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SRFTI में चल रहे स्टूडेंट प्रोटेस्ट की सच्चाई ये है

छात्रों का मानना है कि उनके गुस्से की असल वजह सामने नहीं आ रही है.

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SRFTI के छात्र अपनी मांगों को लेकर एडमिन ब्लॉक के बाहर धरना दे रहे हैं
कोलकाता में एक कॉलेज है. सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट (SRFTI). वहां पिच्चर बनाने का कोर्स सिखाया जाता है लेकिन पिछले कुछ दिनों से SRFTI खुद पिच्चर बना हुआ है. यहां पढ़ने वाली 14 लड़कियों को निकाल दिया गया है जिसके बाद सारे छात्र धरने पर हैं. मंगलवार (17 अक्टूबर, 2017) से छात्र क्लास में नहीं गए हैं और एडमिन ब्लॉक को घेरे हुए हैं. कॉलेज के अधिकारी अपने बंद दफ्तरों को ताक रहे हैं.
SRFTI में पढ़ने वालों के लिए दो विंग वाला एक हॉस्टल था. इसके अलग-अलग हिस्सों में लड़के और लड़कियां रहते थे. कॉलेज प्रशासन का मानना है कि लड़कियां 'सुरक्षित' रहें इसलिए उन्हें एक दूसरे हॉस्टल में शिफ्ट कर दिया जाए. छात्रों का मानना है कि इस बहाने SRFTI प्रशासन एक प्रोग्रेसिव संस्थान को समय से पीछे ले जा रहा है. इसलिए छात्र चाहते हैं कि SRFTI में पिछले 20 साल से चले आ रहे हॉस्टल के नियम न बदले जाएं.
छात्रों का आरोप है कि SRFTI की डायरेक्टर डॉ देबमित्र मित्रा उनसे बात नहीं कर रहीं
छात्रों का आरोप है कि SRFTI की डायरेक्टर डॉ देबमित्र मित्रा (दाएं) उनसे बात नहीं कर रहीं

छात्र और प्रशासन दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं. 17 अक्टूबर से इस मामले को देश भर के मीडिया ने रिपोर्ट करना शुरू किया लेकिन इसके बाद से छात्रों की नाराज़गी बढ़ी ही है. उनका कहना है कि उनके आंदोलन को गलत तरह से रिपोर्ट किया जा रहा है. असल माजरा जानने के लिए 'दी लल्लनटॉप' ने SRFTI के छात्रों से बात की.
हमने फोन मिलाया SRFTI के तेरहवीं बैच के अक्षय गौरी को. अक्षय SRFTI स्टू़डेंट यूनियन के प्रेसिडेंट हैं. इस हैसियत से वो SRFTI की एकेडमिक काउंसिल की बैठकों में हिस्सा लेते रहते हैं. अक्षय ने अपनी बात की शुरुआत में ही कहा कि उनके आंदोलन की वजह न 14 लड़कियों का निकाला जाना है न हॉस्टल का अलग किया जाना. वो बस आंदोलन शुरू होने की तात्कालिक वजह भर है. अक्षय कहते हैं कि उनका आंदोलन एक लंबे समय से SRFTI प्रशासन के छात्रों के प्रति खराब हो रहे बर्ताव के खिलाफ है. वो कहते हैं,
SRFTI में लगातार एकेडमिक प्रोजेक्ट्स के लिए बजट में कमी की जा रही है. कई प्रोजेक्ट खत्म किए जा रहे हैं. ऐसी ही कई सारी शिकायतों को लेकर हम समय-समय पर प्रशासन से बात करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन वो बात करने से ही इनकार कर देते हैं. हम लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल किए जाने के खिलाफ हैं लेकिन वो हमारी मांगों में से एक भर है.
SRFI में दो दशक से लड़कों और लड़कियों के लिए एक ही हॉस्टल था
SRFI में दो दशक से लड़कों और लड़कियों के लिए एक ही हॉस्टल था

चूंकि मामले ने तूल हॉस्टल अलग किए जाने और फिर 14 लड़कियों को कॉलेज से निकाले जाने के बाद पकड़ा तो हमने SRFTI के छात्रों से ये जाना कि बात यहां तक पहुंची कैसे. पूरा मामला ऐसे समझें-
# SRFTI के बनने के बाद से ही यहां लड़के-लड़की सबके लिए एक हॉस्टल था, जिसमें दो विंग थे. ये व्यवस्था 20 साल से जस की तस रही.
# 2015 में एक नया हॉस्टल बनाया गया, जिसमें तेरहवीं बैच के छात्र शिफ्ट हुए. यहां भी लड़के-लड़कियां एक ही हॉस्टल में रहे.
# जून 2017 में कॉलेज के एकेडमिक काउंसिल की मीटिंग में छात्रों को पहली बार बताया गया कि हॉस्टल अलग किए जाएंगे. नए हॉस्टल में लड़कियां रहेंगी. पुराने में लड़के.
14 लड़कियों को इस नोटिस के ज़रिए कॉलेज से निकाला गया
14 लड़कियों को इस नोटिस के ज़रिए कॉलेज से निकाला गया

# छात्रों ने इसका विरोध किया तो कॉलेज के एकेडमिक काउंसिल ने ये कहकर बात करने से इनकार कर दिया कि ये फैसला गवर्निंग काउंसिल का है जिसमें छात्र दखल नहीं दे सकते.
# SRFTI ने इन लड़कियों को हॉस्टल खाली करने के नोटिस भेजे. जब-जब इस नोटिस का लिखित जवाब देने की कोशिश की गई, कॉलेज प्रशासन ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया.
# कुछ नोटिस देने के बाद SRFTI ने पुराने हॉस्टल में रह रही 14 लड़कियों को कॉलेज से निकाल दिया.
धरने के चलते 17 अक्टूबर को कॉलेज के अधिकारी अपने दफ्तर नहीं जा पाए
धरने  की वजह से 17 अक्टूबर को कॉलेज के अधिकारी अपने दफ्तर नहीं जा पाए.

हमने कॉलेज से निकाली गईं 14 लड़कियों में से एक से बात की. उन्होंने दी लल्लनटॉप को बताया,
हमें जब से इस नए नियम के बारे में मालूम चला है, हम कॉलेज से इसकी वजह पूछ रहे हैं, लेकिन हमें दो लफ्ज़ों से ऊपर जवाब नहीं मिलता - विमेंन्स सेफ्टी (महिला सुरक्षा). हम पूछते हैं कि हॉस्टल अलग करने से लड़कियां कैसे सुरक्षित हो जाएंगी? आज कहा जा रहा है लड़कों के साथ हॉस्टल में मत रहो, कल कहेंगे प्रोजेक्ट भी मत बनाओ, स्क्रीनिंग भी अलग-अलग करो.
फिल्म मेकिंग में अलग-अलग डिपार्टमेंट्स के छात्रों को साथ काम करना ही पड़ता है. सभी लड़के या लड़की हों ये असंभव है. मिसाल के लिए एक प्रोजेक्ट का पोस्टप्रोडक्शन हफ्तों तक दिन-रात चल सकता है. इसलिए जेंडर के आधार पर हॉस्टल बांटना एक दकियानूसी फैसला होने के साथ-साथ हमारे काम को मुश्किल भी बनाने वाला है.
सबसे बुरी बात ये कि कॉलेज ने जब भी हमसे बात की, धमकी की भाषा में की. आखिरी नोटिस में यहां तक लिखा था कि नोटिस पाने वाली लड़कियां किसी तरह की 'बाहरी' मदद न लें (राजनैतिक प्रभाव वगैरह). वर्ना उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
कॉलेज से निकाली गई छात्राओं को ये लेटर लिख कर बाहरी मदद लेने के खिलाफ आगाह किया गया था
कॉलेज से निकाली गई छात्राओं को ये लेटर लिखकर बाहरी मदद लेने के खिलाफ आगाह किया गया था

आंदोलन की असल वजहें ये हैं
जितने छात्रों से दी लल्लनटॉप ने बात की, सभी ने ज़ोर देकर कहा कि हॉस्टल अलग किया जाना और लड़कियों को निकाला जाना आंदोलन की तात्कालिक वजह है. असल वजह कुछ और है. ये बात SRFTI के छात्रों की निकाली प्रेस रिलीज़ में साफ होती है. SRFTI Out Loud नाम के फेसबुक पेज पर इस रिलीज़ को देखा जा सकता है. इसमें छात्रों की और मांगें हैं-
# कैंपस में हॉस्टल बदतर स्थिति में हैं. इनमें साफ पानी से लेकर टॉयलेट तक की समस्या है. इसे सुधारा जाए.
# कॉलेज में अटेंडेंस शॉर्ट होने पर फाइन करने का नियम खत्म किया जाए. इससे अटेंडेंस खरीदने का चलन चल पड़ेगा.
SRFTI के हॉस्टल्स का हाल
SRFTI के हॉस्टल्स का हाल.

# हर बैच के आने के साथ फीस बढ़ाई जा रही है लेकिन फंड की कमी बताकर प्लेबैक और शॉर्ट फिक्शन जैसे कई ज़रूरी प्रोजेक्ट या तो बंद किए जा रहे हैं या बदले जा रहे हैं. ये प्रोजेक्ट छात्रों के लिए बहुत ज़रूरी हैं और इन्हें दोबारा शुरू किया जाए.
# फिल्म इंडस्ट्री के प्रोफेशनल्स और स्टूडियो से टाइअप दोबारा शुरू किया जाए. कॉलेज की ठप पड़ चुकी प्लेसमेंट सेल को दोबारा शुरू किया जाए.
# टीवी का कोर्स बिना किसी खास तैयारी के शुरू कर दिया गया है जिसके बाद से कॉलेज के संसाधनों पर दबाव है. टीवी के कोर्स के लिए अलग से व्यवस्था की जाए.
# कॉलेज में फैकल्टी की कमी को दूर किया जाए.
# छात्रों के प्रोजेक्ट्स में बाहर से आकर काम करने वाले आर्टिस्ट्स को हॉस्टल तक आने की छूट दी जाए.
SRFTI के मेन गेट पर धरने पर बैठे छात्र
SRFTI के मेन गेट पर धरने पर बैठे छात्र

SRFTI स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष अक्षय गौरी कहते हैं कि एक छात्र जानबूझ कर कॉलेज के नियमों के खिलाफ नहीं जा रहे. नियमों का पालन ही मुद्दा है तो फिर सभी नियमों का पालन होना चाहिए. हॉस्टल बदलने के नियम के साथ ही फैकल्टी के रिव्यू का नियम भी बना था. छात्रों के रिव्यू के आधार पर फैकल्टी पर कार्रवाई का प्रावधान लाया गया था लेकिन ये अब तक लागू नहीं हुआ है. कॉलेज प्रशासन अपनी मर्ज़ी से 'पिक एंड चूज़' की पॉलिसी पर नहीं चल सकता.
दी लल्लनटॉप ने इस मामले में प्रशासन का पक्ष जानने के लिए SRFTI की वेबसाइट पर मौजूद नंबरों पर बात करने की कोशिश की लेकिन कॉलेज की डायरेक्टर (इंचार्ज) डॉ देबमित्र मित्रा और डीन अशोक विश्वनाथन ने फोन नहीं उठाया. SRFTI में बीते एक साल से डायरेक्टर का पद खाली है.


सुनें कविता- 'जब शहर के चौक पर नाख़ुश छात्र होंगे तो आख़िर में टैंक तो आएंगे ही'

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