10 साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद भारतीय जनता पार्टी जब 2027 के चुनावों में उतरेगी तो उसके सामने एंटी-इन्कम्बेंसी के अलावा भी ढेर साली चुनौतियां होंगी. हाल ही में देशव्यापी हो गए जेन-जी आंदोलन का मुद्दा हो या यूजीसी विवाद और इसकी छाया में उगा आरक्षण आंदोलन. सरकार विरोधी इन सारे ‘सामाजिक प्रयोगों’ की पहली परीक्षा यूपी चुनाव में ही होगी. लिहाजा, बीजेपी के लिए आने वाला चुनाव पिछले दो ‘जिताऊ’ चुनावों से मुश्किल होने वाला है.
यूपी चुनाव 2027: चार लेवल का ये सर्वे बीजेपी विधायकों के बीच कोहराम मचा देगा
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एंटी-इन्कम्बेंसी, युवाओं के आक्रोश और स्थानीय मुद्दों से निपटने के लिए भाजपा ने चार अलग-अलग स्तरों पर व्यापक आंतरिक सर्वे शुरू किया है, जिसके आधार पर खराब प्रदर्शन करने वाले मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाएंगे.

हालांकि, इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए बीजेपी ने तैयारी शुरू कर दी है. इस तैयारी के नतीजे में कई मौजूदा विधायकों के टिकट कट सकते हैं. जीत के टारगेट में बीजेपी उम्मीदवारों के चयन को लेकर काफी सतर्क है. कहा जा रहा है पार्टी चार लेवल पर सर्वे करा रही है. क्या है ये सर्वे? इस पर चर्चा करेंगे, लेकिन पहले भाजपा के सामने यूपी विधानसभा चुनाव में आने वाली बड़ी चुनौतियों के बारे में जान लेते हैं.
बीजेपी के सामने चुनौतियांहिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी चुनाव से 6 महीने पहले बीजेपी ने एक आंतरिक सर्वे कराया है. यह ऐसा आकलन होता है जो बीजेपी के लिए चुनावी रणनीति तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है. रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी के लिए यह आकलन 2027 के चुनाव को लेकर खतरे की घंटी बजा रहा है. 2022 में तो राम मंदिर और डबल इंजन की सरकार के नाम पर वोट मांगे गए थे, लेकिन इस बार मुद्दे ज्यादा लोकल हैं. विपक्ष भी उन्हें हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा.
युवा और शिक्षक खड़ी करेंगे परेशानी
भाजपा के लिए जनरल कैटिगरी के युवा और शिक्षक ही सबसे बड़ी परेशानी खड़ी कर सकते हैं, जो उसके कोर वोटर माने जाते हैं. UGC Equity Regulations, 2026 को लेकर समाज के इस वर्ग में अच्छी-खासी बेचैनी है. यह बेचैनी सड़कों पर भी नजर आई, जिसका नतीजा नियम वापसी के रूप में सामने आया. सपा और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने इस रेगुलेशन को लेकर बीजेपी को जमकर घेरा था. इसे सवर्ण विरोधी कदम बताया था. माना जा रहा है कि यूपी चुनाव के दौरान ये नाराज तबका या तो वोट न देने पर विचार कर रहा है या फिर बीजेपी के खिलाफ जा सकता है.
जेन जी का गुस्सा
जेन जी प्रोटेस्ट यूपी की सड़कों पर तो वैसे नहीं हुए, जैसे दिल्ली-झारखंड या अन्य जगहों पर हुए थे. लेकिन कहा जा रहा है कि बेरोजगारी, पेपर लीक और संविदा वाली नौकरियों को लेकर लोगों में गुस्सा है, जो इंस्टा, फेसबुक या यूट्यूब पर सामने आ रहा है. विपक्ष इस आवाज को और ज्यादा बुलंद कर रहा है.
आरक्षण का मुद्दा
आरक्षण का मुद्दा भी इन दिनों गरम है. ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का प्रोटेस्ट हाल के दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिखा भी था. प्रमोशन में आरक्षण, एससी-एसटी ऐक्ट के कथित विस्तार और कथित दुरुपयोग को लेकर भी सामान्य वर्ग के लोगों में आक्रोश है. सपा की जाति जनगणना और अनुपात के आधार पर आरक्षण की मांग ने ये विभाजन और बढ़ाया है. ये सब मिलकर बीजेपी के ही वोटबैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं.
बीजेपी के कार्यकर्ता
हालांकि, इन सबसे बड़ी समस्या बीजेपी के अपने ही कार्यकर्ता हैं जो पार्टी के विधायकों से निराश हैं. बीजेपी को अपने आंतरिक सर्वे में पता लगा है कि बूथ कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जाती. प्रदेश के नौकरशाहों के मुकाबले उनके विधायक के पास पावर नहीं है. जिलाधिकारी, एसपी-एसडीएम उनके फोन नहीं उठाते. विधायक कांस्टेबल तक का तबादला नहीं करवा सकते. इन सब चीजों ने मौजूदा विधायकों के महत्व को कम किया है.
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चार लेवल पर सर्वेइन्हीं परिस्थितियों से निपटने के लिए बीजेपी की ओर से चार लेवल पर सर्वे कराया जा रहा है. ये चारों सर्वे समानातंर यानी एक ही साथ कराए जाएंगे. मतलब ये कि बीजेपी में टिकट बंटवारे में इस बार ज्यादा झंझट देखने को मिल सकता है. चार लेवल के इस सर्वे में बीजेपी ने एक ही मकसद रखा है- जिताऊ उम्मीदवारों की खोज.
इसके तहत पहला सर्वे उत्तर प्रदेश बीजेपी की ओर से कराया जाएगा. इसमें विधायकों की 15 पैरामीटर्स पर रेटिंग की जाएगी. विधानसभा में उनकी अटेंडेंस कैसी रही है. उन्होंने कितने और क्या सवाल किए हैं. विधायक निधि के उपयोग का हाल कैसा है. अपने चुनावी क्षेत्र में कितने दिन या घंटे रहते हैं. कार्यकर्ताओं के बीच उनकी छवि कैसी है और पार्टी के कितने कार्यक्रमों में भाग लेते हैं. इन सारे सवालों के आधार पर यूपी बीजेपी की ओर से सर्वे कराया जाएगा.
दूसरा सर्वे शासन स्तर पर होगा. यानी मुख्यमंत्री स्तर से यूपी सरकार एजेंसियों की मदद से एक सर्वे कराएगी कि क्या विधायक जनता के लिए आसानी से उपलब्ध हैं. क्या विकास कामों से लोग संतुष्ट हैं. इस तरह के सवाल इस सर्वे में होंगे.
तीसरा सर्वे थोड़ा पुराना है. 2014 में जब अमित शाह यूपी के प्रभारी बने थे, तब से ये सर्वे उनकी टीम की ओर से कराया जाता है. यह आंकड़ों पर आधारित सर्वे होता है, जिसमें पेशेवर लोग शामिल होते हैं. इसमें जीत की संभावना, जातीय समीकरण और हर सीट के लिए दो से तीन वैकल्पिक नामों का आकलन किया जाता है. इस सर्वे के नतीजे अंतिम फैसले में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं.
चौथे सर्वे में पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका होगी. इसमें आरएसएस के कार्यकर्ता जमीनी रिपोर्ट पार्टी को सौंपते हैं. प्रचारक और विस्तारक बूथ लेवल तक लोगों से मिलते हैं. उनकी राय जानते हैं और अंत में रिपोर्ट बनाते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, इन चारों सर्वे में से कम से कम दो में खराब रेटिंग पाने वाले मौजूदा विधायकों पर संकट आ सकता है. कहा जा रहा है कि ऐसा होने पर उनका टिकट कटना तय है.
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