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एक कविता रोज़: जागो तो सिर धुन पछताओ, हाय-हाय कर चीखो

पद या कहें कुपद शैली में एक कविता.

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फोटो - thelallantop

हिंदी कविता के फक्कड़ और रससिद्ध कवि अष्टभुजा शुक्ल अपनी कविता और अपने 'आप' से भी दूर से ही पहचान में आते हैं. कविता की चार किताबें आ चुकी हैं. एक किताब का नाम 'इसी हवा में अपनी भी दो चार सांस हैं' जैसा सुंदर है. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए अष्टभुजा का एक पद जिसे वह कुपद भी कहते हैं... 

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कविजन खोज रहे अमराई। जनता मरे, मिटे या डूबे इनने ख्याति कमाई॥ शब्दों का माठा मथ-मथकर कविता को खट्टाते। और प्रशंसा के मक्खन कवि चाट-चाट रह जाते॥ सोख रहीं गहरी मुषकैलें, डांड़ हो रहा पानी। गेहूं के पौधे मुरझाते, हैं अधबीच जवानी॥ बचा-खुचा भी चर लेते हैं, नीलगाय के झुंड। ऊपर से हगनी-मुतनी में, खेत बन रहे कुंड॥ कुहरे में रोता है सूरज केवल आंसू-आंसू। कविजन उसे रक्त कह-कहकर लिखते कविता धांसू॥ बाली सरक रही सपने में, है बंहोर के नीचे। लगे गुदगुदी मानो हमने रति की चोली फींचे॥ जागो तो सिर धुन पछताओ, हाय-हाय कर चीखो। अष्टभुजा पद क्यों करते हो कविता करना सीखो॥  

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