ये वो दौर था जब गैर इंडियन पिचों पर और खासकर तेज़ पिचों पर इंडिया की जीत की खबरें अखबारों में कम ही देखने को मिलती थीं. लेकिन इस सीरीज़ में पहले चारों मैच इंडिया ने जीते और पहले मैच को छोड़कर बाकी मैचों में सौरव गांगुली को मैन-ऑफ़-द-मैच मिला.
गांगुली ने सीरीज़ में 222 रन बनाये और 15 विकेट लिए. 18 सितंबर को इन 15 में से 5 विकेट लिए. पहली इनिंग्स में गांगुली ओपेनिंग के लिए उतरे और 2 रन बनाकर आउट हो गए. इंडिया ने कुछ ख़ास बैटिंग नहीं की और 50 ओवेर में गिरते पड़ते 182 रन ही बन पाए. जवाब में सईद अनवर और शाहिद अफ़रीदी ने ठीक शुरुआत दी. पार्टनरशिप 50 रन के पार पहुंच गई. देबाशीष मोहंती ने सईद अनवर को वापस पहुंचाया. लेकिन फिर भी 183 का टार्गेट चेज़ करने के लिए 50 रन की पहली पार्टनरशिप बहुत अच्छी शुरुआत होती है. इसके बाद शाहिद अफ़रीदी को अबे कुरुविला और रमीज़ राजा को हरविंदर सिंह ने वापस भेजा. पाकिस्तान अब 87 रन पर 3 विकेट खो चुका था. मैच एक बैलेंस में आ गया था. यहां से मामला सौरव गांगुली ने संभाला.

गांगुली छोटे रन-अप के साथ बढ़िया सीम बॉलिंग कर रहे थे.
देबाशीष मोहंती थोड़े महंगे जा रहे थे. सचिन ने गेंद गांगुली को सौंपी. 19वें ओवर की दूसरी गेंद और स्टंप्स की लाइन में पड़ी गुड लेंथ की गेंद को सलीम मलिक ने फ्लिक करने के चक्कर में मिड ऑन पर खड़े कप्तान सचिन को कैच दे दिया. इसके बाद सौरव गांगुली ने इजाज़ अहमद, हसन रज़ा, मोईन खान, और अंत में आकिब जावेद को कैच आउट करवाया. गांगुली के पांचों विकेट कैच आउट हुए. अबे कुरुविला ने आखिरी विकेट के रूप में सक़लैन मुश्ताक़ को मोहंती के हाथों कैच करवाया.
एक साल पहले टोरंटो में हुई सीरीज़ का बदला लिया जा चुका था. इस सीरीज़ में बस नाम में फ्रेंडशिप थी. मैदान पर आते ही कटाजुज्झ शुरू हो जाती थी. तेंदुलकर की टीम ने एक शानदार सीरीज़ खेली थी. गांगुली को टोरंटो खूब रास आया. वहां का हवा पानी उनकी गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी को असिस्ट कर रहा था.
बढ़िया सीम बॉलिंग और बॉलिंग ट्रैक पर सही जगह टप्पे खिलाने की आदत ने 18 सितम्बर को सौरव गांगुली को करियर बेस्ट फ़िगर्स दिया. 10 ओवर, 3 मेडेन, 5 विकेट और 16 रन.





















