शमशेर बहादुर सिंह की कल जन्मतिथि थी. इस मौके पर उनकी कविताएं तो सबको बहुत याद आईं, लेकिन शे'र कम. आज एक कविता रोज़ में सुबह-सुबह शमशेर को याद करते हुए पेश हैं उनके कुछ बहुत मशहूर शे'र...
एक कविता रोज़: वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
कल थी शमशेर बहादुर सिंह की जन्मतिथि, आज पढ़िए उनके कुछ शे'र.
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फोटो - thelallantop
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जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
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आज फिर काम से लौटा हूं बड़ी रात गए
ताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद
मेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैं
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तेरी आंखों में अभी नींद भरी है शायद
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कोई तो साथ-साथ मेरी बेख़ुदी में था
मैं कैसे अपने होश में आया ज़वाब दो
उम्मीदे-वस्ल हो, कि बहाना हयात का
तुम मेरे दिल में हो, मेरे दिल का ज़वाब दो
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तू मेरे एकांत का एकांत है
मैं समझता था कि मेरा तू नहीं
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इश्क़ की इंत हा तो होती है
दर्द की इंतहा नहीं होती
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कितने बादल आए, बरसे औ' गए
जिनके नीचे मैं पड़ा सुलगा किया!
छिपके बैठे मेरे दिल की चोट में
आपने अच्छा किया, पर्दा किया
रुक गए हैं क्यों ज़मीनो-आसमां
कुछ कनखियों से इशारा-सा किया
शमशेर की एक कालजयी कविता 'टूटी हुई बिखरी हुई' यहां पढ़ें :











