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मनोज तिवारी ने मैदान पर अपनाई वो रणनीति, जो 18 साल पहले स्टीव वॉ ने अपनाई थी

नतीजा भी सेम ही आया है.

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मनोज तिवारी बंगाल रणजी टीम के कप्तान हैं.
ऐसा नज़ारा बहुत कम देखने को मिलता है क्रिकेट के मैदान में. जब बॉलर को छोड़कर सारे फील्डर मैदान के एक ही हिस्से में हो. वो भी विकेट के पीछे. दरअसल ऐसी फील्डिंग देखकर किसी को लग सकता है कि बैट्समन पर दबाव कम होगा. वो मैदान के किसी भी हिस्से में खुलकर शॉट मार सकता है लेकिन ऐसा नहीं है. उलटा बैट्समन भयंकर दबाव में आ जाता है. कभी ये प्रयोग ऑस्ट्रेलिया ने किया था. रणजी ट्रॉफी में इसे बंगाल के कप्तान मनोज तिवारी ने दोहरा दिया है.
ये तस्वीर देखिए. इसे मुहम्मद शमी ने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है.
इस तस्वीर में मुहम्मद शमी गेंदबाज़ी कर रहे हैं.
इस तस्वीर में मुहम्मद शमी गेंदबाज़ी कर रहे हैं.

इसमें बॉलर के अलावा सारे खिलाड़ी विकेट के पीछे खड़े हैं. एक विकेटकीपर और उसके दाहिने कतार से खड़े नौ फील्डर्स. इस नज़ारे ने उस मैच की याद दिला दी, जब स्टीव वॉ ने 1999 में ज़िम्बाब्वे के खिलाफ़ ऐसी ही फील्डिंग सेट की थी. बॉलर थे डैमियन फ्लेमिंग.
रणजी ट्रॉफी का मैच चल रहा था. छत्तीसगढ़ और बंगाल के बीच. मैच में एक वक़्त ऐसा आया कि छत्तीसगढ़ के 109 रन पर 9 विकेट गिर गए. तब मनोज तिवारी ने कुछ तूफानी करने की सोची. उनके दो तेज़ गेंदबाज़ अशोक डिंडा और मुहम्मद शमी फॉर्म में चल रहे थे. उन्होंने अपनी सारी सेना स्लिप में लगा दी. बॉलर को छोड़कर सारे खिलाड़ी विकेट के पीछे से दायीं तरफ बनती गई एक कतार में खड़े थे. इसका नतीजा भी सुखद निकला. जल्द ही छत्तीसगढ़ के आख़िरी बल्लेबाज़ पंकज राव ने डिंडा की गेंद में बल्ला अड़ा दिया. कीपर साहा ने गेंद लपक ली. 110 पर पूरी टीम आउट हो ली.
जब मनोज तिवारी से पूछा गया कि ऐसी फील्ड लगाते वक़्त उनके दिमाग में क्या चल रहा था तो वो बोले,
"मैं नहीं चाहता था कि बल्लेबाज़ को एज लगने से रन मिलते रहे. न ही मैं कोई गैप छोड़ना चाहता था. जब किसी बॉलर को स्लिप में 9 फील्डर दिखते हैं तो उसे मानसिक मज़बूती मिलती है."
बंगाल ने ये मैच पारी और 160 रनों से जीता.
इससे पहले ये नज़ारा सिर्फ दो बार देखने को मिला है इंटरनेशनल क्रिकेट में. कम से कम हमें तो इतना ही पता है. अगर आपको पता हो कोई और इनके अलावा तो हमें भी बताएं.
एक तो आपको ऊपर बता ही चुके हैं कि कैसे स्टीव वॉ ने ज़िम्बाब्वे के खिलाफ़ ये तरीका इस्तेमाल किया था. वो एक वन डे मैच था, जो हरारे में खेला जा रहा था. ज़िम्बाब्वे के आख़िरी बल्ल्लेबाज़ डेविड मुटेंद्र क्रीज़ पर थे. स्टीव वॉ ने उनकी मेंटल स्ट्रेंथ परखने की ठानी और 9 फील्डर स्लिप में लगा दिए. बॉलर थे डैमियन फ्लेमिंग.
स्टीव वॉ कभी भी मैदान पर प्रयोग करने से हिचके नहीं हैं.
स्टीव वॉ कभी भी मैदान पर प्रयोग करने से हिचके नहीं हैं.

स्टीव वॉ से पहले ऐसा जिस शख्स ने किया था वो भी एक ऑस्ट्रेलियन ही था. ग्रेग चैपल स्टीव से 23 साल पहले ये कारनामा कर चुके थे. 1976-77 की ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैण्ड टेस्ट सीरीज में. तब बॉलर थे दी ग्रेट डेनिस लिली. हालांकि उस वक़्त बैट्समन कोई टेल एंडर नहीं था. बल्कि न्यूज़ीलैण्ड के टॉप बल्लेबाज़ ग्लेन टर्नर थे.
ग्रेग चैपल ने हमेशा नई चीज़ें ट्राई की है, हम भारतीय इसे अच्छी तरह जानते हैं.
ग्रेग चैपल ने हमेशा नई चीज़ें ट्राई की है, हम भारतीयों से ज़्यादा कौन इसे जानता है!



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