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एक कविता रोज़: वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

कल थी शमशेर बहादुर सिंह की जन्मतिथि, आज पढ़िए उनके कुछ शे'र.

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फोटो - thelallantop

शमशेर बहादुर सिंह की कल जन्मतिथि थी. इस मौके पर उनकी कविताएं तो सबको बहुत याद आईं, लेकिन शे'र कम. आज एक कविता रोज़ में सुबह-सुबह शमशेर को याद करते हुए पेश हैं उनके कुछ बहुत मशहूर शे'र...    

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जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद

वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

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आज फिर काम से लौटा हूं बड़ी रात गए

ताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद

मेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैं

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तेरी आंखों में अभी नींद भरी है शायद

***

कोई तो साथ-साथ मेरी बेख़ुदी में था

मैं कैसे अपने होश में आया ज़वाब दो

उम्मीदे-वस्ल हो, कि बहाना हयात का

तुम मेरे दिल में हो, मेरे दिल का ज़वाब दो

***

तू मेरे एकांत का एकांत है

मैं समझता था कि मेरा तू नहीं

***

इश्क़ की इंत हा तो होती है

दर्द की इंतहा नहीं होती

***

कितने बादल आए, बरसे औ' गए

जिनके नीचे मैं पड़ा सुलगा किया!

छिपके बैठे मेरे दिल की चोट में

आपने अच्छा किया, पर्दा किया

रुक गए हैं क्यों ज़मीनो-आसमां 

कुछ कनखियों से इशारा-सा किया

शमशेर की एक कालजयी कविता 'टूटी हुई बिखरी हुई' यहां पढ़ें :

'तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियां लहरों से करती हैं'

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