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मायावती की 'नीली सियासत' छीनने की कोशिश में अखिलेश यादव?

इससे पहले छात्रसभा वाले लाल शर्ट या कुर्ता लाल टोपी के साथ पहनते थे. अब लाल टोपी तो बरकरार है, लेकिन शर्ट और पैंट का कलर नीला कर दिया गया है.

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अखिलेश यादव ने समाजवादी छात्रसभा के लिए नया ड्रेसकोड लागू किया है. (फोटो - India today)

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  • "[\"• अखिलेश यादव ने समाजवादी छात्रसभा के लिए नीली टी-शर्ट और नीली पैंट का नया ड्रेस कोड तय किया है, जबकि संगठन की लाल टोपी पहले की तरह जारी रहेगी और लाल शर्ट या कुर्ते का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होगा।\",\"• इससे पहले छात्रसभा के सदस्य लाल शर्ट या कुर्ता और लाल टोपी पहनते थे; सपा के अनुसार बदलाव का उद्देश्य संगठन को अलग पहचान देना तथा समाजवादी मूल्यों और बहुजन समाज के विचार को प्रदर्शित करना है।\",\"• यह बदलाव 2023 में शुरू पीडीए अभियान का विस्तार है और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित-पिछड़े मतदाताओं के बीच सपा की पकड़ मजबूत करने तथा चुनावी सफलता बनाए रखने की रणनीति से जुड़ा है।\"]"

अखिलेश यादव की स्टूडेंट पार्टी के ‘रंगरूट’ अब नीली वर्दी में दिखेंगे. सपा की छात्र ईकाई ‘समाजवादी छात्रसभा’ से अखिलेश ने कहा है कि वह अब से नीली टी-शर्ट और नीली पैंट के ड्रेस कोड का पालन करें. सपा प्रमुख ने कहा कि जब नई पीढ़ी की सोच नई हो तो उनकी वर्दी भी नई होनी चाहिए.

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इससे पहले छात्रसभा वाले लाल शर्ट या कुर्ता लाल टोपी के साथ पहनते थे. अब लाल टोपी तो बरकरार है, लेकिन शर्ट और पैंट का कलर नीला कर दिया गया है. इसका मकसद अखिलेश की अगली बात में खुलता है. उन्होंने समझाया कि नए ड्रेस कोड से छात्र संगठन को एक खास पहचान मिलेगी. पार्टी के समाजवादी मूल्यों और ‘बहुजन समाज’ का विचार भी दिखेगा.

अखिलेश ने काफी हद तक साफ कर दिया कि उनका फोकस कहां है? साल 2023 में अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (PDA) का नारा दिया था. इससे उन्होंने खुद को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों के नेता के तौर पर दिखाने की कोशिश की थी. पिछले लोकसभा चुनाव में इस नारे ने असर भी दिखाया और अखिलेश यादव की पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर यूपी में भाजपा को पछाड़ने में कामयाब रही. उसे 80 में से 37 सीटें मिलीं. छात्र इकाई की नीली वर्दी अखिलेश के इसी पीडीए अभियान का विस्तार माना जा रहा है.

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नीले रंग के सियासी मायने

नीला रंग बीएसपी के संस्थापक कांशीराम और पूर्व सीएम मायावती से जुड़ा माना जाता है. लोग इस रंग के झंडे के पीछे दलित मूवमेंट से जुड़ी सियासत देखने के आदी रहे हैं. अब इसमें अखिलेश की दिलचस्पी बढ़ी है तो यह साफ संकेत है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सपा अपनी रणनीति को अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण के दायरे से बाहर लाना चाहती है. सपा इन दिनों लगातार बहुजन वोट बैंक में पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ऐसे समय में जब मायावती की पार्टी बीएसपी अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है.

कभी यूपी की सत्ता में बहुमत से शासन करने वाली बीएसपी को 2022 के चुनाव में सिर्फ एक विधायक मिला. लोकसभा चुनाव में उसका आंकड़ा जीरो पर पहुंच गया. 2027 के यूपी चुुनाव से पहले भी पार्टी आंतरिक कलह में उलझी है. मायावती ने अपने भतीजों आकाश आनंद और ईशान आनंद को पार्टी में कोई भी पद देने से साफ इनकार कर दिया है. 

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सपा के लिए संभावना

बसपा के इस संकट को सपा अपने लिए संभावना के तौर पर देख रही है. यही वजह है कि सपा पर इन दिनों नीला रंग चढ़ने लगा है. इस रंग के ड्रेस कोड को लागू करने का अभियान समाजवादी पार्टी की बहुजन मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति में बखूबी फिट बैठता है. यह कोशिश समाजवादी पार्टी के ‘गांव-दलित संवाद’ जैसे कार्यक्रमों में भी दिखती है. 

दूसरी ओर सपा की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस ने भी दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश में अपना राज्य प्रभारी बनाया है. इससे साफ जाहिर होता है कि दोनों पार्टियां आगामी चुनाव को देखते हुए बहुजन मुद्दे को खूब बढ़ावा देने के मूड में हैं. 

इसका राजनीतिक गणित काफी सीधा है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव से संकेत मिला कि समाजवादी पार्टी और दलित वोटरों के बीच जो राजनीतिक दूरी पहले थी वह अब उतनी नहीं रह गई है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण फैजाबाद लोकसभा सीट से सपा के दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद की जीत थी. फैजाबाद सीट में अयोध्या भी आती है, जहां बन रहे राम मंदिर के नाम पर बीजेपी ने अपने चुनावी प्रचार का ताना-बाना बुना था. यहां से सपा की जीत का खास राजनीतिक महत्व था.

यही वजह है कि लोकसभा के सत्रों में भी अखिलेश यादव लगातार अवधेश प्रसाद को फुटेज देते दिखे. वह अक्सर उन्हें ऐसी जगह बैठाते, जहां कैमरों में वे साफ दिखाई दें.

अब समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोकसभा चुनाव में मिली इस सफलता को विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाले दलित-पिछड़ा गठजोड़ में कैसे बदला जाए? 

सर्वसमाज के नेता बनने की तैयारी

हालांकि, अखिलेश यादव की नजरें सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के जनाधार पर नहीं हैं. बीजेपी से मुकाबले में वह इस समय उत्तर प्रदेश में ‘सर्वसमाज के नेता’ के तौर पर प्रतिष्ठा हासिल करने की कोशिश में जुटे हैं. इसकी बानगी उनके हालिया सियासी अभियानों में देखने को मिलती है. उनकी अपील बहुजनों, पिछड़े वर्गों से लेकर ब्राह्मणों, महिलाओं और युवा मतदाताओं तक जा पहुंची है. 

PDA फॉर्मूले को और बड़ा करते हुए अखिलेश यादव ने हाल ही में लखनऊ में एक ब्राह्मण सम्मेलन में कहा कि पीडीए में ‘पी’ का मतलब पंडित भी हो सकता है. इस दौरान उनके आसपास भगवान हनुमान और सुग्रीव की वेशभूषा में लोग मौजूद थे. अखिलेश ने बीजेपी सरकार पर ब्राह्मणों की अनदेखी करने और उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाया था. यूजीसी विरोधी आंदोलन के वक्त भी अखिलेश ने बीजेपी को सवर्ण विरोधी बताते हुए हमला किया था. 

यह एक बड़ा राजनीतिक इशारा था. पिछले कई सालों से बीजेपी की अगड़ी जातियों के एक बड़े हिस्से, खासकर ब्राह्मणों के बीच मजबूत पकड़ रही है. अब अखिलेश की नजर इस पर है कि क्या इस वोट बैंक का कुछ हिस्सा बीजेपी से दूर किया जा सकता है या नहीं? वक्त भी ऐसा है कि UGC इक्विटी रेगुलेशन को लेकर बीजेपी सरकार के खिलाफ सवर्ण वर्गों के एक हिस्से में ठीक-ठाक नाराजगी दिखी है.

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बीजेपी की पिच पर खेल रहे अखिलेश

इसके अलावा अखिलेश अब लगातार मंदिरों, ज्योतिष, भगवान हनुमान और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर भी बात कर रहे हैं. राम मंदिर में चंदे से जुड़ी गड़बड़ियों को पार्टी ने आस्था पर हमले के बजाय जवाबदेही के सवाल के तौर पर पेश किया. इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से इतना महत्व देने का मतलब है कि 2027 के चुनाव से पहले सपा बीजेपी को उसके सबसे मजबूत मुद्दों में से एक पर घेरने की पुरजोर कोशिश कर रही है. इसका फायदा मिलेगा या नहीं, ये जानने के लिए चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा.

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