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अमेरिका ने चीन के डर से भारत का साथ छोड़ दिया? 'Indo-Pacific' से 'Indo' गायब होने की इनसाइड स्टोरी

US Removes 'Indo' From Indo-Pacific Command: अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने अपनी 'इंडो-पैसिफिक कमान' का नाम बदल दिया है. क्या अमेरिका ने चीन के दबाव में आकर 'इंडो' शब्द हटाया है, या इसके पीछे ताइवान-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी कोई नई सैन्य रणनीति है? भारत के कूटनीतिक कद और क्वाड (Quad) पर इसका क्या असर हो सकता है.

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'इंडो-पैसिफिक' से 'इंडो' हटने का भारत पर क्या होगा असर (फोटो- AFP)

तारीख 17 जून, 2026…फ्रांस में G-7 की बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप (Donald Trump) और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की मुलाकात. और फिर इस मुलाकात में क्या बात हुई, ये बताने के लिए दोनों नेता मीडिया से मुखातिब हुए. मजाक-मजाक प्रेसिडेंट ट्रंप ने कह दिया कि “अगर मोदी के रहते किसी ने भारत पर हमला किया तो अमेरिका बीच में कूद पड़ेगा.”

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यूं तो ट्रंप की इस बात पर भरोसा किसी ने भी नहीं किया होगा. मगर अगले दिन जब न्यूज़ पेपर्स में ट्रंप का ये बयान छपा तो उसी अखबार में नीचे एक और खबर पढ़ने को मिली.  हेडलाइन थी- “अमेरिका ने अपने इंडो-पैसिफिक कमांड के नाम से इंडो शब्द हटाया.” मतलब गजब का कंट्रास्ट है गुरु. व्हाइट हाउस और पेंटागन एक ही समय एक दम 180 डिग्री वाला एंगल लेंगे, ये बात जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स को हैरान कर गई.

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के इस ऐलान के बाद सवाल उठने लगे कि US ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमानों में से एक 'इंडो-पैसिफिक कमान' (USINDOPACOM) के नाम से 'इंडो' (Indo) शब्द को हटाने का फैसला आखिर किया क्यों? क्या इसके पीछे भारत को ये बताना है कि वो अब ‘फेवरेट’ नहीं रहा या फिर चीन से संबंध सुधारने की कीमत पर ये फैसला लिया गया. 

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सवाल उठता है कि क्या अंकल सैम ने ड्रैगन के दबाव में आकर घुटने टेक दिए? क्या ट्रंप ने भारत का साथ छोड़ दिया है? अखबारों के संपादकीय पन्नों से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों और कूटनीतिक हलकों में इन दिनों यही सवाल गूंज रहा है. तो वाकई ऐसी ही कुछ वजह है या फिर कहानी कुछ और है?

तो आइये अमेरिकी रणनीति से जुड़े इस बदलाव की  इनसाइड स्टोरी को बेहद आसान भाषा में, फैक्ट्स और एक्सपर्ट्स की राय की मदद से समझने की कोशिश करते हैं.

इतिहास का पन्ना: क्यों पड़ा था 'इंडो-पैसिफिक' नाम?

वैसे तो G-7 की बैठक के आखिरी दिन देरी से पहुंचने के बाद ट्रंप खुद अपने आप को दुनिया का सरपरस्त घोषित करते हुए कह चुके हैं- ‘I am the Boss.’ और मजे की बात ये है कि दुनिया के इसी ‘स्वयंभू बॉस’ ने 2018 में अपनी 'यूएस पैसिफिक कमान' (PACOM) का नाम बदलकर ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमान’ कर दिया था. ये सिर्फ एक नाम का बदलना भर नहीं था. 

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दुनिया ने इसे सुपर पावर का एक बहुत बड़ा रणनीतिक यू-टर्न माना था. स्ट्रैटेजिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा इसे भारत-अमेरिका की नजदीकियों का तौर कहते हैं. लल्लनटॉप से फोन पर बात करते हुए रोहित ने कहा,

वो भारत को अमेरिकी नीतियों के केंद्र में लाने की कोशिश थी. उस नाम के जरिए अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर माना था कि हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता. उस कदम ने भारत को एक 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' और मुख्य खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया था.

वहीं दूसरी तरफ पूर्व डिप्लोमेट आर.पी. सिंह ट्रंप के 2018 वाले कदम को चीन की घेराबंदी के लिए उठाया गया कदम करार देते हैं. लल्लनटॉप से बात करते हुए उन्होंने कहा,

इंडो शब्द जोड़ने का सीधा मकसद था - 'क्वाड' (Quad - भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के जरिए चीन की बढ़ती दादागिरी और उसकी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (भारत को घेरने की नीति) को काटना.

अमेरिका की मजबूरी या सोची-समझी रणनीति? पेंटागन ने क्यों बदला नाम?

अब सवाल उठता है कि जब सब कुछ ठीक चल रहा था, तो फिर अचानक इस नाम को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या वाकई चीन का डर था या फिर तेजी के बदलती जियो पॉलिटिकल सिचुएशन के चलते ऐसा करना पड़ा?

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AI की मदद से तैयार ग्राफिक्स

कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस फैसले के पीछे पेंटागन की नई मिलिट्री डॉक्ट्रिन है. जिसके दो अहम पहलू हैं.

1. ताइवान और यूक्रेन वॉर के बाद का नया थिएटर

‘द जापान टाइम्स’ ने पेंटागन सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है यूक्रेन की जंग और ताइवान पर चीन के बढ़ते मंडराते खतरे के बाद अमेरिका को अपनी सेनाओं के ढांचे में बदलाव करना पड़ रहा है. पेंटागन का सारा जोर अब 'थिएटर-विशिष्ट' (Theater-specific) कमांड बनाने पर है. अमेरिका अब अपनी सभी कमांड्स को जियोग्राफिकल सीमाओं के बजाय 'मिशन-स्पेसिफिक' बना रहा है.

इस तथ्य को नौसेना के रिटायर्ड कोमोडोर अंजन झा फोकस शिफ्ट की तरह देखते हैं. लल्लनटॉप से बात करते हुए कोमोडोर झा ने कहा,

'पैसिफिक' शब्द को दोबारा प्राथमिकता देने का मतलब है कि अमेरिका का सीधा ध्यान अब ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर पर केंद्रित हो गया है. जिसका मतलब है कि मल्लका से लेकर ग्वादर तक भारत को समंदर में अपनी जंग खुद लड़नी होगी.

2. क्या चीन को शांत करने की कोशिश है?

‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक अमेरिका भले ही जाहिर तौरपर चीन के इर्दगिर्द पेट्रोलिंग जारी रखने की बात कर रहा हो. मगर अंदर ही अंदर वो जानता है कि एक साथ कई मोर्चों पर भिड़ना अक्लमंदी नहीं होगी. पहले ही मिडिल-ईस्ट और यूक्रेन फ्रंट के चलते अमेरिकी सैन्य रणनीतिकारों की नींद हराम है. ऐसे में अगर एक नाम हटा लेने से बीजिंग का ईगो शांत होता है और उस फ्रंट पर राहत मिलती है तो सौदा बुरा नहीं है. 

क्या भारत की कूटनीतिक हैसियत कम हुई?

ये एक ऐसा संवेदनशील सवाल है, जिस पर रक्षा विशेषज्ञों और डिप्लोमेट्स की राय बंटी हुई है. मगर एक बात तो तय है कि ज्यादातर एक्सपर्ट्स इसे किसी 'प्रशासनिक फेरबदल' से ज्यादा अहमियत नहीं देते.

जाने माने रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि पेंटागन के "इंडो" शब्द को हटाने और U.S. नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी (NSS) में भारत का ज़िक्र न के बराबर होने से, वाशिंगटन में भारत की अहमियत को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. अपने एक्स पोस्ट में ब्रह्मा चेलानी आगे लिखते हैं,

दोनों देशों के रिश्ते अब साझा रणनीतिक सोच के बजाय व्यावहारिक लेन-देन पर ज़्यादा आधारित होते जा रहे हैं, क्योंकि ट्रंप चीन के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं और उपमहाद्वीप में किसी एक ताकत के दबदबे को रोकने के लिए पाकिस्तान की अहमियत को फिर से समझ रहे हैं.

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वहीं, वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक ‘द नेशनल ब्यूरो ऑफ एशियन रिसर्च’ के सीनियर फेलो डॉ. एशले जे. टेलिस के मुताबिक ऐसा एक ना एक दिन तो होना ही था. अपनी बात को समझाते हुए कहते हैं,

अमेरिका इस गलतफहमी में न रहे कि चीन को रोकने के लिए भारत आंख मूंदकर उसका साथ देगा. भारत हमेशा सबसे पहले अपने फायदे और अपनी आजादी (स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी) को आगे रखेगा. 'इंडो' शब्द को हटाना साफ दिखाता है कि अमेरिका और भारत के बीच कोई लिखित या औपचारिक समझौता नहीं है.

भारत पर असर, क्या Quad और मालाबार पर आएगी आंच?

अब सवाल ये उठता है कि इस पूरे मामले पर भारत क्या सोचता है? तो इसका जवाब है कि भारत फिलहाल कुछ नहीं सोच रहा. रक्षा मंत्रालय सूत्रों ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा कि नई दिल्ली इस नाम के बदलाव को बेहद शांत तरीके और शांत भाव के साथ देख रहा है. जानकारों की मानें तो भारत के इस इत्मीनान के पीछे दो सॉलिड वजहें हैं.

मालाबार एक्सरसाइज और क्वाड: नाम बदले जाने के बाद भी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाला ‘मालाबार नौसैनिक अभ्यास’ जारी रहेगा. साथ ही साथ पहले ही तरह ही 'क्वाड' संगठन भी पूरी तरह सक्रिय रहेगा. क्योंकि ये दोनों कवायद किसी कमान के नाम पर नहीं, बल्कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और 'फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक' के विजन पर टिके हैं.

टू-प्लस-टू (2+2) डायलॉग: भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच होने वाली बातचीत में रक्षा सहयोग को और बढ़ाने पर सहमति बनी हुई है. जिसमें जेट इंजन की तकनीक ट्रांसफर (GE F414 इंजन सौदा) और प्रीडेटर ड्रोन की डील भी शामिल है.

लिहाजा ये कहना कि अमेरिका ने भारत का साथ छोड़ दिया, पूरी तरह गलत और सतही विश्लेषण होगा. ये सिर्फ कागजी और रणनीतिक पुनर्गठन (Strategic Restructuring) की एक कवायद भर है.

बीजिंग का रिएक्शन: क्या चीन इसे अपनी जीत मान रहा है?

चीन सरकार का तो पता नहीं मगर वहां के सरकारी भोंपू कहे जाने वाले ‘ग्लोबल टाइम्स’ इस खबर पर कुछ ज्यादा ही खुश है. खुश होने की वजह भी है. चीन हमेशा से 'इंडो-पैसिफिक' शब्द का विरोध करता आया है. उसका मानना था कि ये शब्द चीन को घेरने के लिए अमेरिका और भारत का एक 'गुटबाजी वाला हथकंडा' है.

चीनी विदेश मंत्रालय के थिंक टैंक 'CIIS' के मुताबिक,

अमेरिका को आखिरकार समझ आ गया है कि एशिया-पैसिफिक में स्थिरता किसी बाहरी ताकत को थोपने से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन से आएगी. 'इंडो' शब्द को हटाना इस बात का सबूत है कि वाशिंगटन की भारत को मोहरा बनाने की नीति पूरी तरह सफल नहीं रही.

वैसे चीनी मीडिया का ये दावा जमीनी हकीकत से कोसों दूर है. चीन इसे अपनी डिप्लोमेटिक जीत की तरह पेश जरूर कर रहा है, लेकिन वो भी जानता है कि साउथ चाइन सी में यूएस नेवी की मौजूदगी रत्ती भर भी कम नहीं हुई है.

अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो ब्लैक एंड व्हाइट में नतीजा निकालने की कोशिश जल्दीबाजी होगी. यकीनन यूएस मिलिट्री कमांड के नाम से 'इंडो' शब्द का हटना एक बड़ी न्यूज़ हेडलाइन है. मगर इसे भारत-अमेरिका रिश्तों के अंत की शुरुआत के तौरपर देखना सही नहीं होगा. बल्कि इसे अमेरिका का अपनी प्राथमिकताओं को री-सेट करने की कवायद की तरह देखना चाहिए. एक ऐसा री-सेट जहां वो भारत को अपने ऊपर निर्भर देश की तरह नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र की एक शक्ति की तरह देखता है.

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