चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी जीते, मुख्यमंत्री के रूप में दिखते तौर पर जनता की पहली पसंद अखिलेश यादव ही माने जा रहे हैं. उनकी राजनीति को लेकर कई बातें हो चुकी हैं, पर आज हम आपको बताएंगे अखिलेश की निजी जिंदगी की वो बातें जो बड़े प्यार से आपका मन मोह लेंगी. मुस्कुराता हुआ मुख्यमंत्री यूं ही नहीं लाडला बन गया है जनता के लिए, बिना कुछ किएः-
#1. पॉल्यूशन के इस दौर में कौन ऐसा मुख्यमंत्री नहीं चाहेगा
अखिलेश यादव के व्यक्तित्व की एक ऐसी बात है जो उन्हें यूपी क्या किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री बनने के काबिल बनाती है. अखिलेश को पर्यावरण से बहुत प्रेम है. ये ऐसा वक्त है कि लोग सत्ता के लिए पागल रहते हैं, ऐसे में अखिलेश के दिमाग में बचपन से ही पेड़-पौधों के लिए कहानियां थीं. जब अखिलेश मिलिट्री स्कूल धौलपुर पढ़ने गये तो साथ में एक पौधा ले गए थे. उनकी एंबेसेडर कार की डिक्की में पौधा, खुरपी और जग रखा हुआ था. आगरे के पास अखिलेश गाड़ी से उतरे और सड़क किनारे गड्ढा खोदा, पौधा लगा दिया. बारिश का मौसम था, तकलीफ नहीं हुई. जब भी वो घर जाते छुट्टियों में ये काम जरूर करते.नेताजी एक बार उनके स्कूल गये तो प्रिंसिपल से पूछा कि अखिलेश शरारत तो नहीं करता. तो जवाब मिला कि उसके पास टाइम ही कहां है. पढ़ता है, खेलता है और बचे वक्त में पौधे लगाता है.बारहवीं के बाद अखिलेश का दाखिला हिंदू कॉलेज में भी हो सकता था. वो उस दौर के क्रेज, आईटी सेक्टर में भी जा सकते थे, पर गए पर्यावरण विज्ञान पढ़ने. मैसूर. वहां भी खूब पौधे लगाते. लोग-बाग कौतूहल से देखते. छुट्टियों में वो लखनऊ आए हुए थे. पौधे लेकर सपा कार्यालय पहुंच गये. लोग हैरान रह गए. लखनऊ से इटावा जाते तो गाड़ी में पौधे, कुदाल और खुरपी रखे रहते. सैफई में बाग-बगीचे घूमते रहते. वहां पारिजात के पौधे खोज निकाले थे. सैफई में आज भी मुख्यमंत्री से पूछ कर ही पौधे लगते हैं. क्योंकि इनको ही पता है कि कहां क्या लगाना है. बीटेक के वक्त जब अखिलेश ट्रेनिंग करने गजरौला की वैम ऑर्गेनिक्स में पहुंचे तो प्रदूषण को लेकर अधिकारियों से खूब बात की. बहुत चीजें बदलवा दीं. ऑस्ट्रेलिया में भी पर्यावरण विज्ञान ही पढ़ा. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पौधों पर ध्यान दिया. पहले वन विभाग छोटे-छोटे पौधे लगाता था, पर अखिलेश ने नर्सरी में ही पौधों को बड़ा करने का सुझाव दिया. इससे पौधे मुरझाने बंद हो गए.
2015 और 2016 में अखिलेश ने वृक्षारोपण का गिनीज बुक में आने वाला रिकॉर्ड बनाया. बहुत सारे लोग एक साथ पहुंचे थे. 2015 में ही सीएम आवास में गौरैया के घरौंदे बने. एक पक्षी विशेषज्ञ अखिलेश से मिलने आये थे. किसी काम से. अखिलेश ने कहा कि 'अगर आप गौरैया मेरे घर बुला देंगे तो मैं आपका काम कर दूंगा'. क्योंकि विशेषज्ञ का कहना था कि वो मुंह से आवाज निकालकर बुला सकते हैं. उन्होंने बुला भी दिया. तब से गौरैयों के लिए वहां घर बन गया.बता दें कि अखिलेश ने यूपी में टाइगर रिजर्व और लायन सफारी के लिए बहुत काम किया है.
#2. अखिलेश की जनता में पॉपुलैरिटी कुछ इन वजहों से है
# चारबाग स्टेशन पर एक बूढ़ी औरत शिरडी घूम कर आई थी. उसने कहा - भगवान ने अखिलेश को बेटा बनाकर भेजा है. ये औरत उन 1080 सीनियर सिटीजन में शामिल थी, जिनको घऱ वालों ने छोड़ा था और सरकार ने घूमने का मौका दिया था. # डायल 100 जब लागू किया जा रहा था तब अफसरों ने कहा कि इस रिसोर्स में लागू करना बहुत मुश्किल है. पर अखिलेश ने कहा - पहली बार रेल इंजन आया था तो लोगों ने कहा था कि ये चलेगा नहीं. अब डायल 100 यूपी का सक्सेसफुल वेंचर है. # डिंपल यादव ने फेसबुक पर एक फोटो देखी थी. नोएडा मेट्रो स्टेशन पर 13 साल का हरेंद्र वजन तौलने की मशीन लेकर बैठा था. पर पढ़ाई भी कर रहा था. डिंपल ने इसके बारे में अखिलेश से बात की. सीएम ने तुरंत इसकी मदद की. इसी तरह मथुरा के एक भाई-बहन के आईआईटी में सलेक्ट हो जाने के बावजूद पैसे की कमी के चलते एडमिशन नहीं हो पा रहा था. अखिलेश ने इनकी भी मदद की. # पेटीएम के मालिक विजय शेखर शर्मा ट्रैफिक के चलते अखिलेश के आवास पर रिक्शे से पहुंचे थे. रिक्शे वाले से अखिलेश बात करने लगे. नाम पूछा. फिर जाते वक्त उसे नया रिक्शा दे दिया. क्योंकि वो किराये का रिक्शा चलाता था. वो आदमी नए रिक्शे पर अपने बीवी बच्चों को बैठाकर 100 किमी दूर अपने घर त्यौहार मनाने गया. # एक लड़की ने लखनऊ रेलवे स्टेशन से अखिलेश को ट्वीट किया कि 'मैं सुसाइ़ड करने जा रही हूं'. अखिलेश ने तुरंत लोगों को भेजा उसे बचाने के लिए. फिर उससे बात भी की. प्रेम प्रसंग का मामला था. धोखा मिला था. फेसबुक पर दोस्ती हुई थी पर लड़का शादीशुदा था. # जनता दरबार में एक लड़की फरियाद लेकर पहुंची थी. पर उसका एक पैर नहीं था. अखिलेश ने कहा कि तुम्हारा काम होगा पर पहले एक कृत्रिम पैर लगवा लो. तुरंत अफसरों को आदेश दिया. इसी तरह एक किसान की फोटो छपी थी अखबार में. उसका भी एक ही पैर था. अखिलेश ने तुरंत उसके लिए भी आदेश दिया. # 2008 में छात्र संघों को लेकर सपा ने आंदोलन किया था. माया सरकार ने बहुत कड़े एक्शन लिए. लोगों को जेल में ठूंस दिया गया. मुलायम को नजरबंद करने की बात सुन एक लड़के ने खुद को आग लगा ली. इसका नाम रणविजय सिंह यादव था. सुल्तानपुर के भलौरी गांव का था. ये कभी बंबई गया था हीरो बनने. अखिलेश इसको हीरो कहकर ही बुलाते थे. रणविजय बच नहीं पाया. अखिलेश बहुत दुखी हुए थे. उसके घर की बहुत मदद की अखिलेश ने. # अखिलेश की बेटी ने एक बार उनसे जिद कर दी कि बच्चे मजाक उड़ाते हैं तुम्हारे पापा कुरता पायजामा पहनकर आते हैं. बेटी की बात पर मुख्यमंत्री उसके स्कूल जींस-टीशर्ट पहनकर गए. # जब अखिलेश यादव ऑस्ट्रेलिया में पेइंग गेस्ट बनकर रहते थे तो एक बार अमिताभ बच्चन वहां कार्यक्रम करने गए थे. अखिलेश के बारे में कोई जानता नहीं था. इतना लो प्रोफाइल मेंटेन करते थे कि कोई कुछ जानता ही नहीं था. शाम को तैयार होकर निकले. मकान मालिक को बताया कि घूम के आ रहा हूं. पर अगले दिन अखबार में अमिताभ के साथ फोटो छपी थी. तो मकान मालिक ने मजाक किया कि एक्टर के साथ फोटो खिंचा लिए. जब अखिलेश ने बताया कि वो मेरे अंकल हैं. पारिवारिक रिश्ते हैं तो कोई मान नहीं रहा था. बहुत कहने के बाद माने. तब सबको पता चला कि डिफेंस मिनिस्टर मुलायम इनके पिताजी हैं. # एक बार युवा सांसदों ने लंच के लिए अखिलेश को संसद की कैंटीन में बुलाया. बहुत भीड़ थी तो वेटर ध्यान नहीं दे रहे थे. तो अखिलेश ने मुस्कुराते हुए कहा कि चलिए मैं लंच कराता हूं. फिर सबको सेंट्रल हॉल ले गए. वहां पर स्टाफ भागते हुए आया. ये अखिलेश की लोकप्रियता है. मुस्कुराते हुए सबके दिल में बस जाना.#3. नाक टेढ़ी होने की वजह फुटबॉल है
अकसर अखिलेश को अफसरों के साथ क्रिकेट खेलते पाया जाता है. ये स्कूल से खेलते थे. एक फुटबॉल मैच में वो राइट-आउट पोजीशन पर थे. एक शॉट उनकी नाक पर लगा. अस्पताल में पता चला कि नाक की हड्डी टूट गई है. वहीं से नाक टेढ़ी हो गई. पढ़ाई पूरी कर लखनऊ आने के बाद अखिलेश ने एक टीम बनाई थी. 16 साल हो गए. अखिलेश की टीम बरकरार है. वैसे बता दें कि पूर्व क्रिकेटर जवागल श्रीनाथ इनके दोस्त हैं.खेलों से अखिलेश को इतना लगाव है कि एक कार्यक्रम में वो के. के. सी कॉलेज पहुंचे थे. वहां बच्चे बॉस्केटबॉल खेल रहे थे. अखिलेश भी ग्राउंड में उतर गए. उस वक्त वो युवा संगठनों के प्रभारी थे. लोग दंग रह गये उनकी फुर्ती देखकर.
#4. कंप्यूटर का विरोध करने वाली सपा को टेक सैवी बना दिया अखिलेश ने
अखिलेश जब गांव जाते थे तो कोई न कोई टेक्निकल चीज साथ लेकर. एक बार रिमोट से चलने वाला जहाज लेकर गए थे. खूब उड़ाते थे. एक बार प्लेन में जा रहे थे. उस वक्त कुछ लड़के इनको देखकर मुस्कुरा रहे थे, हाथ हिला रहे थे. अखिलेश ने उनको पास बुला लिया. वो बच्चे सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे. बोले कि यूपी में ये इंडस्ट्री रहती तो हम लोग घर के पास ही रहते. मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने HCL को लखनऊ बुलाया. देखिए कि कभी अंग्रेजी और कंप्यूटर का विरोध करने वाली सपा को टेक सैवी बना दिया है अखिलेश ने. जबर्दस्त सोशल मीडिया प्रजेंस है. 2012 में मीडिया अखिलेश को कवर नहीं करती थी. उस वक्त भी अखिलेश ने डिजिटल मीडियम का खूब इस्तेमाल किया था.एक बार अखिलेश यादव ने लखनऊ में कांवरियों के डीजे बजाने पर बैन लगा दिया. तो भाजपा के विधायकों ने विधानसभा में खूब हंगामा किया. अखिलेश ने उनसे पूछा कि आपमें से कोई भी डीजे का मतलब बता दे. बता देंगे तो आपकी बात मान लेंगे. कोई बता नहीं पाया. तब अखिलेश ने मतलब बताते हुए इससे होने वाली दिक्कतों के बारे में भी बताया.
#5. साइकिल की कहानी संयोगों वाली है
वैसे तो अभी बाप-बेटे में साइकिल सिंबल को लेकर बड़ा घमासान हुआ था. पर इस साइकिल की कहानी भी दिलचस्प है. चौपाल में मुलायम गांव के एक दोस्त रामप्रकाश गुप्ता के साथ ताश खेल रहे थे. गुप्ता ने शर्त रखी कि जो जीतेगा उसे रॉबिनहुड साइकिल मिलेगी. मुलायम जीत गए. यही साइकिल मुलायम का सिंबल बन गई. बता दें कि साइकिल का आविष्कार भी बाप-बेटे की ही एक जोड़ी ने किया था. 2012 के चुनाव में साइकिल अखिलेश के बड़े काम आई थी. चुनाव के दौरान अखिलेश ने जिलावार और गांववार डेटा निकाला कि कहां पर कितनी जनसंख्या है, कैसे वोट हैं. कैसे वोटिंग होती है. कैसे कैंडिडेट जीतते हैं. क्या मुद्दे हैं. इतनी गहन पढ़ाई के बाद स्ट्रैटजी बनाई कि 224 सीटें आईं. पूरे 2012 के चुनाव में अखिलेश ने 1400 किमी साइकिल चलाई थी. एक बार प्रशासन ने हाईवे पर साइकिल रैली निकालने से मना कर दिया. अखिलेश 75 किमी पगडंडियों और धूल भरे रास्तों पर साइकिल चलाते गए. रैली में लोग बदलते रहे. पर अखिलेश चलाते रह गए. इस रैली में अखिलेश अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे थे. नोएडा की फिल्म सिटी में साइकिल रैली शुरू करते हुए कहा कि ये जमाना हाथी पार्क का नहीं आईटी पार्क का है. बता दें कि नोएडा में ही मायावती ने हाथी पार्क बनवाया है. इस चुनाव के साथ एक रोचक चीज है. 1987 में मुलायम जैसे क्रांति रथ पर चढ़कर मुख्यमंत्री बने थे, वैसे ही रथ को अखिलेश ने 2011 में निकाला था.#6. छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र से ली थी ट्रेनिंग जो कामयाब रही
1999 में सांसदी के लिए नामांकन दाखिल होने के बाद अखिलेश ने खादी पहनना शुरू कर दिया. वो आठ सूत की खादी का कपड़ा पहनते हैं. छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्रा ने अखिलेश को राजनीति की ट्रेनिंग दी थी. 2011 में समझाया था कि संभव है कि पार्टी के कुछ लोग तुम्हें नेता के तौर पर स्वीकार ना करें. पर तुम घबराना मत. वो अखिलेश जिंदाबाद ना कहें तो भी मत घबराना. जिस दिन तुम खुद को नेता के तौर पर स्थापित कर लोगे तो मैं खुद अखिलेश जिंदाबाद के नारे लगाऊंगा. अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनने के बाद नेताओं के पैर छूना बंद कर दिया. पहले वो सबके बबुआ ही थे. पर नेता बनने के लिए ये जरूरी था. स्कूल के दिनों में जनेश्वर मिश्रा ने अखिलेश से पूछा था कि राजनीति में कब आओगे. तो अखिलेश मुस्कुराने लगे. पीठ पर धौल जमाते हुए मिश्र ने कहा - आना जरूर, राजनीति अच्छी चीज है. इसे अच्छे लोगों की जरूरत है. जब अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों ने परिवारवाद का सवाल उठाया तो जनेश्वर मिश्रा ही बचाव में आए. अपनी गंभीर आवाज में बोले - यह सत्ता का परिवारवाद नहीं है, यह संघर्ष का परिवारवाद है. मिश्रा ने ही अखिलेश को भाषण देने, खुद को कैरी करने की ट्रेनिंग दी थी. #7. अखिलेश के स्कूल और कॉलेज की घटनाएं भी कम रोचक नहीं हैं नेताजी के बाबा आजादी से पहले फिरोजाबाद के इटौली से आकर सैफई में बसे थे. इनका नाम खड़गजीत सिंह था. कुश्ती और घुड़सवारी इनके शौक थे. एक अंग्रेज अफसर से घोड़े को लेकर लड़े थे. पटक दिया था. अंग्रेजों ने इनके घोड़े को गोली मार दी. इनको गिरफ्तार कर लिया. तभी पूरा परिवार सैफई गया रहने.मुलायम सिंह यादव की शादी के 16 साल बाद टीपू का जन्म हुआ था. मुलायम के मित्र दर्शन सिंह ने कहा - मुलायम के घर टीपू सुल्तान पैदा हुआ है. तभी टीपू नाम पड़ गया.यही दर्शन सिंह जसवंतनगर विधानसभा में साइकिल पर मुलायम को पीछे बैठा कर चुनाव प्रचार करते थे. मुलायम प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से उम्मीदवार थे. इलाके की जनता ने जब पैसे इकट्ठा कर के दिए तब एंबेसेडर कार खरीदी गई. नेताजी ने कहा था कि जीतने के बाद सब लौटा दूंगा. पेट्रोल के लिए सोनेलाल नाम के आदमी ने कहा कि एक वक्त का खाना नहीं खाएंगे. और पेट्रोल का पैसा देंगे. 1977 में रामनरेश यादव की सरकार में मुलायम सहकारिता मंत्री थे. उसी दौरान बच्चे को पढ़ाने के लिए इटावा के चौबुर्जी में एक छोटा सा घर ले चुके थे. उसी में भाई राजपाल, उनकी बीवी प्रेमलता, शिवपाल यादव और सरला रहते थे. टीपू ने यहीं पर पढ़ाई शुरू की. स्कूल में टीचर ने पूछा कि क्या नाम रखा जाएगा. टीपू कैसे चलेगा. फिर कई नाम इनको दिखाये गए. टीपू ने खुद ही अखिलेश नाम चुना अपने लिए. जब चाचा शिवपाल और अवध किशोर वाजपेयी के साथ अखिलेश धौलपुर स्कूल में इंटरव्यू देने पहुंचे तो वाजपेयी साथ बैठे थे क्योंकि थोड़ी नर्वसनेस हो रही थी. सब कुछ अंग्रेजी में हो रहा था. इंटरव्यू में पूछा गया - 'ह्वाट इज हेल्मेट?' अखिलेश ने जवाब दिया - 'इट कवर्स ऑर हेड'. 'ह्नाट इज योर फादर?' - तो कहा - 'माय फादर इज नेता'. वाजपेयी के बहनोई शांति स्वरूप मिश्रा धौलपुर स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते थे. धौलपुर मिलिट्री स्कूल को लेकर अखिलेश इमोशनल रहते हैं. मानते हैं कि यहीं से सब कुछ सीखा है. कहना है कि दुनिया के बिगड़े को फौज में भेज दो सुधर जाएगा. पर फौज के बिगड़े को कोई कहीं सुधार नहीं सकता. स्कूल के दिनों में अखिलेश ने कभी राजनीति में जाने की बात नहीं कही थी. हमेशा अफसर बनने की बात करते थे. चाचा शिवपाल और चाची सरला ही उन्हें स्कूल लाने-छोड़ने जाते थे. एम्बेसेडर कार में. जब नेताजी मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश से मिलने उनके स्कूल पहुंचे तो अगवानी के लिए बच्चे लाइनों में खड़े थे. अखिलेश भी उसी लाइन में खड़े थे. नेताजी अपनी गाड़ी छोड़ स्कूल के मेटाडोर में बैठकर बच्चों के हॉस्टल तक गए. टीपू सुल्तान के शहर में पढ़ने जब टीपू पहुंचा तो पहले ही साल में सप्ली लग गई. इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए ये बुरा सपना होता है. पर इसके बाद कभी भी अखिलेश की दुबारा सप्ली नहीं लगी. फेल हुए विषय में बहुत ज्यादा नंबर आए थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वो कॉलेज गए थे तब इस बात का जिक्र किया था. इनके एक दोस्त हैं संतोष तिवारी. स्कूल के. भिलाई में रहते हैं. उनकी शादी होने वाली थी. कहा कि आना पड़ेगा. और आगरा आना होगा. सारे दोस्त वहीं आएंगे और वहीं से चलेंगे. अखिलेश सांसद थे. बहुत व्यस्त थे. पर गए. ट्रेन में सवार होकर आगरा से बारात गए. (ये किस्से संजय लाठर की लिखी बुक 'समाजवाद का सारथी' से लिए गए हैं.)
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