अपनी अभिव्यक्ति के लिए प्रात: नहीं सदा स्मरणीय 'सीलमपुर की लड़कियां' नाम की कविता लिखने वाले आर. चेतनक्रांति अपनी राह के अनूठे कवि हैं. सीलमपुर की लड़कियों के बाद चेतन ने सीलमपुर के लड़कों पर भी लिखा है. आज एक कविता रोज़ में प्रस्तुत है आर. चेतनक्रांति की कविता...
क्रोध और प्रतिशोध में उन्होंने लाखों डॉक्टरों-इंजीनियरों, जजों और प्रधानमंत्रियों को नालियों के हवाले कर दिया
पढ़िए 'सीलमपुर की लड़कियां' फेम आर. चेतनक्रांति की कविता 'सीलमपुर के लड़के'
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फोटो - thelallantop
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सीलमपुर के लड़के
सीलमपुर के लड़के देशप्रेमी हो गए पहले वे भूखे थे, और बेरोजगार और घर से, घरवालों से, रुंधे हुए नाक तक, समाज से और देश से भी उन्हें समझ नहीं आता था कि क्या करें जिंदगी के बारे में कोई नक्शा उनके पास नहीं था, न देश के बारे में वे जमुहाइयां लेते हुए आकाशवाणी सुनते और समझ न पाते कि यह किसके बारे में क्या कहा जा रहा है पाठ्य-पुस्तकों की लिखत उन्हें पराई जान पड़ती कर्तव्यपरायण अध्यापक अत्याचारी लगते और पढ़ाकू जो मोहल्ले के आसमान में फानूस की तरह लटके रहते इनके हर खेल का निशाना बनते शिक्षा इनके लिए एक औपचारिक क्रिया थी जिसका सबसे अच्छा उपयोग सरकारी नौकरी था लेकिन वह बहुत ऊंचा आदर्श था जिसके लायक वे खुद को नहीं मानते थे यूं ही बस बाई-डिफाल्ट पड़ोसी के टी.वी. में इतवार की फीचर फिल्म एकमात्र ठिकाना थी जहां वे कुछ देर रह सकते थे और जिसे बाद में एक बड़ी दुनिया का दरवाजा बनना था सालों वे उसे खोलते-बंद करते रहे फिर जब वह अंततः खुला और नब्बे का दशक मुहावरा बनने से पहले चार सौ साल पुरानी एक मस्जिद की धूल हवाओं को सौंप खिड़कियां खोलने में जुटा वे अपने अंधेरों से ऊब चुके थे फिर रोशनी हुई सब तरफ उजाला सब साफ़ दिखने लगा यह भी कि जिन स्वार्थों को बल्लियों पर टांगकर दुर्लभ कर दिया गया था सबके लिए प्राप्य थे जिन्हें धर्मग्रंथ त्याज्य कहा करते थे वे भी दुनिया रोज एक टटके कालीन की तरह थर्रर्र से खुलती रोज क्षितिज थोड़ा और पास आ जाता रोज आत्मा की गिरहें तड़-तड़ टूटतीं रोज रीढ़ का एक सुन्न हिस्सा जाग उठता रोज पता चलता कि पैसा बुरी चीज नहीं है रोज मालूम होता कि न प्रेम पाप है, न हस्तमैथुन राम और युधिष्ठिर जब अपनी गंभीर मुद्राएं कैमरामैन को सौंपकर हंसते हुए चले और उनसे ज्यादा हंसते हुए कुछ और लोग दौड़कर मंच पर आए कि आगे मनोरंजन हम करेंगे वे जान चुके थे कि सत्य वही है जो सामने है और यह भी कि वह डरावना तो बिलकुल भी नहीं बरसों से हवा में लटके उनके निहत्थे और अनाथ हाथ एक-एक मोबाइल पकड़ कर जिस दिन वापस लौटे उन्हें पता चल चुका था कि कुछ तो होता रहा है उन्हें बिना बताए कि लडकियां उन पर हंस रही हैं और हर साल उन्हीं के फोटो पहले पन्ने पर छपते हैं और हर दिन वे और ज्यादा अ-लैंगिक दिखाई देती हैं हर दिन और ज्यादा कमनीय, लेकिन और भी ज्यादा उदासीन कि जैसे उन्हें पता ही न रहा हो कि दुनिया को मर्द चलाते हैं क्रोध और प्रतिशोध में उन्होंने लाखों डॉक्टरों-इंजीनियरों, जजों और प्रधानमंत्रियों को नालियों के हवाले कर दिया उन्हें यह देश नहीं चाहिए था जिसमें प्राकृतिक चीजों की इतनी हेठी हो कंधे तक हाथ डाल-डाल कर मोबाइल की स्क्रीन में मसल डाला उन्होंने दूर देश की जाने कितनी औरतों को जिन्हें वे दिन भर मुहल्ले की पढ़ाकू लड़कियों की टांगों में मुस्कुराते देखते थे और आगे जाकर थूक देते थे वीर्य और रक्त की बाल्टियां कंधे पर टांगे वे रात-रात भर घूमते कामनाओं की तस्वीरें बनाते बसों, रेलों, पेशाबघरों और पुलों के नीचे लिख-लिख छोड़ते रहे अपने संदेश जिनका कोई जवाब उन तक नहीं पहुंचा रामलीला मैदान में जब वह बूढ़ा गांधी की तरह मरने बैठा मरने का भारतीय आदर्श उनके लिए मजाक बन चुका था वे नाउम्मीदी की हदों पर मंडरा रहे थे बस जीने की अंधी भूख थी जो उन्हें वहां लेकर गई कई दिन वे सड़कों पर दनदनाते घूमे कई दिन उन्होंने हर सवाल का जवाब मोटरसाइकिल से दिया और जिस वक्त यह तय हुआ कि देश को सिर्फ ताकत से चलाया जा सकता है वे खुद ही जान चुके थे कि पौरुष ही पथ है फिर हजारों रंग उतरे दिल पर अलग, देह पर अलग और हजारों ख्वाहिशें जो अलग अलग बोलियों में दरअसल ताकत की ही ख्वाहिश थीं वे वजह ढूंढ़ने निकले जो एक नाखुश देश के हर नुक्कड़ पर उपलब्ध थी पर उन्होंने जो चुना वह सिर्फ इसलिए नहीं कि आसान था इसलिए भी कि उसमें शरीर-सौष्ठव के प्रदर्शन की गुंजाइश थी निष्ठा के पातिव्रत और अमानवीय की संवैधानिकता को सिद्ध करने की गारंटी भी वे सत्य के लिए वन नहीं जाना चाहते थे उनके लिए इतना काफी था कि आधी रात जगाकर कोई न कहे कि जो तुम छाती से चिमटा कर सो रहे हो देख लो वह कितना सच है अंतिम तौर पर विश्वास करने के लिए वे काफी थक चुके थे उनकी हड्डियां अब आवरण मांग रही थीं सो पहले उन्होंने पौरुष पहना फिर पैसा और सबसे ऊपर देश जिसने सब शिकायतें सब दुःख सोख लिए वे कहते घूमे कि क्या हुआ जो मरते हैं लोग लोग तो मरते ही हैं असली बात है देश और देश का विकास और जिस दिन वह सहसा कंधे पर बैठा मिला वह आदमी जिसने जाने किस-किस तरह बताया कि छाती चौड़ी हो और टांगों पर बाल हों और हाथ में लाठी हो और दिल में सत्य को पा लेने का भरोसा और संशय से सुरक्षित रहने का आत्मबल तो कुछ भी किया जा सकता है लेकिन वह पहले विकास करेगा, उसने कहा और सीलमपुर के लड़के मुस्तैद हो गए बोले कि अब जो सामने आया तोड़ देंगे तोड़ देंगे जो पीछे से हंसा तोड़ देंगे जो ऊपर से मुस्कुराया तोड़ देंगे जो नीचे कुलबुलाया और इसी मंत्र को जपते हुए बैठ गए एक आंख बंद कर समाधि में और दूसरी आंख खोल कर तैयारी में.कुछ और कविताएं यहां पढ़िए:
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‘जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख'
‘दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में, अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे’
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Video देखें:
एक कविता रोज़: 'प्रेम में बचकानापन बचा रहे'



















