मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
शिरीष कुंदेर ने 2012 में अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा को लेकर 'जोकर' डायरेक्ट की थी. इस फिल्म में बहुत जोक थे लेकिन ज्यादातर पल्ले नहीं पड़े. शिरीष के साथ ये विडंबना रही है कि अब तक उनके व्यंग्य फिल्मों में चल नहीं पाए हैं. लेकिन ठीक उलट ट्विटर पर वे स्टार हैं और आज तक एक भी ट्वीट उनका ऐसा नहीं रहा है जो फ्लॉप गया हो. सोमवार को भोपाल एनकाउंटर वाले पूरे घटनाक्रम के दौरान भी वे एक के बाद एक स्ट्रोक लगा रहे थे. इतना कि #BhopalFakeEncounter हैशटैग वाले ट्रेंड में उनका ट्वीट सबसे ज्यादा असरदार घोषित किया गया. उन्होंने लिखा था, "
भोपाल फेक एनकाउंटर की स्क्रिप्ट बहुत बढ़िया थी. लेकिन एक्टर बहुत बुरे थे."

उनका हर एक ट्वीट चुटीला था. जो बात उन्होंने कल मजाक में कह दी थी आज उसी पर चर्चा हो रही है. शिरीष ने लिखा था:
"पहला पुलिसवाला कहता है, हथियार ढूंढो!
दूसरा पुलिसवाला तुरंत बिना तलाशी लिए एक ही प्रयास में सीधे वहां हाथ डालता है जहां हथियार होता है.
मध्य प्रदेश पुलिस की एक्स-रे जैसी दृष्टि पर गर्व है."
"सबूतों को नंगे हाथों से हैंडल किया जाता है इसकी चिंता बगैर कि अंगुलियों के निशान पड़ जाएंगे क्योंकि उन्हें (पुलिस) पता था कि इन्हें प्लास्टिक में तो वैसे भी लपेटा ही जाएगा.
मध्य प्रदेश पुलिस की दूरदृष्टि पर गर्व है. "
"चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ठाकुर ने जजों की संख्या में कमी की शिकायत की थी.
मध्य प्रदेश पुलिस ने तुरंत 8 पेंडिंग केस निपटा दिए.
मध्य प्रदेश पुलिस की पहल पर गर्व है."
"सिमी ग्रेवाल, बधाइयां! आप ट्विटर पर नंबर 1 ट्रेंड कर रही हैं #SIMI" 
फिर उन्होंने टि्वटर का ट्रेंड छोड़कर राजनीति के ट्रेंड पर लिखा:
ये ट्रेंड है:
पहले, एक फेक एनकाउंटर होता है.
फिर, आप प्रधान मंत्री बन जाते हो.
बधाई हो, शिवराज सिंह #भोपाल एनकाउंटर. 
उनकी ये टिप्पणी नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह पर थी. मोदी गुजरात के सीएम थे तब फेक एनकाउंटर के मामले चर्चित रहे थे. उसके बाद से पीएम बन गए. अब चौहान के राज्य में ये मामला हुआ है और ऐसी टिप्पणियां हो रही हैं कि वे भी पीएम कैंडिडेट हो गए हैं. शिरीष के अलावा और भी बहुत से लोगों ने बहुत वाजिब टिप्पणियां की हैं. जैसे इंडिया टुडे के राहुल कंवल ने इस और ध्यान दिलाया कि
कुछ चैनलों के पास फेक एनकाउंटर का वीडियो इंडिया टुडे से भी पहले से था लेकिन उन लोगों ने इसे चलाया नहीं क्योंकि उनके मुताबिक ऐसा करना 'एंटी-नेशनल' होगा. 
उन्होंने ये भी लिखा:
"फेक एनकाउंटर को सामने लाना एंटी-नेशनल नहीं होता. जब आपको दिख रहा है कि एक एनकाउंटर फर्जी है और आप उस पर चुप हैं तो ये सच में देश विरोधी होना होता है." 
अपने अन्य ट्वीट्स भी किए:
"वीडियो में पुलिसवाला पूछता है कि हथियार कहां है, और वाह वाह! उसका साथी तुरंत एक एकदम नया चाकू, वो भी प्लास्टिक कवर में लिपटा हुआ, निकालकर दिखा देता है. नौसिखिए! जाहिर है ये फेक था."
"वीडियो में कैदी अपने हाथ उठाते हैं, रेडियो पर पुलिसवाला कहता है, लगता है वो सरेंडर करना चाहते हैं. लेकिन कुद्ध पुलिसवाले उन्हें फिर कैद में लेने के बिलकुल मूड में नहीं थे."
"बीजेपी प्रवक्ता फेक एनकाउंटर को सर्जिकल स्ट्राइक्स से जोड़कर बड़ी गलती कर रहे हैं. एक सफल सैन्य ऑपरेशन की तुलना एक बिगड़े ऑपरेशन से नहीं कर सकते." 
सुप्रीम कोर्ट के जज रहे मार्कंडेय काटजू ने फेसबुक पर लिखा:
"जितना मैं समझ पा रहा हूं, भोपाल में ये तथाकथित एनकाउंटर फर्जी था और इसके लिए जिम्मेदार सभी लोगों को मौत की सजा होनी चाहिए. न सिर्फ इस घटना को अंजाम देने वाले लोगों को बल्कि उन्हें भी जिन्होंने ऐसा करने के आदेश दिए जिसमें राजेनता और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं. उन्हें डेथ सेंटेंस ही देना चाहिए. प्रकाश कदम वर्सेज रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट की मेरी बेंच ने ऐसा फैसला सुनाया था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद न्यूरेमबर्ग ट्रायल्स में नाजी युद्ध अपराधियों ने याचिका की कि उन्हें आदेश मिले थे और पालन करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था. लेकिन ये विनती खारिज कर दी गई और उनमें से ज्यादातर को फांसी चढ़ा देने के आदेश दिए गए. इसलिए मजे मजे में ट्रिगर दबा देने वाले वो पुलिसकर्मी जो समझते हैं कि वे न्याय व्यवस्था के इतर जाकर हत्याएं कर सकते हैं और बच निकल सकते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि फांसी का फंदा उनका इंतजार कर रहा है." 
उन्होंने ये भी लिखा:
"आप में से कुछ लोगों ने कहा है कि 'आतंकवादियों' के लिए कोई अदालती सुनवाई नहीं होनी चाहिए और उन्हें बस यूं ही मार देना चाहिए. कृपया शांति से सोचो कि ये नजरिया कितना खतरनाक है. अगर कोई आदमी अपने किसी विरोधी या दुश्मन को मरवाना चाहता है तो उसे बस ये करना है कि पुलिस वालों को कुछ पैसा देना है (ये अच्छे से ज्ञात है कि पुलिस का एक बड़ा तबका भ्रष्ट हो चुका है) और अपने विरोधी या शत्रु को 'आतंकी' घोषित करवा देना है और मरवा देना है. इसके बाद क्या कोई भी सुरक्षित रह पाएगा? सिमी ये कथित सदस्य अपराधी नहीं थे, उन पर केस चल रहे थे. ये बहुत संभव है कि अदालत ये पाती कि इनमें से कुछ सिमी के सदस्य हैं ही नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने श्री इंद्र दास बनाम स्टेट ऑफ असम मामले में ये कहा था कि सिर्फ एक बैन लगी संस्था का सदस्य हो जाने से कोई अपराधी नहीं मान लिया जाएगा, जब तक उसने किसी हिंसा में हिस्सा नहीं लिया, या हिंसा आयोजित नहीं की या हिंसा भड़काई नहीं है वो अपराधी नहीं है." 