स्पेस में इंसानी शरीर की हड्डियां धीरे-धीरे गलने लगती हैं. माइक्रोग्रैविटी में दिन-हफ्ते-महीने बीतते हैं और शरीर घटता जाता है. अंतरिक्ष में अचानक एक ऐस्ट्रोनॉट की जिदंगी और मौत पर बन आए तो क्या होगा? क्या आर्टिफिशल इंटेलिजेंस धरती से सैकड़ों किलोमीटर दूर इंसान की जान बचा सकती है?
भारतीय मूल के Anil Menon ने अंतरिक्ष के लिए भरी उड़ान, ISS में खोजेंगे इन सवालों के जवाब
भारतीय-मूल के NASA ऐस्ट्रोनॉट डॉ. अनिल मेनन को आठ महीने के एक्सपीडिशन पर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लॉन्च किया गया है. रूस के सोयुज रॉकेट ने उन्हें दो और ऐस्ट्रोनॉट्स के साथ अंतरिक्ष में भेजा है.


अब इतने सवाल हैं, तो जवाब भी होना चाहिए. और इन जवाबों को ढूंढने निकले हैं डॉ. अनिल मेनन. इंडियन-अमेरिकन NASA ऐस्ट्रोनॉट अनिल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) एक्सपीडिशन 74/75 का हिस्सा हैं. वो 8 महीने स्पेस स्टेशन पर बिताएंगे और इस दरम्यान ऐसी पहेलियां सुलझाएंगे जो फ्यूचर स्पेस मिशन्स में ऐस्ट्रोनॉट्स की सेफ्टी, उनकी हेल्थ के लिए बहुत अहम हैं.
भारतीय-मूल के ऐस्ट्रोनॉट अनिल मेनन को रूसी रॉकेट सोयुज पर कजाकिस्तान के बाइकोनुर से लॉन्च किया गया है. वो आने वाले आठ महीनों के लिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रहेंगे. अप्रैल 2027 तक ISS में रहते हुए तमात तरह के एक्सपेरिमेंट्स करेंगे. जैसे फ्यूचर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए हाई-क्वॉलिटी सेमीकंडक्टर क्रिस्टल्स बनाना, AI असिस्टेड अल्ट्रासउंड टेक्नीक्स को टेस्ट करना और ये देखना कि क्या बिना धरती से हेल्प लिए ऐस्ट्रोनॉट मेडिकल स्कैन वगैरह कर सकते हैं? स्पेस में कैसे हमारे शरीर के अंदर ब्लड सर्कुलेशन चेंज होता है, एजिंग और टिशू रिपेयर का क्या पैटर्न होता है, अनिल इन सब टेस्ट्स का हिस्सा भी बनेंगे.
इस दौरान उनका एक्सपेरिमेंट्स काफी काम आने वाला है. मेनन का आउटस्टैडिंग ट्रैक रिकॉर्ड शानदार है. मेडिसिन, इंजिनियरिंग, एयरोस्पेस वो एक्सपर्ट हैं, उन्हें सब आता है.
कौन हैं डॉ. अनिल मेनन?उनके पिताजी इंडियन ओरिजिन के हैं और माताजी यूक्रेनियन हैं. उनकी वाइफ ऐना भी ऐस्ट्रोनॉट हैं. अनिल खुद अमेरिका के मिनेसोटा में पैदा हुए थे. डिग्रियां उनके पास भर-भरके हैं. न्यूरोबायॉलजी में हार्वर्ड से बैचलर्स किया है और मकैनिकल इंजिनियरिंग में स्टैनफर्ड से मास्टर्स की डिग्री ली है. स्टैनफर्ड मेडिकल स्कूल से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन होने के बाद कुछ-कुछ करते-करते एयरोस्पेस मेडिसिन में भी रेजिडेंसी कर डाली.
एक जेनेटिक बीमारी होती है Huntington's. उसमें दिमाग के नर्व सेल्स ब्रेकडाउन होने लगते हैं. डॉ. अनिल ने हार्वर्ड में रहते हुए उसके ऊपर रिसर्च की थी. इंडिया में भी वो एक साल रहकर पोलियो वैक्सिनेशन पर काम कर चुके हैं. अफगानिस्तान में ऑपरेशन Enduring Freedom हो या माउंट एवरेस्ट पर क्लांबर्स की केयर, डॉ. अनिल की इमर्जेंसी मेडिसिन की ट्रेनिंग जबरदस्त काम आई है.
ये भी पढ़ें: ISRO अंतरिक्ष जा रहे भारतीय ऐस्ट्रोनॉट को धरती पर वापस कैसे लाएगा?
एक पॉइंट पर आकर, 2018 में, अनिल ने स्पेसएक्स जॉइन की. फिर एक मेडिकल प्रोग्राम चलाया ताकि कंपनी की पहली ह्यूमन फ्लाइट्स के लिए तैयारी करा सकें. पांच लॉन्च ऐसे हुए जिनमें अनिल लीड फ्लाइट सर्जन थे. अब खुद पहली बार इंटरनेशल स्पेस स्टेशन के क्रू में शामिल होकर तमाम मेडिकल इंजिनियरिंग से रिलेटेड एक्सपेरिमेंट्स करेंगे. इंडियन ओरिजन का नाम सामने आता है तो लोगों का इंटरेस्ट भी जागता ही है.
इंटरेस्टिंग इसलिए भी है क्योंकि डॉ. अनिल बहुत ही फंडामेंटल सवालों के आंसर ढूंढ़ेंगे.
स्पेस में क्या एक्सपेरिमेंट करेंगे डॉ. अनिल?स्पेस स्टेशन पर अगर अल्ट्रासोनॉग्रफी करनी होती है तो उसके लिए धरती पर साइंटिस्ट्स के सपोर्ट की जरूरत पड़ती है. अगर प्लान है चांद पर या मंगल पर लंबी ड्यूरेशन वाले मिशन्स का, तो ये डिपेंडेंस खत्म करनी पडे़गी. इसके लिए एक Augmented Reality software होता है. ये AI algorithm की हेल्प लेता है और अल्ट्रासाउंड प्रोब को गाइड करता है, ऑर्गन डिटेक्शन के लिए. यानी एक नॉन-एक्सपर्ट ऐस्ट्रोनॉट के लिए इसको ऑपरेट करना आसान हो जाता है. डॉ. अनिल इसको टेस्ट करेंगे.
फिर, दूसरी चीज, स्पेस में रहते हुए ऐस्ट्रोनॉट्स की बॉडी में ब्लड फ्लो गड़बड़ हो जाता है तो कई बार ब्लड क्लॉट भी पड़ सकते हैं. इस इंपैक्ट को ऐस्ट्रोनॉट्स में स्टडी किया जाता है. फ्लाइट के पहले उनके MRI, अल्ट्रासाउंड वगैरह किया जाता है, ब्लड सैंपल लिया जाता है. फिर मिशन के दौरान भी ये सैंपल लेते हैं. दोनों को कंपेयर करते हैं, ब्लड फ्लो, बायोमार्कर्स वगैरह पर क्या असर हुआ है, ये चेक करते हैं. डॉ. अनिल इस टेस्ट का हिस्सा भी होंगे.
तीसरी चीज होगी, मैग्नीशियम-जिंक बेस्ड alloys का टेस्ट. इसमें ये देखा जाएगा कि इन alloys को स्पेस में मेल्ट और सॉलिडिफाई करने से जो मटीरियल बनता है वो धरती पर बनने वाले प्रोडक्ट की तुलना में कैसा है. अगर उसमें कम डिफेक्ट हैं, ज्यादा मजबूत है, बायोडिग्रेडेबल है तो उसको मेडिकल इंप्लांट्स में इस्तेमाल किया जा सकेगा. प्लस इलेक्ट्रॉनिक्स, ट्रांसपोर्टेशन, एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज में भी काम आएगा.
यानी डॉ. अनिल मेनन सही मायने में एक ऑल-राउंड साइंटिफिक रिसर्च का हिस्सा होंगे. NASA का लॉन्ग टर्म गोल दूसरे प्लैनेट्स पर इंसानों को भेजने का, एक बेस तैयार करने का है. उसके लिए डॉ. अनिल की रिसर्च के रिजल्ट्स फाउंडेशनल डेटा प्रोवाइड कर सकते हैं, दुनियाभर के साइंटिस्ट्स इनके इंतजार में रहेंगे.
वीडियो: Ethanol वाला फ्यूल भी सस्ता नहीं, E20 पर इतना ज़ोर क्यों दे रही सरकार?










