पांच राज्यों यूपी, पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में चुनावों की तैयारी हो चुकी है. ये राज्य 4 फरवरी से 8 मार्च के बीच चुनावों से घिरे रहेंगे. धूल उड़ने लगी है. नेता भाग-दौड़ मचाना शुरू कर चुके हैं. नेताओं के आपसी झगड़े, चुनावी चालें सुर्ख़ियों में हैं. जाति, धर्म की गोटियां सेट की जा रही हैं. इन आधारों पर उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की जा रही है. इस बार 16 करोड़ वोटर इन चुनावों में हिस्सा लेंगे.
पर पंजाब में ट्रांसजेंडरों को लेकर अबकी थोड़ा माहौल बदला है. 2012 में पंजाब चुनावों में महज पांच ट्रांसजेंडरों ने वोट डाले थे. लेकिन इस बार 380 ट्रांसजेंडरों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल किए गए हैं. यानी पिछली बार से 76 गुना ज्यादा. असल बात ये है कि चुनाव आयोग उन्हें महत्त्व दे रहा है, जिसकी वजह से उन्होंने वोटर लिस्ट में जगह बनाई है. 2011 की जनगणना में बताया गया था कि रूरल इंडिया में लगभग 70,000 ट्रांसजेंडर हैं, जिनमें सबसे ज्यादा लगभग 13,000 उत्तर प्रदेश में हैं. इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर है जहां 10,000 ट्रांसजेंडर हैं. उत्तर प्रदेश चुनावों के लिहाज से सबसे जटिल है. यहां के चुनाव में भी ट्रांसजेंडर बढ़ चढ़कर हिस्सा ले सकते हैं. ऐसा नहीं कि ट्रांसजेंडर सिर्फ वोटर ही रहे हैं. उन्होंने चुनाव भी लड़ा है. गोरखपुर से आशा देवी ने मेयर का चुनाव लड़ा था और जीता भी था. पायल नाम की एक दूसरी ट्रांसजेंडर ने लखनऊ में बीजेपी के लालजी टंडन के खिलाफ चुनाव लड़ा था. वो जीत तो नहीं सकीं लेकिन उन्हें काफी सपोर्ट मिला था. चुनाव के मामलों पर बोलते हुए एक ट्रांसजेंडर सीमा कहती हैं कि कोर्ट के निर्देशों के बावजूद हम लोगों को इग्नोर किया जाता है. हमें आधार कार्ड, वोटर कार्ड से लेकर पैन और राशन कार्ड तक बनवाने में दिक्कतें होती हैं. ट्रांसजेंडर भी इसी सोसायटी का हिस्सा हैं. उन्हें देश की व्यवस्था में शामिल होने का पूरा हक़ है और फिर तो हमारे देश में चुनाव त्योहार माने जाते हैं. लगभग हर साल कहीं न कहीं मनाए जाने वाले इन त्योहारों से देश के एक बड़े हिस्से को इग्नोर करना वैसे भी ठीक नहीं हैं. अब वो खुद आगे आ रहे हैं और चुनाव आयोग भी उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल कर रहा है. इससे उनमें भरोसा बढ़ेगा कि वो देश के मेनस्ट्रीम से अलग नहीं हैं. ये स्टोरी निशांत ने की है.














