कवि की वसीयत
सुरेश जोशी - शायद कल मैं न रहूं कल यदि सूर्य उदय हो तो कहना मेरी बंद आंखों में एक आंसू सूखना बाकी है कल यदि हवाएं चले तो कहना किशोरावस्था में एक युवती के चोरी किये स्मित का पक्व फल अब भी मेरी डाल से गिरना बाकी है यदि कल समंदर छलके तो कहना मेरे ह्रदय में पत्थर हो गए स्याह इश्वर को चूर-चूर करना बाकी है कल यदि चांद रोशन हो तो कहना उसे आलिंगन में लेकर भाग जाने को एक मछली अब भी मुझ में तड़प रही है कल यदि अग्नि प्रकट हो तो कहना मेरी विरही परछाईं की चिता अब भी जलना बाकी है शायद कल मैं न रहूं ***
एक कविता रोज: कवि की वसीयत
आज पढ़िए गुजराती कवि सुरेश जोशी की कविता का अनुवाद.
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फोटो - thelallantop
सुरेश जोशी गुजराती भाषा के कवि, निबंधकार, कथाकर और आलोचक थे. उन्हें 1983 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. जिसे उन्होंने लेने से मना कर दिया. बहुत सारे पुरस्कारों से सम्मानित इस कवि ने अपने समय को साहित्य में मजबूती से दर्ज किया. उनकी कविता 'कवि की वसीयत' को लल्लनटॉप के लिए ट्रांसलेट किया है सावजराज ने. सावजराज द लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे हैं.
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