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US ने 20 साल बाद न्यूक्लियर प्रोग्राम शुरू करने को कहा, ईरान ने टाइम चेंज किया, बस बिगड़ गई बात

US Iran Talks: ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत का इतिहास ईरान को न्यूक्लियर पावर बनने से रोकने का रहा है. कभी ईरानी न्यूक्लियर साइट्स पर हमला, कभी सैंक्शन, तो कभी डिप्लोमैटिक एग्रीमेंट्स. सारी कवायद ईरान की Nuclear Weapon बनने की हसरत को पीछे धकेलने के लिए है. लेकिन पाकिस्तान में हुई बातचीत में अमेरिका ने ईरान को इसी से जुड़ा बड़ा ऑफर दे दिया, लेकिन ईरान उसपर नहीं माना.

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'इस्लामाबाद टॉक्स' में ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर पेंच फंसा था. (File Photo: Reuters)

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी बात से कब पलट जाएं, कुछ पता नहीं चलता. पाकिस्तान में 'इस्लामाबाद टॉक्स' के दौरान कुछ ऐसा ही देखने को मिला. दो बड़े अमेरिकी अखबारों में दावा किया गया कि अमेरिका ने ईरान को न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम चलाने का ऑफर दिया, लेकिन एक शर्त के साथ. शर्त चाहे कोई भी हो, इसे ट्रंप की पलटीबाजी ही माना जा रहा है. क्योंकि यह ऑफर ट्रंप के ईरानी न्यूक्लियर प्रोग्राम को हमेशा के लिए खत्म करने के रुख से बिल्कुल उलट है.

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जो डॉनल्ड ट्रंप ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को हमेशा के लिए खत्म करने पर तुले थे, ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर बंकर बस्टर बम भी बरसाए, अब खुद उनकी सरकार बातचीत की टेबल पर ईरान को न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम चलाने का ऑफर दे रही थी. दो अमेरिकी अखबार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने अपनी रिपोर्ट्स में यह दावा किया है.

अब ‘इस्लामाबाद टॉक्स’ का वो पल सोचिए जब अमेरिका ने ईरान को न्यूक्लियर प्रोग्राम प्लेट में सजाकर दिया होगा. ऐसी हालत में ईरान क्या करता? रिपोर्ट्स में बताया गया कि ईरान ने अमेरिका का ये ऑफर रिजेक्ट कर दिया. अब ऐसा ऑफर भी रिजेक्ट हो गया, लेकिन क्यों? वजह अमेरिका और ईरान का अपनी-अपनी शर्तों पर अड़ना है.

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न्यूयॉर्क टाइम्स ने दो ईरानी अधिकारियों और एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से अपनी खबर में लिखा कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी डेलीगेशन ने ईरान को 20 साल तक अपने सभी न्यूक्लियर एक्टिविटी बंद करने का प्रोपजल दिया. अमेरिका को चिंता है कि न्यूक्लियर एनरिचमेंट तेहरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने का रास्ता देगा.

अमेरिकी प्रपोजल पर गौर करें तो ईरान को 20 साल बाद न्यूक्लियर प्रोग्राम चलाने का मौका मिल सकता था. इससे ईरान को यह दावा करने का भी मौका मिलता कि उसने न्यूक्लियर नॉनप्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) के तहत न्यूक्लियर फ्यूल बनाने का अपना अधिकार हमेशा के लिए नहीं छोड़ा है.

लेकिन ईरान ने अमेरिकी ऑफर ठुकरा दिया, क्योंकि उसने 20 साल के बजाय केवल 5 साल के लिए न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद करने की बात कही. अमेरिका ने इसे नहीं माना. दोनों देश अपनी-अपनी मांगों पर अड़ गए. इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच राजामंदी नहीं बनी और बातचीत फेल हो गई.

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द वॉल स्ट्रीट जनरल ने मामले से जुड़े लोगों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया कि अमेरिका ने पहले मांग की थी कि ईरान देश में यूरेनियम को एनरिच करने का अधिकार हमेशा के लिए छोड़ दे और इस मटीरियल के लिए विदेश से इंपोर्ट पर निर्भर रहे. 20 साल की रोक से तेहरान को सैंक्शन में राहत भी मिलती.

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ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत का इतिहास ईरान को न्यूक्लियर पावर बनने से रोकने का रहा है. कभी ईरानी न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करना, तो कभी इजरायल के साथ मिलकर साइबर हथियारों से न्यूक्लियर सेंट्रीफ्यूज को खत्म करने की कोशिश. कभी सैंक्शन, तो कभी डिप्लोमैटिक एग्रीमेंट्स. सारी कवायद ईरान की न्यूक्लियर हथियार बनने की हसरत को पीछे धकेलने के लिए है.

इसका नतीजा यह हुआ है कि ईरान को एटम बम बनाने में लगभग किसी भी दूसरे देश से ज्यादा समय लग रहा है. ऐसे देश, जिन्होंने सीरियसली न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश की है, जैसे- नॉर्थ कोरिया, इंडिया, पाकिस्तान या इजरायल. इन सभी देशों के पास अब न्यूक्लियर हथियार हैं.

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