसर, कंसल्टेंट और एजेंसी जैसी कैटेगरी का जिक्र किया है. लेकिन एक चीज ध्यान रखें. हर यूट्यूब या इंस्टाग्राम पेमेंट अपने आप सर्विस एक्सपोर्ट नहीं मान लिया जाएगा. पैसा किस कंपनी से आ रहा है, आपने सर्विस किसे दी, आपका कॉन्ट्रैक्ट क्या कहता है, इन सब पर मामला डिपेंड करेगा.
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अगर आप इस केटेगरी में आते हैं, तो आपको हर क्लाइंट के लिए अलग EDF देने की जरूरत नहीं है. RBI के नियम के मुताबिक पूरे महीने की सर्विस एक्सपोर्ट के लिए एक सिंगल EDF दिया जा सकता है. नॉर्मली जिस महीने आपने इनवॉइस बनाया, उस महीने के खत्म होने के 30 दिन के अंदर EDF देना होगा. यानी अक्टूबर में इनवॉइस बनाया है तो सामान्य डेडलाइन 30 नवंबर होगी. नॉन-सॉफ्टवेयर सर्विस में इसे आपके ऑथराइज्ड डीलर बैंक के जरिए दिया जाएगा. यानी वो बैंक जो आपकी विदेशी पेमेंट को हैंडल कर रहा है.
छोटे और मझोले फ्रीलांसर को दिक्कत हो सकती हैबड़े तो अपना संभाल लेंगे क्योंकि उनके पास CA से लेकर दूसरी टीम होती है. लेकिन छोटे और मझोले फ्रीलांसर को दिक्कत होगी. Business Standard की रिपोर्ट के मुताबिक पहले सॉफ्टवेयर के अलावा दूसरी सर्विस एक्सपोर्ट करने वालों पर इस तरह का डिक्लेरेशन देने का नियम नहीं था. अब छोटे सर्विस प्रोवाइडर भी इसके दायरे में आ गए हैं. यहां तक कि ऑनलाइन म्यूजिक या योगा सिखाने वाला कोई छोटा इंडिविजुअल भी अगर विदेश में सर्विस दे रहा है, तो उसे ये नियम देखना पड़ेगा. और यही बहस है. बड़ी IT कंपनी के पास फाइनैंस टीम है. टैक्स टीम है. कंप्लायंस टीम है. लेकिन कोई फ्रीलांसर महीने में विदेश के दो क्लाइंट से ₹40,000 या ₹50,000 कमा रहा है, उसके लिए एक और फॉर्म, बैंक से बात और सही रिपोर्टिंग नया काम है.
RBI की तरफ से फायदा ये है कि विदेशी कमाई का रिकॉर्ड साफ होगा और अलग-अलग सर्विस के लिए एक कॉमन सिस्टम बनेगा. लेकिन अब फ्रीलांसर की तरफ से सवाल है कि छोटी कमाई करने वाले पर भी कितना पेपरवर्क बढ़ेगा और बैंक इसे कितनी आसानी से लागू करेंगे. क्या ये सीमलेस सर्विस के लिए गैरजरूरी स्टेप बन जाएगा? आप इस बारे में क्या सोचते हैं, हमें कमेंट्स में ज़रूर बताएं.
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