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एक कविता रोज़: स्त्रियों के समूह में मैं सुखी नहीं होता हूं

आज एक कविता रोज़ में पढ़िए, वरिष्ठ कवि आग्नेय की एक कविता.

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फोटो - thelallantop

आग्नेय हिंदी के चर्चित कवि हैं. 'अपने ही खिलाफ', 'मेरे बाद मेरा घर', 'लौटता हूं उस तक' और 'सिरहाने मीर के' जैसे कविता-संग्रहों के कवि आग्नेय भोपाल में रहते हैं और विश्व कविता की पत्रिका 'सदानीरा' के संपादक हैं.  एक उम्र से वाकिफ वरिष्ठ कवि आग्नेय का कल जन्मदिन था.  आज उन्हें शुभकामनाएं देते हुए पेश है एक कविता रोज़ में उनकी एक कविता... 

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स्त्रियों के समूह में मैं सुखी नहीं होता हूं स्त्रियों के इस समूह से मैं एक ही स्त्री को चुनता हूं और उसे ही दिन-रात प्यार करता हूं एक ही स्त्री का सामीप्य मुझे तृप्ति देता है कार्यों के आधिक्य से थककर सामाजिक व्यस्तता से ऊबकर और यौन-व्याधियों से डरकर मेरा प्रेम उसके अग्नि-वक्ष में रचनाशील होता है उसके शरीर में रूप नहीं है उसके हृदय में प्रेम नहीं है उसके नेत्रों में वसंत नहीं है फिर भी स्त्रियों के समूह से एक ही स्त्री को चुनकर एक काव्य-संसार की रचना करता हूं उसके अतिरिक्त मेरे प्रेम की भाषा समझने के लिए सारे संसार में किसी भी स्त्री के पास हृदय नहीं है

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