पौधों में जान होती है. वो बढ़ते हैं, फलते-फूलते हैं. फिर एक दिन सूखकर मर जाते हैं. विज्ञान कहता है कि पौधे हमारी छुअन को महसूस करते हैं, उन्हें दर्द होता है. लेकिन क्या वो इजहार नहीं कर पाते? जैसे इंसान करते हैं, रोकर, चीख-चिल्लाकर. कल्पना कीजिए आप एक ताजा सेब लेकर उसे छुरी से काटें और सेब दर्द से चिल्लाने लगे, या आप एक हफ़्ते के लिए घर से बाहर हों. आपकी बालकनी में रखे पौधों को पानी न मिले और जब आप लौटकर आएं तो सारे गमलों से शिकायत, नाराजगी और दर्द भरी आवाजें आ रही हों. एक रिसर्च में अब ये बात साबित हो गई है कि पौधे भी दुख, तकलीफ में रोते हैं.
मास्टर क्लास: इज़राइल के साइंटिस्ट ने बड़ी खोज कर दी है, आप सुनकर कहेंगे, ऐसा भी होता है?
पौधों में जान होती है. वो बढ़ते हैं, फलते-फूलते हैं.
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