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लैंडर क्रैश होने के बावजूद 'चंद्रयान-2' के ऑर्बिटर ने किया कमाल, चांद पर बर्फ खोज ली!

Chandrayaan-2 Mision के समय लैंडर नीचे उतरते समय फेल हो गया था. लेकिन इसका Orbiter लगातार हाई क्वालिटी डेटा भेज रहा है.

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चांद के साउथ पोल पर मौजूद क्रेटर्स के नीचे बर्फ के रूप में पानी के संकेत मिले हैं (PHOTO-ISRO)

भारत ने स्पेस सेक्टर में एक और मील का पत्थर हासिल कर लिया है. इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन यानी ISRO को चांद पर पानी की मौजूदगी के सबूत मिले हैं. ISRO के साइंटिस्ट्स के मुताबिक उन्होंने चांद के साउथ पोल पर मौजूद क्रेटर्स यानी गड्ढों के नीचे बर्फ की खोज की है. उन्हें जो संकेत मिले हैं, उसके मुताबिक क्रेटर्स की सतह के नीचे बर्फ के रूप में पानी मौजूद है. इसका पता लगाने के लिए ISRO ने Dual Frequency Synthetic Aperture Radar (DFSAR) का इस्तेमाल किया है जो चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर पर लगा हुआ है.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए ISRO ने माइक्रोवेव इमेजिंग का इस्तेमाल किया है. यह पहला पोलरिमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार है जिसे चांद पर भेजा गया है. चांद की सतह के बारे में की गई इस नई स्टडी में अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लैब के साइंटिस्ट शामिल थे. इस रिसर्च का पूरा फोकस चांद के साउथ पोल पर था. चांद का साउथ पोल ऐसी जगह है जहां हमेशा अंधेरा रहता है. जिस क्रेटर के नीचे पानी/बर्फ की मौजूदगी की बात कही गई है, वो दोहरी  परछाई वाला है. 

यहां कभी सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती. यही वजह है कि ये इलाका थर्मल रेडिएशन से भी बचा रहता है. साउथ पोल पर तापमान जीरो से भी 248 डिग्री नीचे चला जाता है. ये ऐसी ठंडी जगह है जो बर्फ के लिए सबसे आदर्श मानी है. एडवांस्ड रडार पोलरिमेट्रिक एनालिसिस का इस्तेमाल करके, रिसर्च करने वालों को चार दोहरी छाया वाले क्रेटर्स के तल के नीचे संभावित रूप से मौजूद बर्फ के रडार संकेत मिले हैं.

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इससे पहले चांद को लेकर जो भी स्टडी की गई, उसमें सबसे बड़ी समस्या थी कि असली बर्फ और पत्थर में अंतर पता करना. इसलिए साइंटिस्ट्स ने रडार आधारित एक सिस्टम डेवलप किया जो बर्फ और पत्थर में अंतर पता कर सके. इस तकनीक में दो रडार्स को एक साथ जोड़कर फाइनल रिजल्ट देखा जाता है. इसमें सर्कुलर पोलराईजेशन रडार (CPR) और डिग्री ऑफ पोलराईजेशन (DOP) को एक साथ कंबाइन किया जाता है. जिन इलाकों में CPR एक से ज्यादा और DOP 0.13 से कम होता है, वहां "वॉल्यूमेट्रिक स्कैटरिंग" होने की संभावना ज्यादा होती है. यह रडार की वजह से होने वाला एक इफेक्ट है जो सतह पर मौजूद चट्टानों की जगह जमीन के नीचे मौजूद बर्फ से जुड़ा है.

साइंटिस्ट्स का मानना है कि इन नतीजों का चांद पर चल रही खोज और रिसर्च के भविष्य पर बड़ा असर देखने को मिलेगा. इसके अलावा इस खोज से चंद्रयान-2 ऑर्बिटर की उपयोगिता भी साबित होती है. ये ऑर्बिटर मिशन के लॉन्च होने के कई साल बाद भी काम कर रहा है. 2019 में इस मिशन का लैंडर नीचे उतरते समय फेल हो गया था. लेकिन इसका ऑर्बिटर लगातार हाई क्वालिटी डेटा भेज रहा है.

वीडियो: चंद्रयान 3 से जुड़ी बड़ी वैज्ञानिक और सालों से ISRO की आवाज N वलारमथी की मौत कैसे हुई?

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