40 हजार साल पहले आदिमानव ने घटते-बढ़ते चांद को अपना कैलेंडर बना लिया था. 5000 साल पुरानी मेसोपोटामियन सभ्यता ने चांद को भगवान मान लिया. फिर चांद का दीदार करके त्योहार मनाए जाने लगे. धीरे-धीरे चांद प्यार इश्क मोहब्बत वाली गज़लों से लेकर दादी-नानी की लोरियों का मेन कैरेक्टर बन गया. लेकिन वक्त बदला. जज़्बात बदले. ज़िंदगी बदली और चांद भी अब बदलने लगा है. चंदा मामा शायद नहीं चाहते कि इंसान उनके घर मेहमान बनकर आए और वहीं बस जाए. वो साल दर साल सिकुड़ते जा रहे हैं. इतने पर भी मन नहीं भर रहा तो थर्रा भी रहे हैं.
चांद पर भी 'भूकंप' आता है ये तो पता है, कैसे आता है ये भी जान लीजिए
वैज्ञानिकों के मुताबिक चांद का अंदरूनी हिस्सा ठंडा होने के कारण उसकी सतह सिकुड़ रही है और वहां 10 हजार से ज्यादा नए फॉल्ट्स की पहचान की गई है.

तो क्या कुछ टाइम बाद चांद गायब हो जाएगा? क्या नासा, इलॉन मस्क इन सबको चांद पर ठिकाना बनाने के प्लान पर मिट्टी डाल देनी चाहिए? चांद की मिट्टी क्यों इन मिशन्स की दुश्मन बनी बैठी है? सब जानेंगे. बारी-बारी से.
चांद की सतह 'टेढ़ी'भारत की स्पेस एजेंसी ISRO जापान की JAXA (Japan Aerospace Exploration Agency) के साथ मिलकर 2028 में चांद पर रोवर लैंड करने की तैयारी में है. अमेरिका की स्पेस एजेंसी NASA का प्लान तब तक चांद पर ऐस्ट्रोनॉट्स को उतार देने का है लेकिन इससे पहले कि ये सब हो एक नई रिसर्च आ गई है. पता चला कि चांद की जिस सतह को हम सीधा-साधा समझते रहे, वो तो कहीं ज्यादा टेढ़ी निकली. अमेरिका के नेशनल एयर ऐंड स्पेस म्यूजियम में पृथ्वी और ग्रहों के अध्ययन वाले विभाग के साइंटिस्ट थॉमस वॉटर्स और उनकी टीम ने प्लेनेट्री साइंस जर्नल (Planetary Science Journal) में एक पेपर पब्लिश किया है. बताया है कि चांद की सतह पर 10 हजार से ज्यादा ताजी-ताजी फॉल्ट्स हैं.
चांद पर दाग, यानी Craters हैं, ये तो हमें पहले से पता था. बाहर से कोई ऐस्टरॉइड आकर टकराता है और गड्ढा कर देता है. मगर चांद के अंदर भी ऐसा कुछ है, जिससे इसका मुंह सिकुड़ता जा रहा है. वॉटर्स और उनकी टीम ने चांद की सतह की तस्वीरें लेने वाले कैमरा से मिले डेटा को स्टडी किया. यह खास कैमरा साल 2009 से चांद पर नजर रखे है. इसके डेटा के बेसिस पर ये अनुमान लगाया गया कि पिछले 40 से 80 करोड़ साल में चांद का रेडियस करीब 45 मीटर घट चुका है. थोड़ा नंबर-नंबर खेलें तो ऐसा माना जा सकता है कि चांद हर साल 0.1 माइक्रोमीटर छोटा हो रहा है.

अब सुनने में आपको लग रहा होगा कि ये कौन-सी बहुत बड़ी बात है? बड़ी बात है. क्योंकि चांद का ऐसे सिकुड़ना वहां लेकर आता है ‘भूकंप’ यानी Moonquake.
चांद पर आते हैं भूकंप1969 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग (Neil Armstrong) और एडविन एल्ड्रिन (Edwin Aldrin) जब चांद पर उतरे तो बस उछल-कूद करके वापस नहीं आए. उन्होंने चांद पर पहला सिस्मोमीटर लगाया. ये मीटर भूंकप को मापने का काम करता है. 1969-1972 के बीच अलग-अलग अपोलो मिशनों के दौरान कई सारे सिस्मोमीटर लगाए गए. ये सतह के नीचे होने वाली हलचल को दर्ज करते रहे. जैसे धरती पर भूकंप को मॉनिटर करने के लिए किया जाता है. चांद पर भी इन सिस्मोमीटर ने हजारों ‘चंद्रकंप’ (Moonquakes) को रेकॉर्ड किया.
इनमें से कई कंपन चांद के अंदर हो रही ऐक्टिविटी से पैदा हुए थे. सिस्मिक ऐक्टिविटी से पता चलता है कि सतह के नीचे का मटीरियल कैसा हो सकता है. धरती की अंदरूनी लेयर्स के बारे में भी ऐसे ही पता किया जाता है. उसको खोदकर कोर तक पहुंचना तो पॉसिबल नहीं है.
चांद पर वापस आते हैं.
धरती की तरह ही चांद की सबसे अंदरूनी लेयर कोर भयानक गरम है. मगर वक्त के साथ-साथ ये ठंडी होती जा रही है. अब बेसिक साइंस है कि जब कोई चीज ठंडी होती है तो सिकुड़ने लगती है. धरती के साथ भी ऐसा होता है. मगर धरती की बनावट में एक चीज अलग है- टेक्टॉनिक प्लेट्स (tectonic plates). यानी हमारी जमीन पहले से ही प्लेट्स में डिवाइडेड है. मगर चांद के साथ ऐसा नहीं. वो मान लीजिए एक ही प्लेट से बना है. वो सिकुड़ती है तो टूटने लगती है. जहां वो टूटती है, वहां हमें दिखती हैं Faults- Lobate scarps जैसे पहाड़ी चोटियां और mare ridges जैसे जमीन पर बनीं सिलवटें. यानी चांद जैसे-जैसे सिकुड़ता है, उसकी सतह पर ये बदलाव आने लग जाते हैं.
धरती पर जब भूकंप आता है तो कुछ सेकंड तक रहता है. चांद पर जब भूकंप आते हैं तो वो 10-10 मिनट चलते रहते हैं. इसके बाद भी कंपन घंटे भर से ज्यादा चले जाते हैं. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर चांद पर धरती की तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा हो तो उसका क्या ही हाल होगा.

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भूकंप से सिकुड़ रहा चांदपहली बार 2019 में ये इशारा मिला कि चांद के भूकंप के पीछे एक वजह उसका सिकुड़ना हो सकता है. LRO और अपोलो के सिस्मिक रेकॉर्ड्स को एक साथ देखा-पढ़ा गया तो पता चला कि कुछ मूनक्वेक्स के केंद्र फॉल्टलाइन्स के 30 किलोमीटर के आसपास थे. अब ये तो चैलेंज है ही. कहीं ऐसा न हो कि ऐस्ट्रोनॉट वहां बेस बना रहे हों, या बेस बन चुका हो और moonquake आ जाए. चांद पर लैंडिंग या एक्सप्लोरेशन के लिए लोकेशन बहुत कैलकुलेशन के बाद चुनी जाती है. कहीं ऐसा न हो कि उस साइट से दूर कहीं ऊंचाई पर चांद पर भूकंप आ जाए और वहां से लुढ़कता-पुढ़कता मलबा हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर को उड़ा दे.
साल 2025 में Science Advances में छपी एक स्टडी बताती है कि अपोलो 17 की जो लैंडिंग साइट थी वहां आसपास के slopes से चट्टानें आकर जमा हो गई थीं. बेसिकली चांद की सतह को अस्थिर बना सकते हैं ये moonquakes.
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