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पिता को खोने से, वर्ल्ड चैंपियन बनने तक! मनीषा की ये कहानी भावुक कर देगी

मनीषा भानवाला की वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीत सिर्फ उनकी जीत नहीं है. यह भारतीय महिला कुश्ती के इतिहास में एक नया अध्याय था. उनसे पहले कोई भी भारतीय महिला सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड नहीं जीत सकी थी.

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मनीषा भानवाला रेसलिंग में देश की पहली महिला वर्ल्ड चैंपियन हैं. (Courtsey-WFI)

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  • 30 अक्टूबर 2026 को मनीषा भानवाला ने 59 किलोग्राम वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय महिला रेसलिंग में पहली बार वर्ल्ड चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया।
  • मनीषा ने अपने पिता के निधन के बाद भी अपने खेल को जारी रखा और कई हार के बावजूद अपनी वेट कैटेगरी बदलकर बेहतर प्रदर्शन किया।
  • इस जीत के बाद भारतीय महिला रेसलिंग के इतिहास में नया अध्याय शुरू हुआ है और मनीषा ने देश के लिए वर्ल्ड चैंपियनशिप में पहला गोल्ड मेडल जीता है।

30 अक्तूबर 2026 का दिन भारतीय महिला रेसलिंग का सबसे सुनहरे दिन साबित हुआ. 38 साल के इतिहास में पहली बार कोई भारतीय महिला रेसलर वर्ल्ड चैंपियन बनी. भारत ने कई रेसलर्स से इस खिताब की उम्मीद की. चाहे वह ओलंपिक मेडलिस्ट साक्षी हों या फिर एशियन चैंपियन रहीं विनेश फोगाट. लेकिन हर बार निराशा ही भारत के हिस्से आई. मनीषा भानवाला ने 2026 में यह इंतजार खत्म किया. उन्होंने 59 किलोग्राम वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता.

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इस जीत के साथ मनीषा ने भारतीय महिला कुश्ती के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा. इसमें पिता का साथ छूटने का दर्द भी था, कई बार मिली हार भी थी और अपने खेल को बेहतर बनाने के लिए गए मुश्किल फैसले भी.

मनीषा के करियर में पिता का रोल

मनीषा ने अपने पिता से सालों पहले किया वादा किया था. अब मनीषा ने ये वादा पूरा कर लिया. जींद की रहने वाली मनीषा के रेसलिंग करियर में उनके पिता का अहम रोल रहा. उन्होंने ही फिटनेस के कारण मनीषा को ट्रेनिंग कैंप में भेजा था. रेसलिंग करते-करते  मनीषा ने इसे करियर बनाने का ठान लिया. मनीषा ने लल्लनटॉप को बताया,

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मेरे पिता ने ही मुझे सबसे पहले रेसलिंग कैंप में भेजा था. धीरे-धीरे मुझे रेसलिंग करना पसंद आ गया. मेरे पिता का सपना था कि मैं रेसलर बनूं. देश के लिए मेडल ले कर आऊं. मैं जब भी रेसलिंग करती हूं, तो उनको ही याद करती हूं. हर मेडल उनको ही समर्पित करती हूं.

पिता के निधन के बाद खेला टूर्नामेंट

मनीषा के लिए उनके पिता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं.  मनीषा के करियर में 17 अप्रैल 2022 का दिन बेहद मुश्किल साबित हुआ. इसी दिन, मनीषा अपने पहले सीनियर एशियन चैंपियनशिप खेलने के लिए मंगोलिया जा रही थीं. उनके पिता उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट छोड़कर घर लौट रहे थे. लेकिन उसी दिन उन्हें हार्ट अटैक आया और उनका निधन हो गया. मनीषा के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. वह घर वापस जाना चाहती थीं. लेकिन फिर उन्होंने पिता के लिए टूर्नामेंट खेलने का फैसला किया.

मनीषा मंगोलिया गईं और अपना मुकाबला लड़ा. वह गोल्ड तो नहीं जीत सकीं, लेकिन ब्रॉन्ज मेडल लेकर लौटीं. यह उनके सीनियर करियर का पहला एशियन चैंपियनशिप मेडल था. पिता के जाने के बाद मनीषा ने उस दुख को अपनी ताकत बना लिया. उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी. साल 2022 से 2024 तक उन्होंने एशियन चैंपियनशिप में लगातार तीन ब्रॉन्ज मेडल जीते. लेकिन गोल्ड मेडल का इंतजार बना रहा. आखिरकार साल 2025 में जॉर्डन के अम्मान में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता.

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एशियन चैंपियन से वर्ल्ड चैंपियन का सफर

एशियन चैंपियन बनने के बाद भी मनीषा के लिए वर्ल्ड चैंपियनशिप का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने 2023 से लगातार तीन वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लिया. लेकिन किसी में भी मेडल नहीं जीत सकीं. मनीषा ने अपने खेल को बेहतर बनाने के लिए अपनी वेट कैटेगरी भी बदलीं. उन्होंने 65, 62 और 59 किलोग्राम कैटेगरी में मुकाबले किए.

साल 2026 में जापान में हुए एशियन गेम्स मनीषा के लिए एक और बड़ा झटका लेकर आए. मनीषा को उम्मीद थी कि वह इस वह टूर्नामेंट में गोल्ड जीतेंगी. लेकिन वह बिना मेडल के देश लौटीं. इस नाकामयाबी ने उनके अंदर एक नई ताकत फूंक दी. उन्होंने 59 किलोग्राम वेट कैटेगरी में वर्ल्ड चैंपियनशिप ट्रायल्स दिए थे. उनका यह फैसला उनके लिए वरदान साबित हुआ.

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इस बार उन्होंने अपने प्रदर्शन से सबको प्रभावित किया. उन्होंने कनाडा की लॉरेंस ब्यूरेगार्ड को हराकर शुरुआत की. इसके बाद क्वार्टर फाइनल में मंगोलिया की बोलोरतुआ खुरेलखू को 6-0 से मात दी. सेमीफाइनल में उनका सामना मेजबान कजाखस्तान की अल्टिन शगायेवा से हुआ. मनीषा ने इस मुकाबले में 10-0 की बढ़त बनाई और पिनफॉल से जीत हासिल कर फाइनल में जगह बना ली.

फाइनल में उनके सामने अमेरिका की पैन अमेरिकन चैंपियन अबीगेल नेट थीं. मुकाबले में मनीषा 0-6 से पिछड़ गईं. लेकिन उन्होंने आखिर तक हार नहीं मानी. धीरे-धीरे वापसी की और स्कोर 8-6 कर दिया. इस जीत के साथ उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया.

महिला रेसलिंग का नया अध्याय

यह सिर्फ मनीषा की जीत नहीं है. यह भारतीय महिला कुश्ती के इतिहास में एक नया अध्याय है. उनसे पहले, कोई भी भारतीय महिला सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड नहीं जीत सकी थीं. भारत को इस प्रतियोगिता में आखिरी सीनियर वर्ल्ड टाइटल 2010 में सुशील कुमार ने दिलाया था. आज मनीषा के पास वर्ल्ड चैंपियन का खिताब है. जिस पिता ने कभी उन्हें फिटनेस के लिए कुश्ती के मैदान तक भेजा था, उनकी बेटी ने उसी मैदान पर दुनिया जीत ली है.

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