सुप्रीम कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी को वापस से कैडर आवंटित करने का आदेश जारी किया है. ये आदेश एक ऐसे कर्मचारी के लिए आया है, जो लगभग तीन दशकों से अपनी पोस्टिंग के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हें. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह व्यक्ति अपने दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए मौजूद नहीं रह पाया. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर याचिकाकर्ता अपने परिवार के करीब होते, तो अपने दिव्यांग बेटे की परवरिश में ज्यादा मदद कर सकते हैं. हालांकि, वह साल 2011 से ही परिवार से दूर रह रहे हैं.
विकलांग बेटे के लिए कैडर मांगा, सुप्रीम कोर्ट से आखिरकार कर्मचारी की बात मानी, यूपी सरकार को हर्जाना देने का आदेश
दिव्यांग बेटे के लिए मनचाहे कैडर की मांग करने वाले अधिकारी को राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने 3 दशक लंबी चली कानूनी लड़ाई में एक सरकारी कर्मचारी का कैडर फिर से आवंटित करने का आदेश दिया है.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्मचारी ने सर्विस की शुरुआत में ही अपनी पोस्टिंग के लिए पहाड़ी क्षेत्र को प्राथमिकता दी थी. याचिकाकर्ता ने मानसिक रूप से दिव्यांग बेटे की देखभाल के आधार पर पहाड़ी इलाके में नियुक्ति की मांग की थी. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की डिवीज़न बेंच ने इस मामले में फैसला दिया. याचिकाकर्ता 1997 में ही नियुक्ति के लिए योग्य थे, लेकिन इसके बावजूद नियुक्ति 2011 में हुई थी. कोर्ट ने कहा,
यह किसी भी तरह से, किसी भी रूप में, राज्य की ओर से दिखाई गई उदासीनता के अलावा और कुछ नहीं है. अगर इस मुद्दे को आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए, तो यह बात और भी साफ हो जाती है. याचिकाकर्ता की नियुक्ति जून 1997 से प्रभावी मानी गई थी और आज हम अप्रैल 2026 में हैं. अब जाकर उन्हें वह चीज मिलेगी, जिसे उन्होंने शुरू से ही चुना था.
याचिकाकर्ता ने साल 1995 में कंबाइंड लोवर सबऑर्डिनेट एग्जामिनेशन का पेपर क्लियर किया था. पेपर में अच्छा स्कोर करने के साथ-साथ उन्होंने 'हिल रीजन' यानी पहाड़ी क्षेत्र में पोस्टिंग का ऑप्शन चुना था. हालांकि शुरुआत में उसकी उसकी नियुक्ति नहीं हो सकी थी. इससे परेशान होकर व्यक्ति ने 1997 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया. कोर्ट ने 2004 में उसकी याचिका स्वीकार कर ली. कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता एक दूर-दराज के इलाके के रहने वाले हैं. इसलिए कोर्ट ने तय किया कि इस मामले में ‘बहुत टेक्निकल’ होने की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने अपने फैसले में वेतन और एरियर के अलावा नौकरी से जुड़े सभी लाभ देने का निर्देश दिया था.
उत्तर प्रदेश की सरकार ने इसके खिलाफ अपील दाखिल की, लेकिन 2009 में उसे खारिज कर दिया गया. आखिरकार याचिकाकर्ता को निदेशक (बेसिक), उत्तर प्रदेश ने 'उप-उप निरीक्षक' (Sub Deputy Inspector) के पद पर नियुक्त किया. इस नियुक्ति की प्रभावी तारीख 11 जून, 1997 मानी गई. याचिकाकर्ता ने जुलाई 2011 में पद संभाला. इसके बाद मई, जुलाई और अक्टूबर 2012 में अधिकारियों के सामने अपनी रिक्वेस्ट रखी. उन्होंने अपनी पुरानी मांग के मुताबिक ‘हिल कैडर’ (Hill Cadre) आवंटित किए जाने की अपील दाखिल की थी. इस अपील में हिल कैडर के लिए तर्क दिया गया कि वह घर के पास रहने पर अपने दिव्यांग बेटे की देखभाल कर सकेंगे. अपील में यह भी कहा गया था कि बेटे के ठीक होने की गुंजाइश लगभग न के बराबर है. इसके बावजूद भी हिल कैडर नहीं दिया गया.
हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद भटकना पड़ा: Supreme Courtसुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि 2004 में जब हाई कोर्ट ने उसकी नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया, तभी नियुक्ति मिल जानी चाहिए थी. राज्य सरकार की याचिका 2009 में खारिज कर दी गई थी, फिर भी औपचारिक नियुक्ति 2011 में ही हुई. 2011 से उन्हें अपने होम स्टेट में पोस्टिंग की जरूरत पूरी करवाने के लिए दर-दर भटकना पड़ा है. कोर्ट ने कहा कि भले ही हम शुरुआती कुछ साल हटा दें. हाई कोर्ट ने पहली याचिका में उनकी नियुक्ति की पुष्ट कर दी थी जो फरवरी 2004 में हुई थी. तब से भी देखें तो 22 साल बीत चुके हैं. कोर्ट ने कहा कि हम याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश देते हैं, जिसका भुगतान उत्तर प्रदेश सरकार को करना होगा.
कोर्ट ने कहा कि यह सोचना मुश्किल है कि ऐसे और भी कई मामले होंगे. सर्विस से जुड़े विवाद के कारण कई मामले लंबे समय तक पेंडिंग रह जाते हैं. कई बार तो संबंधित पक्ष रिटायरमेंट की उम्र के करीब पहुंच जाता है. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में भी ऐसा हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई कोर्ट के माननीय जजों से भी एक अपील की है. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लंबे समय से पेंडिंग मामलों की संख्या का पता लगाने और जल्द से जल्द उनका निपटारा करवाने की अपील की. कोर्ट ने कहा कि अधिक मामले होने पर उन्हें अलग-अलग बेंचों को बांटकर सुनवाई कराई जा सकती है.
ट्रांसफर और Cadre Change में अंतरइस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रांसफर’ और ‘कैडर’ बदलाव पर हाई कोर्ट से असहमति जताई. कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर और कैडर बदलाव को किसी हाल में एक जैसा नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा,
ट्रांसफर का मतलब है कि किसी कर्मचारी की पोस्टिंग की जगह उसी कैडर या सर्विस के अंदर बदल दी जाती है. लेकिन व्यक्ति उसी सर्विस स्ट्रक्चर का हिस्सा बना रहता है, उसी नियमों से चलता है और उसकी सीनियरिटी पर कोई असर नहीं पड़ता. यह सर्विस का ही एक हिस्सा है, जिसे प्रशासन अक्सर काम-काज, प्रशासन या जनहित को ध्यान में रखते हुए करता है.
कोर्ट ने आगे कहा कि असल अंतर ये है कि ट्रांसफर में सिर्फ जगह या काम बदलता है, उस सर्विस की पहचान नहीं बदलती जिससे कर्मचारी जुड़ा हुआ है. इसके उलट, कैडर में बदलाव का मतलब है एक कैडर से दूसरे कैडर में जाना. इसलिए, यह उस पूरे ढांचे को ही बदल देता है जिसके तहत कर्मचारी की सर्विस चलती है.
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