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अच्युतानंदन: मोदी को 'लड़का', राहुल को 'बेबी' बताने वाला बूढ़ा शेर

जितनी प्रधानमंत्री की उम्र नहीं, उससे बड़ा पॉलिटिकल करियर है इनका.

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फोटो - thelallantop
ये स्टोरी 'द लल्लनटॉप' के साथ इंटर्नशिप कर रहे ऋषभ श्रीवास्तव ने लिखी है.
‘उलकम चुटूम वलिबन’ यानी ‘घुमंतू लड़का’ जो ‘इंडिया कभी कभी आता है’. ये वीएस अच्युतानंदन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी थी. ये नाम उन्होंने अपने समय के सुपरहीरो एमजीआर की एक फिल्म से उठाया था. इस बात ने चुनावी सभा में काफी हंसी बटोरी थी. 92 साल का यह 'बूढ़ा शेर' जो अब दोबारा केरल का मुख्यमंत्री बनने को तैयार है. अच्युतानंदन CPI(M) से हैं और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को लीड कर रहे हैं. 2011 में भी उन्होंने LDF को भी जीत के कगार पर पहुंचा ही दिया था. उसके पहले 2006-11 तक वीएस ही मुख्यमंत्री रहे थे. इस बार उनके क्षेत्र मलापुझा से कॉन्ग्रेस ने 29 साल के वीएस जॉय (पूर्व छात्र नेता) को उतारा है. उस शख्स के सामने जो अपनी कटार जैसी तेज बातों के लिए जाना जाता है. वीएस के 70 साल के राजनैतिक करियर के सामने 65 साल के प्रधानमंत्री मोदी 'लड़के' ही हैं. ज्योति बसु 96, सुरजीत 92, नम्बूदरीपाद 87 और नयनार 85 की उम्र में पूरी तरह रिटायर हो गए थे. वीएस अभी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं. अपने सेंस ऑफ ह्यूमर के लिए जाने जाते हैं. उनके बहुत सारे भाषणों के हिस्से यूट्यूब पर ‘कॉमेडी वीडियोज’ में देखे जा सकते हैं. राहुल गांधी को ‘अमूल बेबी’ कहने वाले यही थे. पर ये सिर्फ कॉमेडी नहीं है. वीएस 2011 अपनी साफ़ सुथरी और ईमानदार छवि के लिए जाने जाते हैं. जनता के नेता कहलाते हैं. हालांकि पार्टी में ही एक समय उनके चेले रहे विजयन उनके बड़े विपक्षी हैं. पर चलता है राजनीति में. शुरुआत में ही 13 दिनों में 64 रैलियां कर वीएस ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे. सोशल मीडिया पर भी इनने भयानक प्रचार किया है. बहुत सक्रिय हैं दद्दाजी फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पर.
CPI(M) में जो सीताराम येचुरी बनाम प्रकाश करात पॉलिटिक्स चलती है, उसका असर केरल में भी है. हाल ही में पार्टी प्रमुख बने येचुरी अच्युतानंदन के बड़े समर्थक हैं. वहीं विजयन के सिर पर प्रकाश करात का हाथ है. 2011 में करात किंकर्तव्यविमूढ़ता के स्थिति में आ गए और वीएस और विजयन के बीच तालमेल नहीं बिठा पाए थे. नतीजन चुनाव हार गए.
इस बार येचुरी ने कमान संभाली है. मुख्यमंत्री उम्मीदवार के घोषणा नहीं हुई है, पर चांसेस हैं कि वीएस को संतुष्ट तो किया ही जाएगा. चाहे एक साल की गद्दी ही सही. आखिर जनता वीएस के नाम पर ही वोट कर रही है. पर मलापुझा के लोग वीएस पर ‘माइग्रेटरी बर्ड’ होने का आरोप लगाते हैं. कहते हैं कि वीएस तिरुअनंतपुरम में रहते हैं पांच साल और एक महीने के लिए मलापुझा आ जाते हैं वोट मांगने.
वीएस इडवा समुदाय (पिछड़ी जाति) से आते हैं. पर कभी जाति के नाम पर वोट मांगते नहीं देखे गए. 1923 में अल्लापुझा में एक गरीब परिवार में पैदा हुए और 11 की उम्र में अनाथ भी हो गए. जिंदा रहने के लिए स्कूल का साथ छोड़ना पड़ा. पर बाद में उन्होंने बहुत सारी किताबें पढ़ीं और बिना औपचारिक शिक्षा के सारी जानकारी रखते हैं. टेक्नोलॉजी भी उनसे अछूती नहीं है.
14 साल की उम्र में उन्होंने CPI जॉइन कर ली. उस समय के सारे बच्चे बिगड़े हुए थे. जो मर्जी कर देते थे. स्वतंत्रता संग्राम में भी लड़े और कम्युनिस्ट आंदोलन में भी. 1946 में पुलिस ने उनको बहुत मारा था. पांच साल जेल में रहे थे. चार साल अज्ञातवास में. क्या गज़ब लगा होगा! छुप छुप के रहना. उस समय के लड़के क्या क्या सोचा करते थे गांधी के ब्रह्मचर्य और मार्क्स के वर्ग संघर्ष के अलावा. आजकल के लड़के उससे भी पुरानी बातें वैदिक सभ्यता और न्यूटन के नियम पढ़ते रहते हैं. टाइम मशीन लाओ यार!
फैक्ट्री में काम भी किया इन्होंने जहां ट्रेड यूनियन के संपर्क में आए. वहीं से CPI में आए. 1964 में जब CPI का विघटन हुआ तब ये (CPI मार्क्सवादी) के शिलाधार बने. बड़े बड़े लोगों नयनार और नम्बूदरीपाद के बीच अपनी पहचान बनानी मुश्किल थी पर राज्य स्तर पर सब इनको जानते थे. 1980 में ये CPI के राज्य सचिव बने.
केरल में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के बीच पाला बदलती रही और वीएस के हाथों से फिसलती रही. 2001 में इनका समय आया और अपनी कारतूस वाली बातों से इन्होंने जंगल कटाई, भू माफिया के खिलाफ इश्टाइल में आवाज उठाई. वो इश्टाइल जिसके लिए राजनीतिक व्यंग्य पसंद मलयाली लोग पैसे देकर भी सुनेंगे. देखते हैं न शशि थरूर साहब किस कदर बेहतरीन लिखते हैं. 2006 में इनका समय आया और ये मुख्यमंत्री बने. हालांकि कई मंत्री इनके सेनापति विजयन के ही कब्जे में थे. पर ठीक है यार. ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या! काम ही करना है ना यार? 90 की उम्र में इश्टाइल रखते हो, जिंदा रहने के लिए यही बहुत है. हालांकि विजयन को उस दौर में नेता प्रतिपक्ष कहा जाता था. ए भी इश्टाइल है रे बाबा! पर्यावरण और औरतों की लड़ाई लड़ने वाले वीएस सेक्स रैकेट और सेक्स माफिया के खिलाफ भी जंग छेड़ चुके हैं. वो पुराने स्कूल के नेता हैं जो दिमाग से मजबूत और दिल से साफ़ होते थे. आजकल के नहीं जो दिल से मजबूत और दिमाग से साफ होते हैं. कुछ भी बोलते रहते हैं और शर्म भी नहीं आती. माफी भी तुरंत मांगते हैं. उधर जा के कहते हैं मैं तो उधर देख रहा था. विद्या कसम और विदा कसम वाले डकवर्थ-लुईस नियम से बचने की कोशिश करते हैं. इस कद्दावर नेता ने भ्रष्ट लोगों से पार्टी को जुड़ने से रोका है और अपनी पार्टी के खूनी नेताओं के खिलाफ भी आवाज उठायी है. आधुनिक दौर की राजनीति ने वीएस को मजबूर किया है पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस के साथ मिलाने से. वो इसके समर्थन में रहे हैं. हालांकि इस आधार पर बूढ़े शेर को कठघरे में करना जल्दबाजी है. वक़्त बताएगा इसके पंजे की धार अभी कितनी है. दुनिया के सबसे वयोवृद्ध नेताओं में से एक वीएस ‘केरल मॉडल’ के प्रणेता रहे हैं. श्री नारायण गुरु के जाति भेदभाव के खिलाफ आन्दोलन को आगे बढाया है इन्होंने. जाति और धर्म से ऊपर उठकर इन्होंने केरल में एक सामाजिक आर्थिक समरसता वाली व्यवस्था का गठन किया है या उसमें एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है. ये उनके पक्ष और विपक्ष वाले क्रमशः कहेंगे. इग्नोर नहीं मार पाओगे बाबा.
पुराने स्कूल के होते हुए भी इन्होंने वर्तमान की जो राजनीतिक, सामजिक, यांत्रिक समझ दर्शाई है उसके लिए ये अनुकरणीय हैं. राजनीतिक लोगों को कई पैमानों पर आंका जाता है और आंकने वाले अपने अपने तरीके से आंकते हैं. सारे आंकलन सही होते हैं. क्योंकि ये क्षेत्र ही उतना बड़ा है और लोग भी उतने ज्यादा हैं.
बीस-पच्चीस साल पहले कोई कोई टीवी पर बोलता रहता था ‘मैं काल हूं’ ‘मैं समय हूं'. तुम्हीं जज कर लेना भ्राते! हमारे बस का नहीं है. अभी तो हम बस देख रहे हैं कि मुख्यमंत्री कौन बनता है और उसके बाद करता क्या है. कहीं इतिहास फिर से लिखवाने पर जोर तो नहीं होगा? संस्कृत या मलयालम अनिवार्य करना? बीफ बैन या फ्री? और दारू? जाओ बिहार. वैसे केरल में बिहार से बहुत लोग गए हैं काम करने. गुरु, राज है तुम्हारा.

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