पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक दावत होती है, जिसे 'चूल्हानोद' दावत कहते हैं. मतलब पूरा खानदान दावत खाने जाए और घर पर चूल्हा न जले. हिंदी वाले इसे सपरिवार भोज भी कह सकते हैं. उत्तराखंड में चुनावों में इस बार नेताओं के लिए यही 'चूल्हानोद' दावत हुई है.ट्विटर पर #हरीशरावतफिरसे ट्रेंड कर रहा है, जबकि सूबे के मुख्यमंत्री के लिए 'हरीश रावत सपरिवार' जैसा कुछ ट्रेंड करता, तो बेहतर होता.
खबरों के मुताबिक इस बार चुनाव में रावत के दोनों लड़के वीरेंद्र और आनंद रावत कुमाउं से, बेटी अनुपमा और पत्नी रेनुका रावत हरिद्वार जिले से विधानसभा में अपनी किस्मत आज़माएंगे. खुद हरीश रावत दो जगह से चुनाव लड़ेंगे. इसके साथ-साथ उनके रिश्तेदार करन मेहरा और राज्यसभा से सांसद महेंद्र सिंह मेहरा भी पार्टी से विधानसभा का टिकट लेंगे. रावत के रिश्तेदारों की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती. हरीश रावत के खास माने जाने वाले तमाम लोग भी टिकट का भवसागर पार कर गए हैं. स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल, सुल्त सिंह रावत, ललित फार्सवान, हरीश धामी और अलमोड़ा से मनोज तिवारी भी हरीश के वो सबसे खास नाम हैं, जिन्हें इस बार टिकट मिलना तय माना जा रहा है. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के इस घरेलू वितरण में हरीश रावत ही अकेले घर के मुखिया हों. राज्य की वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश और सिंचाई मंत्री यशपाल आर्या भी अपने-अपने युवराजों के लिए टिकट का दावा ठोंक चुके हैं. सुबह-सुबह खबर आई कि वो अब सपरिवार भाजपा में जा रहे हैं.
कांग्रेस के जगजाहिर वंशवाद को कोसने से पहले भाजपाई जन अपनी पार्टी के हाल भी जान लें. अलग चाल, चरित्र और चेहरे का दावा करने वाली पार्टी में भी सपरिवार टिकट वितरण का फैशन कम नहीं है. भुवन चंद्र खंडूरी की बेटी रितु भूषण कर्ण प्रयाग से दावेदार हैं. विजय बहुगुणा अपने घर के दो अनमोल रत्नों साकेत और सौरव के लिए सितारगंज से टिकट मांग चुके हैं. प्रवचनकर्ता सतपाल महाराज अपने लिए चौबटखल से और अपनी पूर्व वन मंत्री पत्नी अमृता रावत के लिए रामनगर से टिकट का दावा ठोंक चुके हैं.
टिकट के इन घरेलू दावेदारों में से कितने लोग अगली सरकार में पहुंचेंगे ये तो वक्त बताएगा. मगर फिलहाल तो नहीं लगता कि 15 साल में 8 मुख्यमंत्री देने वाले इस राज्य की सियासी दशा आने वाले समय में कुछ बदलेगी.
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