The Lallantop

'यह केवल संकेत है कि कौन किससे मरेगा'

देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता जिसमें वो अपनी मौत की वजह बता रहे हैं.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
अपने ही शब्दों में घिरे रहने वाले देवी प्रसाद मिश्र. न इन्हें अपनी तारीफों के पुल पर सैर करनी आती है न आलोचनाओं पर कान धरने का समय है इनके पास. फेसबुक पर रहना इन्हें आता नहीं और इनका कहना है कि मुसलमान होने में दिक्कत तो है. सोशल मीडिया से दूरी चाहे जितनी हो लेकिन उससे किनारा नहीं कसते. आप पढ़िए उनकी एक कविता जिसमें ये अपनी ही मौत की वजह बता रहे हैं.

सत्य को पाने में मुझे अपनी दुर्गति चाहिए...

औरों की मैं नहीं जानता लेकिन मेरा काम अर्णव गोस्वामी के बिना चल जाता है सत्य को पाने में मुझे अपनी दुर्गति चाहिए, आइंस्टीन का बिखराव जिसमें बाल भी शामिल हों तो क्या हर्ज़ चे का चेहरा और स्टीफ़न हाकिंग का शरीर फ़ासबिण्डर की आत्मा और ऋत्विक घटक का काला-सफ़ेद मैं अपने प्रतिभावान होने का सर्वेक्षण कुछ दिनों के लिए टाल रहा हूं, बचे समय में मैं अपने दुस्साहस से काम चला लूंगा और असहमति से मैं अपने काव्य-पाठ में खाली हॉल से आश्वस्त हुआ इस्मत-चुग़ताई की अन्त्येष्टि में तीन लोग थे रघुवीर सहाय के दाह-संस्कार में कुछ ज़्यादा थे मैं भी था लेकिन मुझे लोग नहीं जानते थे अब भी नहीं जानते तब फ़ेसबुक नहीं था और अब है तो मुझे उस पर होना नहीं आया मेरे पास अजीब झुंझलाया चेहरा था कि जैसे किसी सतत असहमत का आधा अमूर्त चेहरा चारकोल से बनाकर कलाकार अपनी प्रेमिका के साथ भाग गया हो जिस समाज में सनी लियोनी, मोदी और अमिताभ बच्चन के ट्विटर पर सबसे ज़्यादा लाइक-फॉलोवर हों उसमें रात एक बजे ख़ुद के साथ ख़ुद का होना और इस बात पर नींद का न आना कि सिंगापुर में रहने वाला आपका भांजा मोदी समर्थक है काफ़ी अजीब और बियाबान विपक्ष है मैं अन्दर-अन्दर ही फटती नस से मरूंगा, यह केवल संकेत है कि कौन किससे मरेगा मतलब कि संस्कृति मन्त्री अपने भीतर के ज़हर से मरेगा आइए, अब चलते हुए पूछ ही लेते हैं कि लोग शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्में क्यों देखते हैं और आईपीएल के बीसियों मैच और उनमें फंसा राजीव शुक्ला का बहुत खाया चेहरा अगर आपको याद हो तो मैंने कई बार कहा है कि कोई भी प्रेम अवैध नहीं होता और अत्याचारी से घृणा सबसे रोमाण्टिक कार्यभार है पृथ्वी छोड़ने में मुझे देर हो रही है लेकिन प्रेमिका का बिस्तर छोड़ने में भी मैं कई तरह के बहाने करता रहा हूं चलिए, इस कविता को यहीं ख़त्म मान लें और मेरे लिए दिल्ली छोड़ने के टिकट का चन्दा इकट्ठा करें मैं पता नहीं कब से यही सोचे जा रहा हूं कि एक फासिस्ट का नाम रमाकान्त पाण्डे कैसे हो सकता है.
पढ़िए क्या हुआ था जब देवी प्रसाद को दिल्ली की सड़क पर पीटा गया.

एक कविता का वीडियो भी देख लें:


ये भी पढ़ें:

एक कविता रोज़: 'दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है' राज शेखर की कविताएं: प्रेम, बारिश और इंक़लाब एक कविता रोज़: प्रेम में मनुष्य प्रकृति बन जाता है एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement